दिनचर्या: खोए हुए सुकून की वापसी – एक युवा की आत्मखोज
दिनचर्या का महत्व: कैसे एक सही रूटीन ने बदली अवसाद से घिरे युवा की जिंदगी
जानिए कैसे एक सही आयुर्वेदिक दिनचर्या (Daily Routine) न केवल शारीरिक स्वास्थ्य बल्कि मानसिक शांति भी ला सकती है। आर्यन और उसके दादाजी की यह भावुक कहानी आपके जीवन जीने का नजरिया बदल देगी।
कंक्रीट का जंगल और नींद की गोलियां
रात के 2 बज रहे थे। बैंगलोर के कोरामंगला इलाके की एक हाई-राइज बिल्डिंग के 14वें फ्लोर पर आर्यन की खिड़की की बत्ती अब भी जल रही थी। 28 साल का आर्यन, एक मल्टीनेशनल कंपनी में सीनियर सॉफ्टवेयर इंजीनियर, अपनी स्क्रीन को घूर रहा था। उसकी आँखों के नीचे गहरे काले घेरे थे, जो उसकी स्क्रीन की नीली रोशनी में और भी डरावने लग रहे थे।
मेज पर कॉफी के खाली मग और एक 'एंटी-एंग्जायटी' (घबराहट रोधी) गोलियों का पत्ता पड़ा था। आर्यन ने पिछले 6 महीनों से सूरज को उगते हुए नहीं देखा था। उसका दिन दोपहर 11 बजे शुरू होता और रात के 3 बजे खत्म। शरीर थक चुका था, लेकिन दिमाग था कि शांत होने का नाम नहीं ले रहा था। उसे लगता था कि यही सफलता की कीमत है।
तभी उसके सीने में एक अजीब सी जकड़न महसूस हुई। सांस फूलने लगी। यह पैनिक अटैक था। आर्यन फर्श पर गिर पड़ा। उसे लगा जैसे उसकी जान निकल रही है। उसे उस पल न अपना प्रमोशन याद आया, न बैंक बैलेंस। याद आया तो बस अपना गाँव—'रामपुर', और अपने दादाजी का वो आंगन जहाँ नीम की ठंडी हवा चलती थी।
अगले दिन डॉक्टर ने साफ कह दिया, "आर्यन, तुम्हारी बायोलॉजिकल क्लॉक पूरी तरह टूट चुकी है। अगर तुमने अपनी जीवनशैली नहीं सुधारी, तो शरीर जवाब दे जाएगा। तुम्हें ब्रेक की जरूरत है।"
आर्यन ने अपना लैपटॉप बैग में डाला, और उसी शाम की फ्लाइट पकड़कर अपने पुश्तैनी गाँव निकल गया।
समय का ठहराव
रामपुर गाँव। यहाँ समय जैसे ठहर सा गया था। मिट्टी की सोंधी खुशबू और दूर कहीं मंदिर की घंटियों की आवाज़।
आर्यन जब घर के पुराने लकड़ी के दरवाजे पर पहुँचा, तो सामने 80 साल के उसके दादाजी, पंडित दीनानाथ, खड़े थे। उनकी कमर सीधी थी, चेहरे पर एक अनोखा तेज और आँखों में चमक। 80 साल की उम्र में भी वे आर्यन से ज्यादा ऊर्जावान लग रहे थे।
"आ गए शहर के बाबू?" दादाजी ने हँसते हुए कहा, लेकिन आर्यन का पीला पड़ा चेहरा देखकर उनकी हँसी चिंता में बदल गई।
"यह क्या हालत बना रखी है? तू 28 का है या 82 का?"
आर्यन ने बैग पटका और चारपाई पर गिर गया। "दादाजी, मैं थक गया हूँ। मुझे बस सोना है।"
वह सोया, लेकिन वैसी ही बेचैन नींद। बार-बार मोबाइल चेक करने की आदत।
ब्रह्म मुहूर्त का संघर्ष
अगली सुबह, या यूँ कहें रात के 4 बजे, आर्यन को लगा जैसे किसी ने हिलाकर जगा दिया हो।
"उठ जा आर्यन! ब्रह्म मुहूर्त हो गया," दादाजी की कड़क आवाज़ आई।
आर्यन ने रजाई मुँह पर खींच ली। "दादाजी, प्लीज। मेरी सुबह 10 बजे होती है। अभी तो रात है।"
दादाजी ने रजाई खींच ली। "शहर में रात होती होगी, यहाँ जीवन शुरू हो चुका है। अगर ठीक होना है, तो मेरे नियमों का पालन करना होगा। आज से तेरी 'दिनचर्या' मैं तय करूँगा।"
बेमन से, आँखों में नींद लिए आर्यन उठा। बाहर घना अंधेरा था, लेकिन आसमान में तारे चमक रहे थे। ठंडी हवा चल रही थी।
दादाजी उसे आंगन में ले गए। "सबसे पहले—उषापान।"
उन्होंने उसे तांबे के लोटे से पानी पिलाया। "बासी मुँह पानी पी। यह तेरे शरीर के विष (toxins) को बाहर निकालेगा।"
फिर उन्होंने उसे नीम की दातुन दी। "टूथब्रश फेंक दे। इस कड़वे रस को पेट में जाने दे, यह तेरे खून को साफ करेगा।"
आर्यन को सब अजीब लग रहा था। उसे अपनी कॉफी की तलब लग रही थी। उसका शरीर विद्रोह कर रहा था। उसे गुस्सा आ रहा था। लेकिन दादाजी के सामने वह कुछ बोल न सका।
प्रकृति के साथ तालमेल
सूरज की पहली किरण फूटने वाली थी। दादाजी ने आर्यन को एक चटाई पर बिठाया।
"आर्यन, देख। उसे देख," उन्होंने उगते सूरज की ओर इशारा किया।
"हमारा शरीर सौर ऊर्जा (Solar Energy) से चलता है। तूने सालों से इस समय को सोकर बिताया है, इसलिए तेरा 'तेज' खत्म हो गया है।"
दादाजी ने उसे सूर्य नमस्कार करने को कहा। आर्यन का शरीर अकड़ा हुआ था। दो बार झुकने में ही उसकी सांस फूल गई। उसे शर्म आई। वह जिम जाता था, लेकिन यहाँ उसका 'आधुनिक फिटनेस' धरा का धरा रह गया।
इसके बाद दादाजी ने उसे 'अभ्यंग' (तेल मालिश) करवाया। सरसों के तेल की मालिश।
"यह तेल तेरी हड्डियों को लोहे जैसा बना देगा और दिमाग की गर्मी को शांत करेगा," दादाजी ने कहा।
नहाने के बाद जब आर्यन ने सादा, घर का बना दलिया और छाछ पी, तो उसे लगा जैसे पेट में वर्षों बाद ठंडक पड़ी हो। उसे लगा कि उसे अब नींद आ रही है, लेकिन दादाजी ने उसे सोने नहीं दिया।
"दिन में सोना मतलब रोगों को न्योता देना। अब चल खेतों में।"
बदलाव की बयार
पहला हफ्ता नर्क जैसा था। आर्यन का शरीर टूटता था, उसे शहर की याद आती थी, जंक फूड की तलब होती थी। लेकिन दादाजी चट्टान की तरह डटे रहे।
दूसरे हफ्ते में कुछ जादू हुआ।
एक सुबह 4 बजे, दादाजी के जगाने से पहले ही आर्यन की आँख खुल गई। उसने महसूस किया कि उसका सिर भारी नहीं था। उसे चिड़चिड़ाहट नहीं हो रही थी।
वह बाहर आया। सन्नाटा था। उसने गहरी सांस ली। हवा में ऑक्सीजन की मात्रा इतनी ज्यादा थी कि उसका दिमाग एकदम साफ हो गया।
उस दिन उसने दादाजी से पूछा, "दादाजी, आप लोग यह सब बोरिंग रूटीन कैसे फॉलो करते हो?"
दादाजी मुस्कुराए, "बेटा, इसे 'रूटीन' मत कह। यह 'धर्म' है। दिनचर्या दो शब्दों से बना है—दिन और चर्या (आचरण)। यानी दिन के साथ कैसा व्यवहार करना है। तुम शहर वाले प्रकृति से लड़ते हो। रात को जागते हो जब शरीर को सोना है, दिन में सोते हो जब शरीर को काम करना है। तुम नदी की धारा के खिलाफ तैर रहे हो, इसलिए थक जाते हो। हम धारा के साथ बहते हैं।"
आर्यन को बात समझ आने लगी थी।
- ब्रह्म मुहूर्त ने उसे मानसिक शांति दी।
- व्यायाम और योग ने शरीर का आलस तोड़ा।
- मिताहार (संतुलित भोजन) ने उसका पाचन ठीक किया।
- जल्दी सोने की आदत ने उसकी अनिद्रा (Insomnia) को खत्म कर दिया।
असली परीक्षा
एक महीने बाद। आर्यन का फोन बजा। उसके बॉस का फोन था।
"आर्यन, बहुत छुट्टियाँ हो गईं। एक बड़ा प्रोजेक्ट आया है। हमें तुम्हारी जरूरत है। कल वापस आ जाओ।"
आर्यन के हाथ कांपने लगे। वापस वही दुनिया? वही डेडलाइन्स? वही ट्रैफिक? क्या वह इस शांति को वहाँ बरकरार रख पाएगा?
उसने दादाजी की ओर देखा।
दादाजी ने उसके कंधे पर हाथ रखा। "आर्यन, दिनचर्या जगह पर निर्भर नहीं करती, नीयत पर निर्भर करती है। हिमालय पर जाकर साधु बनना आसान है, लेकिन कीचड़ में कमल बनकर रहना ही असली योग है। जा, और इस ज्ञान को अपने कंक्रीट के जंगल में भी जीवित रख।"
नई शुरुआत
आर्यन बैंगलोर वापस आया। उसके कलीग्स (Colleagues) उसे पहचान नहीं पा रहे थे। उसका वजन कम हो गया था, त्वचा चमक रही थी, और सबसे बड़ी बात—उसकी आँखों में अब घबराहट नहीं, ठहराव था।
शाम को 6 बजे, जब सब लोग "एक कॉफी और पी लेते हैं" कह रहे थे, आर्यन ने अपना लैपटॉप बंद किया।
"कहाँ जा रहे हो?" बॉस ने पूछा।
"घर, सर। कल सुबह 4 बजे उठना है," आर्यन ने मुस्कुराते हुए कहा।
लोग हँसे, "पागल हो गया है गाँव जाकर।"
लेकिन एक महीने बाद, जब आर्यन की प्रोडक्टिविटी (Productivity) पूरी टीम में सबसे ज्यादा निकली, और वह सबसे शांत और खुश रहने लगा, तो वही लोग उसके पास आए।
"भाई, तू करता क्या है? कौन सी जिम जाता है? कौन सी डाइट ले रहा है?"
आर्यन ने मुस्कुराकर अपनी डायरी खोली, जिस पर पहले पन्ने पर लिखा था—"मेरी दिनचर्या"।
उसने सबको बताया, "मैंने सिर्फ अपनी घड़ी बदली है। उसे दुनिया के टाइम से नहीं, सूरज के टाइम से मिला लिया है। जीवन अपने आप पटरी पर आ गया।"
निष्कर्ष (Moral):
जीवन में अनुशासन (Discipline) कोई कैद नहीं है, बल्कि मुक्ति है। जब हम अपनी दिनचर्या को सुधारते हैं, तो हम केवल अपना स्वास्थ्य नहीं सुधारते, हम अपने जीवन को अपने नियंत्रण में ले लेते हैं। सूर्योदय देखने वाला व्यक्ति, सूर्यास्त तक कभी हारता नहीं है।
अंतिम संदेश:
क्या आप भी अपनी ज़िंदगी बदलना चाहते हैं? तो कल अलार्म क्लॉक से नहीं, संकल्प से उठिए।

0 टिप्पणियाँ