गांव का नाम था – धरमपुर। हर गली, हर मकान, हर चबूतरा एक-दूसरे को पहचानता था। लोग कम पढ़े-लिखे थे, पर दिल के साफ। वही गांव, जहां गरीब को भूख से ज्यादा चिंता होती थी "लाज" की।
शांति, एक विधवा महिला, पचास की उम्र में भी उसकी आँखों में एक सूख गया दरिया था, जिसमें आंसुओं की जगह अब चुप्पी बहती थी। उसका इकलौता बेटा राजू शहर चला गया था काम की तलाश में। लेकिन पिछले दो सालों से उसने न चिट्ठी भेजी, न पैसे। गांव वाले तरह-तरह की बातें करते – "शहर जाकर बेटा बिगड़ गया होगा", "अब मां से क्या लेना-देना?" और शांति बस सुनकर सिर झुका लेती।
गांव में हर साल एक बड़ा भंडारा होता था। गांव के अमीर लोग गरीबों के लिए खाना खिलाते थे, कपड़े बांटते थे, और फोटो खिंचवाकर अखबार में छपवाते – "फलाने जी ने खैरात बांटी"।
इस साल शांति भी पहुंची थी भंडारे में। चुपचाप कतार में खड़ी थी। उसकी पुरानी साड़ी की कोर फटी थी, पर इज्जत अभी भी उसी पर टिकी थी। एक लड़का खाना परोस रहा था, उसके साथ एक और आया – "अरे माई, तुम तो राजू की अम्मा हो न? सुना है वो तो अब शहर में गाड़ी चलाता है। फिर यहां खैरात में क्या लेने आई हो?"
शांति की आँखों में कुछ पल को झुंझलाहट तैर गई, फिर सब शांत हो गया। बोली –
"बेटा, भूख खैरात नहीं देखती, और पेट के सामने इज्जत भी सर झुका देती है।"
लड़के हँसते रहे, पर उस हँसी में बहुत कुछ चुभ गया था।
शांति ने खाना लेकर एक किनारे बैठकर खाना शुरू किया। तभी भंडारे के आयोजक – बाबूलाल जी, अपने चमचों के साथ आए, मीडिया वाला कैमरा भी साथ था।
"माई, इधर आओ। फोटो खिंचवाओ, ताकि लोग देख सकें हम कैसे गरीबों का पेट भरते हैं।"
शांति की आंखों से आँसू टपक गए।
वह धीरे से बोली –
"जिस दिन लोग भूखे का पेट भरने से पहले फोटो खिंचवाना छोड़ देंगे, उस दिन असली इंसानियत जागेगी बाबूजी। खैरात से भूख तो मिट सकती है, पर इज्जत नहीं मिलती।"
यह कहकर वो खाना वहीं रखकर चली गई। पूरा गांव स्तब्ध था।
अगले दिन गांव के स्कूल की दीवार पर एक पोस्टर चिपका था:
"भूखे को खाना दो, इज्जत मत छीनो।"
उस दिन शांति भले ही भूखी सोई हो, पर गांव में एक विचार ज़रूर जाग गया था।

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