आयुर्वेद का हृदय: महर्षि वाग्भट की खोज
ज्ञान का महासागर और एक शिष्य की उलझन
यह कहानी है छठी शताब्दी (6th Century AD) की। हिमालय की तराई में स्थित एक विशाल गुरुकुल में शिक्षा का वातावरण था। यहाँ देश-विदेश से छात्र आयुर्वेद सीखने आते थे।
इस गुरुकुल में एक अत्यंत मेधावी छात्र था—वाग्भट। वाग्भट के पिता और दादा (सिंधु देश के वैद्य) भी महान चिकित्सक थे। वाग्भट बचपन से ही जिज्ञासु थे।
उस समय आयुर्वेद दो विशाल धाराओं में बंटा हुआ था:
- चरक संहिता: जो 'कायचिकित्सा' (General Medicine) का महासागर था। इसमें जड़ी-बूटियों और दर्शन का इतना विस्तार था कि छात्र पढ़ते-पढ़ते बूढ़े हो जाते थे।
- सुश्रुत संहिता: जो 'शल्य चिकित्सा' (Surgery) का प्रधान ग्रंथ था। इसमें चीर-फाड़ और यंत्रों का विस्तृत वर्णन था।
एक दिन गुरुकुल में एक गंभीर चर्चा चल रही थी। एक छात्र, माधव, निराश होकर बैठा था।
वाग्भट ने पूछा, "मित्र, तुम इतने उदास क्यों हो?"
माधव ने अपने सामने रखे ताड़पत्रों (Manuscripts) की ओर इशारा किया। "वाग्भट, देखो! अगर मुझे बुखार का इलाज ढूँढना है, तो मुझे 'चरक' के हज़ारों श्लोक पढ़ने पड़ते हैं। अगर मुझे घाव सिलना है, तो 'सुश्रुत' के पन्ने पलटने पड़ते हैं। यह ज्ञान इतना बिखरा हुआ और विशाल है कि जब तक मैं उपचार ढूँढता हूँ, रोगी के प्राण संकट में पड़ जाते हैं। क्या आयुर्वेद केवल विद्वानों के वाद-विवाद के लिए है? या यह जन-जन के कल्याण के लिए है?"
माधव की बात वाग्भट के दिल में तीर की तरह चुभ गई। उसने सोचा, "यह सत्य है। ऋषियों ने ज्ञान का अमृत तो दिया है, लेकिन वह इतना गहरा है कि हर कोई उसे पी नहीं सकता। हमें एक ऐसे 'सेतु' (Bridge) की ज़रूरत है जो चरक और सुश्रुत को जोड़ सके।"
उसी रात, वाग्भट ने एक संकल्प लिया। वह एक ऐसे ग्रंथ की रचना करेंगे जो न तो बहुत संक्षिप्त होगा और न ही बहुत विस्तृत। जो 'अग्निवेश' (चरक) की चिकित्सा और 'सुश्रुत' की शल्य क्रिया का सार होगा।
सार की खोज (मंथन)
वाग्भट ने गुरुकुल छोड़कर एकांतवास का निर्णय लिया। वे सिंधु नदी के तट पर एक कुटिया में रहने लगे। उनके पास केवल दो ग्रंथ थे—चरक संहिता और सुश्रुत संहिता।
उन्होंने सोचना शुरू किया: "शरीर एक है, तो चिकित्सा दो क्यों? चिकित्सक को 'काय' (Body) और 'शल्य' (Surgery) दोनों का ज्ञान एक साथ होना चाहिए।"
उन्होंने आयुर्वेद को आठ अंगों (Ashtanga) में विभाजित करने का ढांचा तैयार किया, ताकि इसे समझना आसान हो जाए:
- कायचिकित्सा (General Medicine)
- बालरोग (Pediatrics)
- ग्रहचिकित्सा (Psychiatry/Demonology)
- ऊर्ध्वांग (ENT & Ophthalmology - गले के ऊपर के रोग)
- शल्य (Surgery)
- दंष्ट्रा (Toxicology/विष चिकित्सा)
- जरा (Geriatrics/रसायन - बुढ़ापा रोकना)
- वृष (Aphrodisiacs/वाजीकरण)
वाग्भट ने लिखना शुरू किया। लेकिन उन्होंने गद्य (Prose) नहीं चुना। उन्होंने 'पद्य' (Poetry/Shloka) चुना। क्योंकि कविता याद रखना आसान होता है। उनका लक्ष्य था कि एक वैद्य को पूरी किताब रटने की ज़रूरत न पड़े, बस सूत्र याद रहे।
उन्होंने लिखा:
"आयु: कामयमानेन धर्मार्थसुखसाधनम्।
आयुर्वेदोपदेशेषु विधेय: परमादर:॥"
(जो व्यक्ति धर्म, अर्थ और सुख की प्राप्ति के लिए लंबी आयु चाहता है, उसे आयुर्वेद के उपदेशों का परम आदर करना चाहिए।)
यह ग्रंथ का पहला श्लोक था। वाग्भट ने ज्ञान को 'हृदय' (Heart) में समेटने का प्रयास किया। इसलिए इसका नाम रखा—अष्टांग हृदयम।
दिनचर्या - स्वास्थ्य का आधार
वाग्भट जानते थे कि बीमारी का इलाज करने से बेहतर है बीमारी को रोकना। इसलिए उन्होंने अपने ग्रंथ के 'सूत्रस्थान' में 'दिनचर्या' (Daily Routine) पर सबसे अधिक जोर दिया।
एक दिन, एक अमीर व्यापारी, कुबेरदास, वाग्भट के पास आया। वह मोटापे और आलस्य से ग्रस्त था।
"वैद्यराज, मुझे कोई ऐसी औषधि दें जिससे मेरा वजन कम हो जाए और सुस्ती दूर हो," कुबेरदास ने कहा।
वाग्भट ने उसे कोई दवा नहीं दी। उन्होंने अपनी लिखी हुई संहिता का एक अध्याय सुनाया।
"हे श्रेष्ठी! औषधि तुम्हारे शरीर का मैल साफ कर सकती है, लेकिन आदतें नहीं। तुम ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से 96 मिनट पहले) में उठना शुरू करो।"
वाग्भट ने उसे समझाया:
- दंतधावन: कड़वे या कसैले रस वाली दातुन करो (कफ नाश के लिए)।
- अंजन: आँखों में सुरमा लगाओ (दृष्टि के लिए)।
- नस्य: नाक में तेल की बूंदें डालो (मस्तिष्क की शक्ति के लिए)।
- अभ्यंग: रोज तेल मालिश करो (बुढ़ापा दूर रखने के लिए)।
- व्यायाम: अपनी क्षमता का आधा (अर्धशक्ति) व्यायाम करो।
कुबेरदास को लगा यह तो बहुत साधारण बातें हैं। लेकिन जब उसने 40 दिन इसका पालन किया, तो उसका शरीर हल्का हो गया, बिना किसी कड़वी दवा के। वाग्भट ने सिद्ध किया कि 'स्वस्थवृत्त' (Lifestyle) ही सबसे बड़ी औषधि है।
राजा का रोग और अष्टांग का परीक्षण
ग्रंथ लगभग पूरा हो चुका था, तभी वाग्भट की परीक्षा की घड़ी आई।
पड़ोसी राज्य के राजा, भीमदेव, एक विचित्र रोग से ग्रस्त हो गए। उनके पेट में असहनीय पीड़ा थी, उल्टी होती थी और वे धीरे-धीरे सूखते जा रहे थे।
राज्य के बड़े-बड़े राजवैद्य हार मान चुके थे।
- एक वैद्य ने कहा, "यह 'गुल्म' (Tumor) है, सर्जरी करनी पड़ेगी।" लेकिन राजा सर्जरी के नाम से डरते थे।
- दूसरे वैद्य ने कहा, "यह 'विशूचिका' (Cholera type) है, इन्हें केवल जड़ी-बूटियां दो।" लेकिन जड़ी-बूटियों से आराम नहीं मिल रहा था।
खबर वाग्भट तक पहुँची। उन्हें राजमहल बुलाया गया।
वाग्भट ने राजा को देखा। उन्होंने न केवल राजा की नब्ज देखी, बल्कि उनका खान-पान, सोने का तरीका और मानसिक स्थिति भी पूछी।
वाग्भट ने निदान (Diagnosis) किया: "राजन, यह केवल पेट का रोग नहीं है। यह 'आमवात' और मानसिक तनाव का मिश्रण है। आपके वात और कफ दोनों प्रकुपित हैं।"
वहाँ खड़े पुराने वैद्यों ने आपत्ति जताई। "या तो वात का इलाज करो या कफ का। दोनों की चिकित्सा विपरीत है। अगर वात के लिए तेल देंगे तो कफ बढ़ेगा, और कफ के लिए रूखा देंगे तो वात बढ़ेगा।"
वाग्भट मुस्कुराए। यही वह उलझन थी जिसे सुलझाने के लिए उन्होंने 'अष्टांग हृदयम' लिखा था।
उन्होंने कहा, "मैं मध्यम मार्ग अपनाऊंगा।"
वाग्भट ने 'पंचकर्म' की योजना बनाई (जो अष्टांग हृदयम का मुख्य भाग है)।
- स्नेहन-स्वेदन: उन्होंने औषधीय घी पिलाया (लेकिन कफ नाशक जड़ी-बूटियों के साथ)।
- विरेचन: पेट की सफाई करवाई।
- आहार: उन्होंने राजा को 'मंड' (चावल का पानी) और मूंग की दाल पर रखा।
लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात, उन्होंने राजा के मन की चिकित्सा की (सत्वाविजय चिकित्सा)। उन्होंने राजा को समझाया कि क्रोध और चिंता कैसे अग्नि (Digestion) को नष्ट करते हैं।
15 दिनों के भीतर, राजा अपने पैरों पर खड़े हो गए। जो काम केवल सर्जरी या केवल दवा नहीं कर पाई, वह वाग्भट के 'समग्र दृष्टिकोण' (Holistic Approach) ने कर दिखाया।
राजा भीमदेव ने पूछा, "वैद्यवर, आपने यह ज्ञान कहाँ से पाया? चरक से या सुश्रुत से?"
वाग्भट ने अपनी पांडुलिपि (Manuscript) निकाली और कहा, "राजन, यह उन दोनों के ज्ञान का निचोड़ है—अष्टांग हृदयम।"
अमृत का कलश
वाग्भट की ख्याति फैल गई। लेकिन वाग्भट अहंकारी नहीं थे। वे जानते थे कि ज्ञान बहता पानी है।
उन्होंने अपने शिष्यों को बुलाया और कहा, "इस ग्रंथ को रटना मत। इसके 'हृदय' को समझना।"
अष्टांग हृदयम की सबसे बड़ी विशेषता थी इसकी सरलता और व्यावहारिकता।
वाग्भट ने इसमें ऐसे सूत्र दिए जो आज भी (21वीं सदी में) उतने ही सटीक हैं:
भोजन के नियम:
"काले सात्म्यं शुचि हितं स्निग्धोष्णं लघु तन्मना:..."
(भोजन सही समय पर, जो पच सके, साफ, हितकारी, थोड़ा चिकना, गर्म, हल्का और पूरे मन से करना चाहिए।)
आज का विज्ञान जिसे 'Mindful Eating' कहता है, वाग्भट ने उसे 1500 साल पहले लिख दिया था।विरुद्ध आहार (Incompatible Foods):
वाग्भट ने बताया कि मछली के साथ दूध, या शहद को गर्म करके खाना ज़हर समान है। यह ज्ञान आज एलर्जी और स्किन डिजीज के इलाज में आधार बनता है।ऋतुचर्या (Seasonal Routine):
किस मौसम में क्या खाएं, यह वाग्भट ने जितना स्पष्ट लिखा, उतना शायद ही किसी ने लिखा हो।
कालजयी विरासत
अपने जीवन के अंतिम वर्षों में, वाग्भट केरल की ओर चले गए (कुछ इतिहासकारों के अनुसार)। वहाँ उन्होंने अष्टवैद्य परंपरा को यह ज्ञान सौंपा।
आज अगर दक्षिण भारत, विशेषकर केरल, आयुर्वेद का केंद्र है, तो उसका श्रेय 'अष्टांग हृदयम' को जाता है। वहाँ का हर वैद्य आज भी दिन की शुरुआत वाग्भट के श्लोकों से करता है।
एक दिन, एक शिष्य ने वाग्भट से पूछा, "गुरुदेव, भविष्य में नई बीमारियां आएंगी, नए वायरस आएंगे। क्या तब आपका यह ग्रंथ काम आएगा?"
वृद्ध वाग्भट ने डूबते सूर्य को देखते हुए कहा,
"पुत्र, बीमारियां बदल सकती हैं, उनके नाम बदल सकते हैं। लेकिन मनुष्य का शरीर इन्हीं तीन दोषों—वात, पित्त, कफ—से बना है और बना रहेगा। जब तक यह सृष्टि है, तब तक सूर्य, हवा और जल का प्रभाव शरीर पर पड़ेगा। मेरा ग्रंथ किसी बीमारी का नाम लेकर इलाज नहीं बताता, यह 'सिद्धांत' (Principles) बताता है। जो सिद्धांतों को समझ लेगा, वह किसी भी नई बीमारी का इलाज कर सकेगा।"
निष्कर्ष
वाग्भट चले गए, लेकिन 'अष्टांग हृदयम' अमर हो गया। यह केवल चिकित्सा की किताब नहीं है, यह 'जीवन जीने की कला' (Art of Living) है।
यह हमें सिखाती है कि स्वास्थ्य कोई मंजिल नहीं, एक यात्रा है। यह हमें सिखाती है कि डॉक्टर के पास जाने से पहले, हमें अपनी दिनचर्या, अपने भोजन और अपने विचारों को ठीक करना चाहिए।
जैसे दूध को मथने से मक्खन निकलता है, वैसे ही वाग्भट ने आयुर्वेद के महासागर को मथकर 'अष्टांग हृदयम' रूपी नवनीत (मक्खन) निकाला और मानवता को भेंट कर दिया।
"न हि सर्वमिदं सर्वं ज्ञातुं शक्यं नरेण तु..."
(एक मनुष्य के लिए सब कुछ जानना संभव नहीं है, लेकिन जो सार को जान लेता है, वह सब जान लेता है।)

0 टिप्पणियाँ