"पछतावा"

 



शाम का सूरज गाँव की पगडंडी पर अपनी आखिरी किरणें बिखेर रहा था। पगडंडी के किनारे एक बूढ़ा आदमी बैठा था, जिसकी आँखें लगातार दूर कहीं देख रही थीं — जैसे किसी का इंतज़ार हो।

उसका नाम था रामचरण। उम्र लगभग 70 वर्ष, लेकिन चेहरे पर समय की मार से कहीं अधिक कुछ और लिखा था — पछतावे की झुर्रियाँ

रामचरण गाँव का जाना-माना किसान था। चार बेटे थे – हरि, मोहन, गोपाल और सुरेश। उसकी पत्नी सीता देवी, भगवान को प्यारी हो गई थी जब सबसे छोटा बेटा सिर्फ 8 साल का था। तब रामचरण ने अकेले ही अपने बच्चों को बड़ा किया। खेत-खलिहान सँभालना, रोटियाँ सेंकना और माँ जैसी ममता देना – उसने सब कुछ किया।

लेकिन जैसे-जैसे बच्चे बड़े हुए, वह बदलते गए।
सबसे बड़ा बेटा हरि पढ़ाई के लिए शहर गया और वहीं बस गया।
मोहन को नौकरी लगी तो वह भी चला गया।
गोपाल ने शादी की और अपनी पत्नी की बातों में आकर पिता से दूर हो गया।
और सुरेश, जो सबसे करीब था, उसने भी एक दिन कह दिया —
"बाबा, अब आप हमारे साथ नहीं रह सकते, हम आपको वृद्धाश्रम छोड़ देंगे।"

रामचरण को लगा जैसे ज़मीन उसके पैरों तले खिसक गई हो।

"मैंने अपना जीवन इन बच्चों पर लगा दिया, और आज यही मेरा फल है?"

फिर भी कुछ नहीं कहा। चुपचाप वृद्धाश्रम चला गया।

वहाँ रहते हुए वह हर रोज़ एक चिट्ठी लिखता — अपने बेटों को, बहुओं को, पोतों को। लेकिन कभी कोई जवाब नहीं आया।

आज 5 साल हो गए थे। तभी वृद्धाश्रम के गेट पर एक कार रुकी। चारों बेटे उतरे। सुरेश ने धीमी आवाज़ में कहा,
"बाबा... हम आपको लेने आए हैं... माफ कर दो बाबा..."

लेकिन रामचरण सिर्फ मुस्कराया।
उसने धीरे से कहा,
"अब पछतावे से क्या फायदा? लेकिन चलो, शायद अब मैं अपने अंतिम दिन अपने घर में काट सकूं..."

चारों बेटों की आँखें नम थीं।अब उन्हें समझ में आया था कि माँ का प्यार तो मिला नहीं, और बाप को भी खोने में ही देर हो गई।

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