अय्याशी

 



 अय्याशी – एक रास्ता जो कहीं नहीं जाता

 

राजेश एक छोटे शहर का रहने वाला, पढ़ा-लिखा, और एक प्रतिष्ठित सरकारी नौकरी में कार्यरत था। उसके माता-पिता ने बहुत मेहनत से उसे पाला था। जब वह नौकरी पर शहर गया, तो उसके रहन-सहन में धीरे-धीरे बदलाव आने लगे। पहले वह माँ से हर रोज बात करता था, फिर सप्ताह में एक बार और फिर महीनों तक उसकी कोई खबर नहीं मिलती।

शहर की रंगीनियों ने उसे अपनी ओर खींच लिया। नए दोस्तों का साथ, क्लबों की रोशनी, नशे और दिखावे की दुनिया – यह सब उसे बहुत आकर्षित करने लगा। वह कहता, “जिंदगी एक ही बार मिलती है, क्यों न मजे से जिएं।” पर वह भूल गया कि मज़ा और अय्याशी में बहुत फर्क होता है।

राजेश का समय अब महंगे होटलों, शराब और दोस्तों की पार्टी में बीतने लगा। धीरे-धीरे उसके काम पर असर होने लगा। ऑफिस में उसकी छवि बिगड़ने लगी। माता-पिता ने कई बार फोन करके समझाया, पर वह चिढ़कर फोन काट देता।

एक दिन, उसकी माँ गंभीर रूप से बीमार पड़ गई। राजेश को फोन आया, पर वह एक पार्टी में था, और बोला, “मैं व्यस्त हूँ, बाद में बात करूंगा।” उस रात माँ चल बसी।

जब वह गांव पहुंचा, तो पिता ने बिना कुछ कहे उसकी ओर देखा। उस नजर में हजारों सवाल थे, पर शब्द नहीं थे। राजेश टूट गया। वह जान गया कि उसने अपनी अय्याशी में वह सब खो दिया जो जीवन में सबसे कीमती था – माँ का प्यार, पिता का विश्वास और अपना आत्मसम्मान।

समय बीतता गया, पर राजेश का मन कभी चैन नहीं पाया। अब उसके पास सब कुछ था – पैसा, नौकरी, बड़ी गाड़ी – पर वह अंदर से खाली हो गया था।

 
असली सुख दिखावे और भोग-विलास में नहीं, बल्कि अपनों के साथ बिताए हर सच्चे पल में है। अय्याशी एक ऐसा रास्ता है जो दिखने में आसान लगता है, पर अंत में अकेलापन और पछतावा ही देता है।

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