छोटा-सा गांव चंदपुर, जहां सुबह की शुरुआत गायों की घंटियों, मंदिर की घंटियों और मां की पुकार से होती थी। इसी गांव की मिट्टी में खेलता-कूदता था मुकेश, गांव का सबसे शरारती, लेकिन सबसे प्यारा लड़का।
मुकेश की उम्र करीब 12 साल थी, पर उसकी हरकतें देखकर गांव के बड़े-बुजुर्ग भी चकित रह जाते। कभी किसी के बैल की पूंछ में रिबन बांध देता, तो कभी गांव के पंडित जी के चश्मे में गुलाल भर देता।
पर उसकी शरारतों में कोई बुराई नहीं होती — उसमें बस मासूमियत थी।
शरारती मुकेश की आंखों में हंसी होती थी, लेकिन दिल में एक कोना खाली था। जब वो पांच साल का था, उसकी मां चल बसी थी। उसके बाद पिता रामदीन ने अकेले ही उसे पाला।
रामदीन गांव का हलवाई था। पूरे गांव को उसके गुलाब जामुन और बर्फी पसंद थी। लेकिन मुकेश की शरारतें कई बार दुकान पर असर डालतीं। कई ग्राहक शिकायत करते — "तुम्हारा लड़का हमारी साइकिल की हवा निकाल गया!"
रामदीन हंसते हुए कहता, "शरारतें हैं साहब, किसी दिन यही बच्चा नाम रोशन करेगा।"
मुकेश के स्कूल में भी शरारतें जारी थीं। अध्यापक मिश्राजी को वो कभी "गोलू पांडा" कहकर बुला देता, तो कभी क्लास में चुपचाप सबकी स्लेटों पर चॉक से मूंछें बना देता।
पर एक दिन कुछ ऐसा हुआ जिसने उसकी जिंदगी बदल दी।
स्कूल में विज्ञान प्रतियोगिता हो रही थी। सभी बच्चों से कहा गया — "एक छोटा सा प्रयोग बनाकर लाओ।"
सब बच्चे शहर से किट मंगवाने लगे। लेकिन मुकेश के पास पैसे नहीं थे। उसने अपने पिता की दुकान के खाली डब्बों से एक छोटा सा पानी साफ करने वाला फिल्टर बनाया।
जब प्रतियोगिता हुई, मुकेश का मॉडल सबसे अलग था — देसी और टिकाऊ। निर्णायक समिति ने उसे पहला इनाम दिया।
गांव के सभी लोग हैरान थे। "ये वही मुकेश है? जो कल तक बस शरारत करता था?"
उस दिन के बाद मुकेश की पहचान बदल गई। उसने भी अपनी दिशा को थोड़ा मोड़ दिया — शरारत अब भी करता था, लेकिन अब उसमें सीख होती थी।
गांव के बच्चों को वो पढ़ाने लगा, उन्हें खेल-खेल में पढ़ाई सिखाने लगा। अब उसकी शरारतें बच्चों को हंसाने और सिखाने के लिए होती थीं।
रामदीन की आंखों में गर्व था। उसने दुकान के ऊपर एक तख्ती लगवाई — "मुकेश ट्यूशन सेंटर — पढ़ाई में मस्ती"
वक्त बीतता गया। मुकेश ने गांव में एक लघु विज्ञान केंद्र खोला। वह सरकारी योजनाओं से जुड़कर बच्चों को मुफ्त शिक्षा देने लगा। अब वह "मुकेश भैया" बन चुका था।
उसकी कहानी कई पत्रिकाओं में छपी। गांव वाले जिनकी शिकायतें थीं, अब उन्हीं के बच्चे मुकेश के पास पढ़ने आते थे।
आज चंदपुर गांव का नाम पूरे जिले में लिया जाता है। वहां के "नटखट मुकेश" ने ये साबित कर दिया कि शरारत अगर सच्चाई और संस्कारों के साथ हो, तो वह नवाचार बन सकती है।
मुकेश ने गांव में बच्चों के लिए पहला डिजिटल लाइब्रेरी भी खोला, और आज भी हर शाम गांव के चबूतरे पर बैठकर अपने शरारती दिनों की कहानियां बच्चों को सुनाता है।

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