"मर्यादा की दीवार"

 


 


छोटे से कस्बे बिसरिया में एक हवेली थी — "श्री निवास"। वहाँ रहते थे पंडित शिवनारायण त्रिपाठी, उम्र लगभग सत्तर, कड़क स्वभाव और मर्यादा के पक्के अनुयायी।

उनके दो बेटे थे — अवधेश और विनीत। दोनों पढ़े-लिखे, नौकरीपेशा और भले इंसान थे, पर पिता की कठोर मर्यादा और अनुशासन ने हमेशा उन्हें दबाकर रखा।

घर में एक दीवार थी — असल दीवार नहीं, मर्यादा की दीवार

उस दीवार के एक ओर बैठते थे पिता, अपने नियमों के साथ —
“बहुएँ परदे में रहें,”
“बात करने का तरीका हो,”
“खाने का समय तय हो,”
“रात 9 के बाद कोई घर से बाहर न निकले।”

बहुएँ — संगीता और प्रियंका, दोनों शिक्षित और समझदार थीं, पर हर बात में पिता जी का ‘मर्यादा सूत्र’ उनके जीवन को कैद बना रहा था। उन्हें न नौकरी की इजाज़त थी, न अपने मन की बात कहने की।

एक दिन, प्रियंका ने हिम्मत करके कहा,
“पिताजी, क्या मर्यादा केवल बहुओं पर लागू होती है? क्या बेटों की हँसी भी अशिष्टता है, अगर वो ज़रा ज़ोर से हो?”

शिवनारायण का चेहरा तमतमा उठा। उन्होंने कठोर स्वर में कहा,
“बहू, इस घर में मर्यादा का पालन हर किसी को करना होता है।”

पर अब घर में बदलाव की हवा चल पड़ी थी।

विनीत ने धीरे से कहा,
“बाबा, मर्यादा अगर रिश्तों के बीच दीवार बन जाए, तो वो बाँधने की जगह तोड़ देती है।”

अवधेश ने भी कहा,
“आपकी शिक्षा, आपके संस्कार अमूल्य हैं, पर अब समय बदल गया है। क्या अब भी बेटियाँ परदे में रहेंगी और बेटे बाहर उड़ान भरेंगे?”

शिवनारायण पहली बार चुप हो गए।

उनके भीतर वर्षों से जमा हुआ मर्यादा का पर्वत आज कुछ पिघलने लगा था। उन्होंने अपनी पत्नी की ओर देखा — जिनका चेहरा वर्षों से चुपचाप सब सहते-सहते थक गया था।

अंत में, शिवनारायण उठे, दीवार के उस पार गए —
प्रियंका और संगीता के सामने हाथ जोड़कर बोले,
“बेटियों, मैंने मर्यादा के नाम पर एक दीवार खड़ी कर दी थी, जो अब मैं खुद गिराता हूँ। अब ये घर खुले आंगन की तरह होगा — जहाँ सब बराबर होंगे।”

घर में जैसे हवा बदल गई।

पहली बार सबने मिलकर एक साथ भोजन किया, बहुएँ भी हँसी में शामिल थीं, और शिवनारायण की आँखों से बरसों बाद संतोष के आँसू बह रहे थे।

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