अजय जी, यानी मीरा के जीजा जी, बहुत ही सुलझे हुए, शांत और पढ़े-लिखे इंसान थे। जब भी वे गाँव आते, पूरे घर में जैसे रौनक छा जाती। बच्चों के लिए मिठाई, ससुर जी के लिए किताबें, और मीरा के लिए हमेशा कुछ खास – एक पेन, एक डायरी, या कोई प्रेरणादायक पुस्तक।
मीरा को यह देखकर अच्छा लगता कि उसकी बहन एक ऐसे व्यक्ति के साथ जीवन बिता रही है जो न सिर्फ समझदार है बल्कि बेहद संवेदनशील भी। लेकिन एक दिन कुछ ऐसा हुआ जिसने मीरा के मन में कई सवाल खड़े कर दिए।
पिछली बार जब जीजा जी घर आए, तब सावित्री को मायके आने में देर हो गई। अजय अकेले ही कुछ दिन मीरा के साथ घर में रुके। उन दो दिनों में मीरा ने एक अजीब सी बेचैनी महसूस की। जीजा जी अब पहले जैसे सहज नहीं लगते थे। उनकी बातें अब गंभीर होने लगी थीं, और कभी-कभी मीरा को देख कर वो चुप हो जाते थे।
मीरा ने माँ से कहा —"माँ, जीजा जी अजीब से बर्ताव कर रहे हैं। पहले जैसे नहीं हैं अब।"
माँ हँस कर टाल गई —"अरे तू तो बच्ची है। पढ़ाई पर ध्यान दे, ये सब तेरे सोचने की बात नहीं।"
मर्यादा की दीवार एक दिन शाम को जब मीरा छत पर कपड़े सुखा रही थी, जीजा जी ऊपर आए। पहले तो इधर-उधर की बात करने लगे, लेकिन फिर बोले —
"मीरा, तुम बहुत समझदार हो... तुम्हारे जैसे लोग बहुत कम मिलते हैं।"
मीरा चौंकी। यह प्रशंसा नहीं, कुछ और थी।
"आप मेरी बहन के पति हैं, जीजा जी। यह रिश्ता बहुत पवित्र है," मीरा ने धीरे लेकिन दृढ़ स्वर में कहा।
अजय कुछ नहीं बोले। वह नज़रें झुकाकर नीचे चले गए। उस रात मीरा बहुत देर तक सोचती रही। एक रिश्ता जो उसे हमेशा सबसे सुरक्षित लगता था, उसमें अब दरार की भनक क्यों महसूस हो रही थी?
मीरा ने यह बात किसी को नहीं बताई। लेकिन जब सावित्री आई, तो मीरा ने बड़ी हिम्मत से उससे कहा —
"दीदी, आपसे एक बात कहनी है, जो बहुत जरूरी है..."सावित्री ने उसकी बात ध्यान से सुनी। चेहरा गंभीर हो गया। वह कुछ समय तक चुप रही, फिर बोली —
"मैं जानती हूँ मीरा... मैं भी कुछ समय से यह महसूस कर रही हूँ। लेकिन एक पत्नी की तरह मैंने हमेशा अजय का साथ देने की कोशिश की।"
"पर दीदी, चुप रहना भी तो गलत है," मीरा की आँखों में आँसू थे।
सावित्री ने मीरा को गले लगाया —"इस बार मैं चुप नहीं रहूँगी। एक बहन की अस्मिता की रक्षा करना मेरी जिम्मेदारी है।"
सावित्री ने अजय से खुलकर बात की। उनका रिश्ता कई रातों तक टूटने और जोड़ने की कशमकश में रहा। अंततः अजय को अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने मीरा से माफी माँगी और सावित्री से वादा किया कि वह स्वयं को बदलने की कोशिश करेंगे।
मीरा ने उसे माफ तो किया, लेकिन जीजा-बहन का जो रिश्ता था, उसमें अब वो मासूमियत नहीं रही।
रिश्तों की डोर बहुत नाज़ुक होती है। कभी-कभी एक गलत विचार या नज़र ही उसे तोड़ सकती है। लेकिन अगर समय रहते चेत लिया जाए, तो बहुत कुछ बचाया जा सकता है।
मीरा ने न सिर्फ खुद की गरिमा बचाई, बल्कि अपनी बहन के आत्म-सम्मान को भी आवाज़ दी।

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