शाम की ढलती धूप खेतों पर सुनहरी चादर बिछा रही थी। बूढ़े रामसेवक किसान हल जोतते हुए एक क्षण को रुके, अपनी हथेली से माथे का पसीना पोंछा और दूर क्षितिज की ओर देखने लगे। उनके पैरों की बिवाइयाँ, चेहरे की झुर्रियाँ और थके हाथ, उनके जीवन की कहानी सुना रहे थे।
रामसेवक के पास ज़मीन ज़्यादा नहीं थी, लेकिन मिट्टी से उनका रिश्ता गहरा था। उनका बेटा सूरज पढ़-लिख कर शहर चला गया था। वह अब शहर में एक दफ्तर में काम करता था। एक दिन सूरज गाँव लौटा और बोला, “बाबा, यह सब छोड़ो। ज़मीन बेच देते हैं, मैं आपको शहर ले चलता हूँ। वहाँ सब सुविधा है।”
रामसेवक मुस्कराए। “सुविधा मिट्टी से बड़ी नहीं बेटा। इस खेत की हर लकीर में तेरे बचपन की दौड़ है। हर बीज में तेरी माँ की दुआ है।”
सूरज चुप हो गया। उस दिन उसने पहली बार अपने पिता के हाथों की लकीरें ध्यान से देखीं — जिनमें मेहनत, त्याग और प्रेम की स्याही थी। कुछ दिनों बाद वह गाँव में ही स्कूल खोलने लगा — किसानों के बच्चों के लिए।
आज, रामसेवक के खेत में फसल लहराती है, और साथ ही बच्चे पढ़ते हैं। मिट्टी अब भी वही है, लेकिन अब वह सपने भी उगाती है।

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