ऋतुओं का नृत्य: आरोग्य की कुंजी

 ऋतुओं का नृत्य: आरोग्य की कुंजी

ritucharya

एक बीमार राज्य की पहेली
प्राचीन भारत में 'सुवर्णपुर' नाम का एक राज्य था। यह राज्य अपनी धन-संपदा के लिए प्रसिद्ध था, लेकिन वहाँ के लोग हमेशा बीमार रहते थे। कभी पूरा नगर कफ और खांसी से परेशान होता, तो कभी सब पित्त और बुखार से तपते।

राजा वीरसेन बहुत चिंतित थे। उनके राज्य में सबसे अच्छे वैद्य थे, सबसे महंगी औषधियाँ थीं, फिर भी कोई स्वस्थ नहीं था।

एक दिन, राज्य में महर्षि भारद्वाज के शिष्य, आयुषमान, का आगमन हुआ। आयुषमान युवा थे, लेकिन उनके चेहरे पर गजब का तेज था। राजा ने उन्हें दरबार में बुलाया और अपनी व्यथा सुनाई।

"ऋषिवर! मेरे राज्य को किसी की नज़र लग गई है। कोई न कोई महामारी हर दूसरे महीने फैल जाती है। क्या करूँ?"

आयुषमान ने मुस्कुराते हुए कहा, "राजन, आपके राज्य को नज़र नहीं लगी, बल्कि आपका राज्य प्रकृति के साथ 'तालमेल' खो बैठा है। आप लोग प्रकृति के विरुद्ध चल रहे हैं।"

राजा हैरान हुए। "प्रकृति के विरुद्ध? हम तो पूजा-पाठ करते हैं, वृक्ष लगाते हैं।"

"राजन, केवल वृक्ष लगाना ही प्रकृति प्रेम नहीं है। प्रकृति हर दो महीने में अपना रूप बदलती है, जिसे 'ऋतु' कहते हैं। जब बाहर का मौसम बदलता है, तो हमारे शरीर के अंदर का 'दोष' (वात, पित्त, कफ) भी बदलता है। यदि हम अपना खान-पान और रहन-सहन ऋतु के अनुसार नहीं बदलते, तो शरीर रोगी हो जाता है। इसे ही 'ऋतुचर्या' (Ritucharya) कहते हैं।"

आयुषमान ने कहा, "मैं आपको एक वर्ष तक 'ऋतु-चक्र' की यात्रा कराऊंगा। यदि आपकी प्रजा ने इसका पालन किया, तो औषधियों की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।"

शिशिर और वसंत - कफ का प्रकोप और समाधान
यात्रा शुरू हुई 'शिशिर ऋतु' (Late Winter - जनवरी-फरवरी) से।
ठंड अपने चरम पर थी। हवाएं रूखी थीं।
आयुषमान ने देखा कि लोग सुबह देर तक सोते हैं और भारी, मीठा भोजन करते हैं।

"राजन," आयुषमान ने समझाया, "शिशिर में ठंड के कारण हमारी जठराग्नि (Digestive Fire) बहुत प्रबल होती है। इस समय हमें पौष्टिक और भारी भोजन (जैसे घी, दूध, उड़द, गन्ने के उत्पाद) खाना चाहिए। लेकिन आलस्य छोड़ना होगा। तेल मालिश (अभ्यंग) और व्यायाम इस ऋतु में अनिवार्य है।"

फिर आया 'वसंत ऋतु' (Spring - मार्च-अप्रैल)।
बर्फ पिघलने लगी थी, फूल खिल रहे थे। मौसम सुहावना था। लेकिन नगर में लोगों को खांसी, जुकाम और भारीपन महसूस होने लगा।

आयुषमान ने चेतावनी दी, "सावधान राजन! वसंत आ गया है। जैसे सूर्य की गर्मी से हिमालय की बर्फ पिघलती है, वैसे ही शरीर में जमा हुआ 'कफ' (Mucus) पिघलने लगता है। यही कफ बिमारियों का कारण है।"

उन्होंने आदेश दिया:

क्या न करें: दिन में सोना पूरी तरह बंद। भारी, तैलीय, मीठा और ठंडा भोजन त्याग दें।
क्या करें: पुराने जौ, मूंग की दाल, और शहद का सेवन करें। कड़वे (Neem) और कसैले रसों का प्रयोग करें। कफ को बाहर निकालने के लिए 'वमन' (Vomiting therapy) सबसे उत्तम है।
प्रजा ने वसंत में हल्का भोजन और व्यायाम शुरू किया। चमत्कारिक रूप से, उस साल वसंत में कोई बीमार नहीं पड़ा।

ग्रीष्म - सूर्य का ताप और जल का महत्व
अब 'ग्रीष्म ऋतु' (Summer - मई-जून) आ गई थी। सूर्य आग उगल रहा था। नदियां सूखने लगी थीं।
लोगों के शरीर से बल क्षीण हो रहा था।

आयुषमान ने कहा, "राजन, यह 'आदान काल' है। सूर्य हमारी ऊर्जा सोख रहा है। इस समय कफ शांत होता है, लेकिन 'वात' (वायु) बढ़ने लगती है।"

ग्रीष्म ऋतुचर्या के नियम:

आहार: नमकीन, तीखा और खट्टा भोजन पूरी तरह बंद कर दें (ये शरीर में गर्मी बढ़ाते हैं)। मधुर, शीतल और द्रव (Liquid) पदार्थ लें। जैसे—चावल, दूध, घी, अंगूर, नारियल पानी, और शक्कर का पना।
विहार: दिन में सोना इस ऋतु में अमृत समान है (बाकी ऋतुओं में वर्जित है)। ठंडे घरों में रहें, चंदन का लेप लगाएं और सूती वस्त्र पहनें।
व्यायाम: बहुत कम या न करें, क्योंकि शरीर पहले ही थका हुआ है।
सुवर्णपुर के लोगों ने मसालेदार भोजन छोड़कर सत्तू और फलों का रस पीना शुरू किया। लू और डिहाइड्रेशन के मामले शून्य हो गए।

वर्षा - वात का प्रकोप और अग्नि की रक्षा
आकाश में काले बादल छा गए। 'वर्षा ऋतु' (Monsoon - जुलाई-अगस्त) का आगमन हुआ। मिट्टी की सोंधी खुशबू आई, लेकिन साथ ही मच्छरों और कीड़ों का प्रकोप भी बढ़ा।
लोग खुश होकर पकौड़े और तली-भुनी चीजें खाने लगे।

आयुषमान ने तुरंत रोका। "ठहरो! यह सबसे खतरनाक ऋतु है। ग्रीष्म में जो 'वात' जमा हुआ था, वह अब वर्षा की ठंडक से 'प्रकुपित' (Aggravate) हो जाएगा। साथ ही, नमी के कारण हमारी पाचन अग्नि सबसे मंद (Weak) हो जाती है।"



आहार: पानी हमेशा उबालकर पिएं। भोजन में खट्टा, नमकीन और स्निग्ध (Oily) पदार्थ थोड़ा ले सकते हैं ताकि वात शांत हो, लेकिन वह पचने में हल्का होना चाहिए। पुराने अनाज, खिचड़ी और सूप (Yusha) श्रेष्ठ हैं। शहद का प्रयोग करें।
विहार: दिन में सोना विष समान है। गीले कपड़े न पहनें। घर में 'धूपन' (Fumigation with Neem/Loban) करें।
चिकित्सा: वात को नियंत्रित करने के लिए 'बस्ती' (Enema) कर्म सर्वोत्तम है।
राजा ने देखा कि वर्षा ऋतु में अक्सर होने वाले जोड़ों के दर्द और पेट के इन्फेक्शन इस बार नदारद थे।

शरद - पित्त का उबाल
बारिश थम गई। आकाश साफ नीला हो गया। 'शरद ऋतु' (Autumn - सितंबर-अक्टूबर) आ गई। धूप फिर से तेज हो गई, लेकिन रातें ठंडी थीं। इसे 'रोगों की माता' भी कहा जाता है।
लोगों को त्वचा रोग, फोड़े-फुंसियां और बुखार होने लगे।

आयुषमान ने समझाया, "राजन, वर्षा ऋतु में जो खट्टा-नम��ीन खाया था, उससे शरीर में 'पित्त' (Bile/Heat) जमा हो गया था। अब शरद की तीखी धूप उस पित्त को उबाल रही है।"



आहार: "तप्तस्य तप्तस्य पुनर्नवम..." अर्थात जब भूख तेज लगे तभी खाएं। घी का सेवन बढ़ा दें (घी पित्त नाशक है)। कड़वी (Bitter), मीठी और कसैली चीजें खाएं। जैसे—परवल, करेला, मुनक्का, और चावल। दही और तेल बिल्कुल बंद।
हंसोदक: "दिन में सूर्य की धूप और रात में चंद्रमा की चांदनी में रखा हुआ जल 'हंसोदक' कहलाता है। यह अमृत तुल्य है, इसे पिएं।"
चिकित्सा: शरीर से गर्मी निकालने के लिए 'विरेचन' (Purgation) और 'रक्तमोक्षण' (Bloodletting) सबसे अच्छा है।
हेमंत - बल की प्राप्ति
अंत में, 'हेमंत ऋतु' (Early Winter - नवंबर-दिसंबर) आई। मौसम सुहावना और ठंडा हो गया।
आयुषमान मुस्कुराए। "राजन, यह स्वास्थ्य बनाने का सर्वोत्तम समय है। अब पित्त शांत हो गया है। पाचन अग्नि फिर से प्रबल हो गई है।"



जितना हो सके पौष्टिक भोजन करें—उड़द, गन्ना, दूध, मलाई, नए चावल।
नियमित व्यायाम और कुश्ती करें।
गर्म पानी से स्नान और गर्म कपड़े पहनें।
स्वस्थ सुवर्णपुर
एक वर्ष पूरा हुआ।
सुवर्णपुर अब बदल चुका था। अस्पतालों में भीड़ नहीं थी। लोग मौसम बदलते ही डरते नहीं थे, बल्कि अपनी दिनचर्या बदल लेते थे।
राजा वीरसेन ने आयुषमान के चरणों में सिर झुकाया। "ऋषिवर, आपने हमें दवा नहीं, जीवन जीने की कला दी है।"

आयुषमान ने विदा लेते हुए अंतिम संदेश दिया:
"यस्य ऋतौ विपर्ययः..."
(जो व्यक्ति ऋतु के अनुसार अपने आहार-विहार को बदल लेता है, रोग उसके पास वैसे ही नहीं आते, जैसे शेर के पास हिरण नहीं आता।)

"शरीर प्रकृति का ही अंश है। जब बाहर सर्दी हो, तो अंदर गर्मी पैदा करो। जब बाहर गर्मी हो, तो अंदर शीतलता रखो। यही संतुलन (Balance) ही स्वास्थ्य है।"

सुवर्णपुर का नाम अब 'आरोग्यपुर' हो गया था, क्योंकि उन्होंने ऋतुचर्या के रहस्य को समझ लिया था।


ऋतु (Season) दोष स्थिति क्या खाएं (Do's) क्या न खाएं (Don'ts) विशेष क्रिया
शिशिर (Late Winter) कफ जमा होता है भारी, पौष्टिक, मीठा, खट्टा वात-वर्धक (रूखा-सूखा) तेल मालिश
वसंत (Spring) कफ पिघलता है (प्रकोप) हल्का, कड़वा, तीखा, पुराना अनाज, शहद भारी, ठंडा, दिन में सोना वमन (Vomiting therapy)
ग्रीष्म (Summer) वात जमा होता है मीठा, ठंडा, द्रव (Liquid), चावल, दूध तीखा, खट्टा, गरम दिन में सोना (Allowed)

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