छोटे से कस्बे में रहने वाली नेहा की शादी पाँच साल पहले राघव से हुई थी। शादी एक सादा मगर आत्मीय समारोह में संपन्न हुई थी। शुरुआत में दोनों के बीच मोहब्बत भी थी, समझदारी भी, और भविष्य को लेकर सपने भी।
राघव एक सरकारी क्लर्क था और नेहा गृहिणी। नेहा के लिए उसका घर ही उसकी दुनिया बन गया था। वह हर दिन घर को संवारती, राघव के पसंद की चीजें बनाती और उसके लौटने का इंतज़ार करती। मगर धीरे-धीरे, राघव का व्यवहार बदलने लगा।
अब न वह बातें करता था, न उसकी तारीफ। कभी-कभी नेहा को ऐसा लगता जैसे वह बस एक ज़रूरत बनकर रह गई हो, कोई भावनात्मक रिश्ता नहीं। नेहा की मां ने जब फोन पर उसकी आवाज़ की उदासी सुनी तो कहा, "बेटी, शादी में उतार-चढ़ाव आते हैं। मगर खुद को खो मत देना।"
नेहा ने खुद को फिर से ढूँढना शुरू किया। उसने अपने पुराने शौक—पेंटिंग, कविता, और किताबें—फिर से जीना शुरू किया। मोहल्ले की बच्चियों को पढ़ाना शुरू किया। राघव को पहले तो यह अजीब लगा, पर फिर वह गौर करने लगा कि नेहा अब मुस्कुरा रही है।
एक शाम नेहा ने राघव से कहा,
"क्या तुम मुझसे कुछ पूछोगे नहीं? मैं क्या कर रही हूँ, क्या सोच रही हूँ?"
राघव चुप रहा।
नेहा बोली, "मैं अब सिर्फ शादीशुदा नहीं, मैं भी एक इंसान हूँ, मेरी भी दुनिया है।"
राघव ने उसकी आँखों में देखा, और पहली बार वर्षों बाद कहा,
"माफ़ करना, नेहा। मैंने तुम्हें बस एक भूमिका में बाँध दिया।"
उस दिन के बाद सबकुछ नहीं बदला, मगर इतना जरूर हुआ कि दोनों ने एक-दूसरे को फिर से जानना शुरू किया।

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