त्रिदोष: शरीर का बिगड़ा संगीत और एक वैद्य की विरासत

 

त्रिदोष: शरीर का बिगड़ा संगीत और एक वैद्य की विरासत
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 त्रिदोष क्या है? वात, पित्त और कफ को संतुलित करने की अद्भुत कहानी | Understanding Tridosha in Ayurveda
 जानिए आयुर्वेद के आधार स्तंभ 'त्रिदोष' (वात, पित्त, कफ) के रहस्य। रोहन और वैद्य हरिहर की यह भावुक कहानी सिखाएगी कि कैसे शरीर के इन तीन दोषों को संतुलित करके निरोगी जीवन जिया जा सकता है।


  कंक्रीट के जंगल में बिगड़ी लय

मुंबई की भागती-दौड़ती जिंदगी में, नरीमन पॉइंट की एक गगनचुंबी इमारत की 25वीं मंजिल पर रोहन का ऑफिस था। 32 साल का रोहन, एक सफल इन्वेस्टमेंट बैंकर, अपनी कुर्सी पर बैठा कांप रहा था। एसी का तापमान 18 डिग्री था, लेकिन रोहन को पसीना आ रहा था।

पिछले छह महीनों से उसके साथ कुछ अजीब हो रहा था। कभी उसका दिमाग इतना तेज चलता कि रात-रात भर नींद नहीं आती (वात का प्रकोप), कभी उसे इतनी भयानक एसिडिटी होती कि सीने में जलन मच जाती (पित्त का प्रकोप), और कभी-कभी सुबह उठने पर इतना भारीपन लगता कि बिस्तर से उठने की इच्छा ही नहीं होती (कफ का प्रकोप)।

उसने शहर के सबसे महंगे डॉक्टरों को दिखाया। एमआरआई, सिटी स्कैन, ब्लड टेस्ट—सब नॉर्मल थे। डॉक्टर कहते, "इट्स जस्ट स्ट्रेस, टेक अ ब्रेक।" लेकिन रोहन जानता था कि उसके शरीर के अंदर कोई तार टूट गया है। उसे लगता था जैसे वह एक बिना ब्रेक की गाड़ी चला रहा है।

एक दिन प्रेजेंटेशन के दौरान रोहन की आंखों के सामने अंधेरा छा गया। वह फर्श पर गिर पड़ा। जब आंख खुली, तो वह अस्पताल में था। डॉक्टर ने कहा, "बर्नआउट। तुम्हें तुरंत आराम की जरूरत है।"

हारकर रोहन ने अपनी मां को फोन किया। मां ने सिर्फ एक बात कही, "बेटा, गांव आजा। तेरे दादाजी तुझे बुला रहे हैं।"


 जड़ों की ओर वापसी

कोंकण का एक छोटा सा गांव—'माधवपुर'। चारों तरफ नारियल और सुपारी के पेड़, लाल मिट्टी और दूर तक फैला समुद्र। रोहन की ऑडी कार जब उसके पुश्तैनी घर के आंगन में रुकी, तो वहां एक अलग ही शांति थी।

तुलसी के चौरे के पास बैठे थे 85 साल के वैद्य हरिहर—रोहन के दादाजी। सफेद धोती, कंधे पर अंगवस्त्र और चेहरे पर एक ऐसा तेज जो किसी योगी के पास ही हो सकता है।

रोहन ने झुककर पैर छुए। दादाजी ने उसे गले नहीं लगाया, बल्कि उसकी कलाई पकड़ी।
"नाड़ी देख रहे हो दादाजी?" रोहन ने थकी हुई मुस्कान के साथ पूछा। "शहर के डॉक्टर मशीन से कुछ नहीं ढूंढ पाए, आप तीन उंगलियों से क्या जान लेंगे?"

दादाजी मुस्कुराए। "मशीनें शरीर के अंग (Parts) देखती हैं, बेटा। मैं शरीर का संगीत (Rhythm) सुन रहा हूं। तेरा संगीत बेसुरा हो गया है।"

उन्होंने रोहन का हाथ छोड़ा और कहा, "तेरे शरीर में 'त्रिदोष' का युद्ध चल रहा है। वात ने पित्त को भड़का दिया है और कफ सूख रहा है। तूने अपने शरीर को मशीन समझ लिया था, जबकि यह पंचतत्वों का एक पुतला है।"


  वात – वायु का बवंडर

अगली सुबह ब्रह्म मुहूर्त में दादाजी ने रोहन को उठाया। वे उसे समुद्र किनारे ले गए।
हवा तेज चल रही थी। सूखी पत्तियां उड़ रही थीं।

दादाजी बोले, "रोहन, इसे देख। यह हवा है। यह दिखाई नहीं देती, पर सब कुछ इसी से चलता है। आयुर्वेद में इसे 'वात' (Vata) कहते हैं। यह आकाश और वायु तत्व से बना है।"

"तेरा काम ऐसा है—हमेशा भागना, डेडलाइन्स, मल्टीटास्किंग। और तेरा भोजन? रूखा-सूखा, ठंडा, कभी भी खाना, कभी भी सोना। इससे तेरे शरीर की 'हवा' बिगड़ गई है। वात का गुण है—रूखापन, चंचलता और शीतलता।"

दादाजी ने समझाया, "जब वात बिगड़ता है, तो इंसान को चिंता (Anxiety) होती है, नींद नहीं आती, त्वचा रूखी हो जाती है और जोड़ों में कट-कट की आवाज आती है। तूने अपनी नींद बेचकर पैसा कमाया, इसलिए तेरा वात कुपित हो गया है। वात सभी रोगों का राजा है। अगर यह बिगड़ गया, तो बाकी दोनों (पित्त और कफ) को भी बिगाड़ देता है।"

रोहन को याद आया—उसे अक्सर लगता था कि उसका दिमाग कभी शांत नहीं होता। विचारों की आंधी चलती रहती थी। वह समझ गया कि यह 'वात' का ही असर था।


 पित्त – अग्नि का प्रकोप

दोपहर के समय, जब सूरज सिर पर था, दादाजी रोहन को रसोई में ले गए। वहां चूल्हे पर दाल पक रही थी।
"यह देख रोहन, अग्नि। अगर यह आग ठीक हो, तो भोजन पकता है। अगर ज्यादा हो, तो भोजन जल जाता है। इसे 'पित्त' (Pitta) कहते हैं। यह अग्नि और जल तत्व से बना है।"

दादाजी ने रोहन की आंखों में देखा। "तेरी आंखें लाल रहती हैं। तुझे गुस्सा बहुत जल्दी आता है। तुझे एसिडिटी होती है। यह सब पित्त के लक्षण हैं। तूने बहुत ज्यादा कॉफी, तीखा खाना और शराब पी है। और सबसे बड़ी बात—'प्रतिस्पर्धा' (Competition) की आग। तूने अपने शरीर को एक भट्ठी बना दिया है।"

"पित्त हमारे शरीर का मेटाबॉलिज्म है, बुद्धि है, तेज है। लेकिन जब यह बिगड़ता है, तो शरीर को अंदर से जलाने लगता है। छाले, फोड़े, और जलन—यह सब बिगड़े हुए पित्त की निशानी हैं।"

रोहन ने सिर झुका लिया। वह जानता था कि वह अपने जूनियर्स पर कितना चिल्लाता था। वह सफलता की भूख में खुद को जला रहा था।


  कफ – स्थिरता या रुकावट?

शाम को वे नदी किनारे बैठे थे। पानी शांत और गहरा था। मिट्टी गीली और भारी थी।
"यह 'कफ' (Kapha) है, रोहन," दादाजी ने गीली मिट्टी हाथ में लेते हुए कहा। "यह पृथ्वी और जल तत्व है। यह शरीर को जोड़कर रखता है, स्थिरता देता है, स्नेह (Lubrication) देता है।"

"तेरा वजन बढ़ रहा है, लेकिन ताकत नहीं है। तुझे आलस आता है। यह कफ की विकृति है। जब हम व्यायाम नहीं करते और भारी, मीठा, तला हुआ खाना खाते हैं, तो कफ शरीर के स्रोतों (Channels) को ब्लॉक कर देता है। जैसे नाली में कीचड़ जम जाता है।"

"कफ प्रेम और क्षमा का प्रतीक है, लेकिन बिगड़ने पर यह मोह और अवसाद (Depression) बन जाता है।"


  संतुलन की साधना

उस रात रोहन सो नहीं पाया। उसे लगा कि उसका पूरा जीवन इन तीन शब्दों में सिमट गया है—वात, पित्त, कफ। अगले दिन उसने दादाजी से पूछा, "तो अब इलाज क्या है? कौन सी गोली खाऊं?"

दादाजी हंसे। "फिर वही एलोपैथी वाली सोच। आयुर्वेद में हम लक्षणों को नहीं दबाते, हम संतुलन (Balance) वापस लाते हैं। तुझे अपनी 'दिनचर्या' बदलनी होगी।"

दादाजी ने रोहन का 'त्रिदोष संतुलन कार्यक्रम' शुरू किया:

  1. वात शमन (Calming Vata):

    • दादाजी ने रोज सुबह रोहन को तिल के तेल से 'अभ्यंग' (मालिश) देना शुरू किया। तेल की स्निग्धता और भारीपन ने वात के रूखेपन और हल्केपन को कम किया।
    • भोजन में गर्म, गीला और पौष्टिक खाना दिया गया (जैसे खिचड़ी, घी)।
    • नियम: "एक समय पर एक काम।" मल्टीटास्किंग बंद।
  2. पित्त शांति (Cooling Pitta):

    • दोपहर को नारियल पानी और सौंफ का पानी।
    • तीखा, खट्टा और कॉफी पूरी तरह बंद।
    • चांदनी रात में टहलना (Moon bathing) ताकि शरीर की गर्मी कम हो।
  3. कफ संतुलन (Energizing Kapha):

    • सुबह सूर्योदय से पहले उठना।
    • रोज 30 मिनट सूर्य नमस्कार और प्राणायाम।
    • दिन में सोना पूरी तरह वर्जित।

 संघर्ष और परिवर्तन

शुरुआत के 10 दिन रोहन के लिए नर्क समान थे। उसका शरीर कॉफी मांग रहा था, उसका दिमाग फोन मांग रहा था। उसे लगा कि यह तेल-मालिश और खिचड़ी से कुछ नहीं होगा। वह वापस जाने की सोचने लगा।

लेकिन 15वें दिन एक चमत्कार हुआ।
रोहन सुबह 5 बजे बिना अलार्म के उठ गया। जब वह बाहर आया, तो उसे हवा ठंडी और सुखद लगी, न कि चुभने वाली। उसके जोड़ों का दर्द गायब था। सबसे बड़ी बात—उसका दिमाग शांत था। विचारों की वह आंधी रुक चुकी थी।

उसने दादाजी को देखा जो तुलसी को जल दे रहे थे।
रोहन ने कहा, "दादाजी, आज मुझे भूख लगी है। असली भूख।"
दादाजी मुस्कुराए, "तेरी जठराग्नि (Digestive Fire) जाग गई है। तेरा पित्त अब भोजन जला नहीं रहा, उसे पचा रहा है।"


 नई शुरुआत

एक महीना बीत गया। रोहन का वजन 5 किलो कम हो गया था, लेकिन उसके चेहरे पर वह चमक थी जो पिछले 10 सालों में नहीं दिखी थी।
जाने का समय आ गया था। रोहन ने अपना लैपटॉप बैग उठाया, लेकिन इस बार वह भारी नहीं लगा।

उसने दादाजी के पैर छुए। "दादाजी, मैं शहर वापस जा रहा हूं, फिर से उसी जंगल में। क्या मैं फिर से बीमार पड़ जाऊंगा?"

दादाजी ने उसकी आंखों में देखा और कहा, "रोहन, त्रिदोष हर पल बदलता है। मौसम से, खाने से, भावनाओं से। संतुलन एक मंजिल नहीं, एक प्रक्रिया है। तुझे बस इतना याद रखना है:

  • जब मन भागने लगे (वात बढ़े), तो रुक जाना और गहरी सांस लेना।
  • जब गुस्सा आए (पित्त बढ़े), तो ठंडा पानी पीना।
  • जब आलस आए (कफ बढ़े), तो जूते पहनकर दौड़ना।"

"शरीर मंदिर है, बेटा। इसमें कचरा मत डालना। इसे सुन, यह तुझसे बात करता है।"


 

रोहन मुंबई लौट आया। ऑफिस वही था, काम वही था, लेकिन रोहन बदल चुका था। अब वह मीटिंग्स के बीच में गर्म पानी पीता था। वह लंच अपनी डेस्क पर नहीं, कैंटीन में शांति से करता था। रात को वह नेटफ्लिक्स नहीं, बल्कि तेल मालिश करके सोता था।

उसके कलीग्स पूछते, "रोहन, तूने कौन सा जिम ज्वॉइन किया? तू बहुत फ्रेश लग रहा है।"
रोहन मुस्कुराकर कहता, "मैंने जिम नहीं, अपनी प्रकृति (Nature) को ज्वॉइन किया है। मैंने अपने वात, पित्त और कफ से दोस्ती कर ली है।"

 
स्वास्थ्य का अर्थ केवल बीमारी का न होना नहीं है। स्वास्थ्य का अर्थ है—समदोषः समाग्निश्च समधातु मलक्रियाः। (जिसके दोष संतुलित हों, जिसकी पाचक अग्नि संतुलित हो, वही स्वस्थ है)।

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