सूर्य-नाद: ब्रह्मांड की धड़कन
शून्य में गूँजता शोरवर्ष 2035। लद्दाख के हानले में स्थित 'भारतीय खगोलीय वेधशाला' (Indian Astronomical Observatory)।
डॉ. अहान राय, भारत के सबसे युवा और प्रतिभाशाली एस्ट्रोफिजिसिस्ट (खगोल भौतिकीविद्), अपनी विशाल स्क्रीन के सामने बैठे थे। बाहर का तापमान शून्य से 20 डिग्री नीचे था, लेकिन अहान के माथे पर पसीना था। पिछले तीन दिनों से उनका 'सोलर डायनेमिक्स ऑब्जर्वेटरी' (SDO) सैटेलाइट कुछ ऐसा डेटा भेज रहा था, जो विज्ञान के नियमों को चुनौती दे रहा था।
सूर्य, हमारे सौर मंडल का पिता, एक विशाल आग का गोला है। वैज्ञानिक जानते हैं कि सूर्य की सतह पर लगातार विस्फोट होते रहते हैं। वहाँ शोर होता है, लेकिन अंतरिक्ष के निर्वात (Vacuum) में वह शोर सुनाई नहीं देता। वैज्ञानिकों ने उस 'इलेक्ट्रोमैग्नेटिक वाइब्रेशन' को रिकॉर्ड किया था और उसे मनुष्य के सुनने योग्य ध्वनि (Audio) में बदला था।
आमतौर पर यह ध्वनि एक भिनभिनाहट या 'हissing' जैसी होती है। लेकिन इस बार... कुछ अलग था।
अहान ने अपने हेडफोन को कानों पर कस लिया और वॉल्यूम बढ़ाया।
ध्वनि आ रही थी—एक गहरी, लयबद्ध, और अत्यंत भारी गूंज।
हम्म्म्म्म्म्म्........
यह किसी विस्फोट का शोर नहीं था। यह एक 'पैटर्न' था। ऐसा लग रहा था जैसे कोई विशालकाय गला, ब्रह्मांड के केंद्र में बैठकर एक ही स्वर को अनंत काल से गा रहा हो।
"सर, फ्रीक्वेंसी स्थिर है," अहान के सहायक, विक्रम ने कहा। "यह ठीक 126.22 हर्ट्ज़ (Hz) के आसपास घूम रही है। यह प्राकृतिक नहीं लग रहा। क्या यह एलियंस का संकेत है?"
अहान ने सिर हिलाया। "नहीं विक्रम। यह सिग्नल सूर्य के कोर (Core) से आ रहा है। यह उसका अपना कंपन है। लेकिन यह इतना... सुरीला कैसे हो सकता है? यह शोर नहीं, यह संगीत जैसा है।"
अहान ने उस ध्वनि को सुपरकंप्यूटर में डाला। कंप्यूटर ने उस ध्वनि तरंग (Sound Wave) का ग्राफ़ बनाया। जब ग्राफ स्क्रीन पर आया, तो अहान की आँखें फटी रह गईं। तरंगें बेतरतीब नहीं थीं। वे एक पूर्ण ज्यामितीय आकार (Geometric Shape) बना रही थीं—एक ऐसा आकार जो अहान ने बचपन में अपने दादाजी की पुरानी किताबों में देखा था।
वह ध्वनि उसे बेचैन कर रही थी। वह लैब से बाहर निकला और लद्दाख के साफ आसमान में चमकते तारों को देखने लगा। उसके कानों में वह गूंज अब भी बज रही थी। उसे लगा जैसे वह ध्वनि उसे कहीं बुला रही है।
विज्ञान की सीमा और ऋषियों का द्वार
अहान ने दुनिया भर के वैज्ञानिकों से संपर्क किया। नासा, ईएसए (ESA)—सबने पुष्टि की कि सूर्य से एक अजीब 'हम' (Hum) आ रहा है, लेकिन कोई इसका अर्थ नहीं समझ पा रहा था।
थक हारकर, अहान ने अपने दादाजी की डायरी निकाली। उनके दादाजी, पंडित दीनानाथ, एक संस्कृत विद्वान थे। अहान ने डायरी के पन्ने पलटे और एक श्लोक पर उसकी उंगली रुक गई।
“यदेतन्मण्डलं तपति, तन्महदुक्थं, ता ऋचः, स ऋचां रसो... ओमित्ये तदक्षरमुद्गीथमुपासीत...” (छांदोग्य उपनिषद)
अर्थात: यह जो सूर्य तप रहा है, वही ओंकार है। सूर्य 'उद्गीथ' (ॐ) का गान कर रहा है।
अहान, जो एक नास्तिक वैज्ञानिक था, इसे मात्र कविता मानता था। लेकिन आज, उसका डेटा और यह श्लोक एक ही बात कह रहे थे। क्या हमारे ऋषि हजारों साल पहले वह जानते थे जिसे नासा आज रिकॉर्ड कर रहा है?
सच्चाई जानने के लिए अहान ने छुट्टी ली। वह अपनी आधुनिक मशीनों को छोड़कर उत्तराखंड के हिमालय की ओर चल पड़ा। उसे तलाश थी 'स्वामी चिदानंद' की, जिनका ज़िक्र उसके दादाजी अक्सर करते थे। कहा जाता था कि स्वामीजी 'नाद योगी' हैं।
गंगोत्री की गुफा
गंगोत्री से 18 किलोमीटर ऊपर, भोजवासा के घने जंगलों और ग्लेशियरों के बीच एक छिपी हुई गुफा थी। अहान जब वहाँ पहुँचा, तो वह सांस के लिए हांफ रहा था। ठंड हड्डियों को गला रही थी।
गुफा के बाहर एक वृद्ध सन्यासी बैठे थे। उनके शरीर पर केवल एक पतला वस्त्र था, फिर भी उनके चेहरे पर एक अलौकिक तेज और गर्मी थी। वे स्वामी चिदानंद थे।
अहान ने प्रणाम किया और अपना लैपटॉप खोल दिया। "स्वामीजी, मैं एक वैज्ञानिक हूँ। मैंने सूर्य की एक आवाज़ रिकॉर्ड की है। विज्ञान इसे समझ नहीं पा रहा। मेरे दादाजी की डायरी मुझे यहाँ ले आई।"
स्वामीजी ने लैपटॉप की स्क्रीन पर चलती लकीरों को देखा और मुस्कुराए। "बेटा, तुम इस यंत्र (Laptop) से उस अनंत को नापने की कोशिश कर रहे हो? यह मशीन केवल 'तरंग' (Wave) को पकड़ सकती है, उसके 'भाव' को नहीं।"
"तो यह आवाज़ क्या है?" अहान ने अधीरता से पूछा।
"आंखें बंद करो," स्वामीजी ने आदेश दिया।
अहान ने संकोच के साथ आंखें बंद कीं।
"क्या सुन रहे हो?" स्वामीजी ने पूछा।
"हवा की आवाज़, गंगा का प्रवाह, और मेरी अपनी धड़कन," अहान ने कहा।
"और गहरा जाओ," स्वामीजी बोले। "उस धड़कन के पीछे भी एक धड़कन है। उस सन्नाटे के पीछे एक शोर है। सूर्य केवल आकाश में नहीं है अहान, एक सूर्य तुम्हारे अंदर भी है—मणिपुर चक्र में। बाहर का सूर्य और भीतर का सूर्य एक ही भाषा बोलते हैं।"
अनहद नाद का रहस्य
अगले कुछ दिनों तक अहान वहीं रहा। स्वामीजी ने उसे कोई मंत्र नहीं रटाया, बल्कि उसे 'नाद अनुसंधान' (ध्यान की एक विधि) सिखाया।
"देखो अहान," स्वामीजी ने एक सुबह समझाया, "ब्रह्मांड की उत्पत्ति 'बिग बैंग' से हुई, यह तुम्हारा विज्ञान कहता है। बैंग यानी धमाका। धमाका यानी आवाज़। हमारे ऋषियों ने इसे 'नाद ब्रह्म' कहा। जब सृष्टि रची गई, तो एक आदि ध्वनि गूँजी। वह ध्वनि कभी रुकी नहीं। वह आज भी गूँज रही है। सूर्य, तारे, ग्रह—सब उसी एक ध्वनि के अलग-अलग रूप हैं।"
"और वह ध्वनि 'ॐ' है?" अहान ने पूछा।
"ॐ कोई शब्द नहीं है जिसे मुँह से बोला जाए," स्वामीजी ने गंभीरता से कहा। "ॐ वह ध्वनि है जो तब सुनाई देती है जब बाकी सारी आवाजें बंद हो जाती हैं। यह ब्रह्मांड के इंजन की आवाज़ है। यह सूर्य के जलने की, प्राणों के चलने की, और परमाणुओं के घूमने की संयुक्त आवाज़ है।"
स्वामीजी ने अहान को सूर्योदय के समय ध्यान करने को कहा। "अपने कानों को बाहर की आवाज़ों से बंद करो और अपनी चेतना को नाभि (Navel) पर ले जाओ। सूर्य से जो आवाज़ आ रही है, उसे अपने अंदर सुनने की कोशिश करो।"
फ्रीक्वेंसी का मिलन
सातवें दिन की सुबह थी। अहान एक चट्टान पर बैठा था। सामने हिमालय की चोटियों पर सूर्य की पहली किरण पड़ रही थी। उसने अपने कानों में 'षण्मुखी मुद्रा' लगाई (कान, आंख, नाक बंद करने की मुद्रा)।
पहले उसे केवल सन्नाटा लगा। फिर धीरे-धीरे, उसे अपने दायें कान में एक झींगुर जैसी आवाज़ सुनाई दी। वह ध्यान लगाता रहा। वह आवाज़ बदली, अब वह एक भंवरे की गुंजन जैसी हो गई।
अहान का वैज्ञानिक दिमाग विश्लेषण कर रहा था—यह मेरे नर्वस सिस्टम का ब्लड फ्लो हो सकता है।
लेकिन तभी, कुछ अद्भुत हुआ।
जैसे ही सूर्य क्षितिज से ऊपर आया, अहान के भीतर की वह गुंजन तेज़ हो गई। वह अब भंवरे की आवाज़ नहीं थी। वह एक भारी, गंभीर और अत्यंत शक्तिशाली गूँज थी।
अउउउउउउउउम्मम्मम्मम्म.......
यह ठीक वैसी ही आवाज़ थी जैसी उसने अपनी लैब में रिकॉर्ड की थी!
अहान का शरीर कांपने लगा। यह आवाज़ उसके कानों से नहीं आ रही थी, यह उसके रीढ़ की हड्डी से, उसके हर सेल (Cell) से आ रही थी। उसे लगा जैसे वह अब उस चट्टान पर नहीं बैठा है। उसे लगा जैसे वह सूर्य के गर्भ में है।
वह 'कंपन' (Frequency) और सूर्य का 'कंपन' एक हो गए थे। उसे समझ आ गया कि 126.22 Hz केवल एक नंबर नहीं था। यह वह आवृत्ति थी जिस पर पूरी सृष्टि नाच रही थी।
अचानक, उसके सामने का दृश्य बदल गया। उसे लगा कि वह विशाल अग्नि के महासागर को देख रहा है, लेकिन वह अग्नि उसे जला नहीं रही, बल्कि उसे ऊर्जा दे रही है। उस अग्नि के लपटों से वही ध्वनि निकल रही थी—ॐ... ॐ... ॐ...। यह एक 'अनाहत' नाद था—बिना किसी दो चीजों के टकराए उत्पन्न होने वाली आवाज़।
विज्ञान और ज्ञान का अद्वैत
जब अहान समाधि से बाहर आया, तो सूरज ऊपर चढ़ चुका था। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे। ये दुख के आँसू नहीं, विस्मय (Awe) के आँसू थे।
स्वामी चिदानंद मुस्कुराते हुए खड़े थे। "मिल गया जवाब?"
अहान ने उनके चरण स्पर्श किए। "स्वामीजी, मैं गलत था। मैं ध्वनि को 'सुन' रहा था, जबकि इसे 'महसूस' करना था। सूर्य कोई आग का गोला नहीं है, वह एक चैतन्य सत्ता है। और 'ॐ' उसका गीत है।"
अहान ने अपना लैपटॉप खोला। उसने अपनी रिकॉर्ड की हुई सोलर साउंड को प्ले किया और साथ में खुद 'ॐ' का उच्चारण किया। दोनों की फ्रीक्वेंसी एकदम मेल खा रही थी। 'सिनर्जी' (Synergy) पूर्ण थी।
स्वामीजी ने कहा, "यही गायत्री है, यही वेद है। सूर्य हमें केवल प्रकाश नहीं देता, वह हमें 'लय' (Rhythm) देता है। जब इंसान की आंतरिक लय सूर्य की लय से टूट जाती है, तो वह बीमार और अशांत हो जाता है। ॐ का जाप उस लय को फिर से जोड़ने का तरीका है।"
विश्व के नाम संदेश
अहान वापस अपनी वेधशाला लौटा। उसके सहकर्मी उसे देखकर हैरान थे। अहान के चेहरे पर तनाव नहीं, एक गहरा ठहराव था।
उसने अपनी रिसर्च पेपर तैयार की। शीर्षक था: "The Solar Symphony: Decoding the Cosmic Om" (सूर्य का संगीत: ब्रह्मांडीय ॐ का रहस्योद्घाटन)।
उसने दुनिया को बताया कि सूर्य का शोर 'रैंडम' नहीं है। यह एक व्यवस्थित आवृत्ति है जो मानव मस्तिष्क को शांत और एकाग्र करने की क्षमता रखती है। उसने सिद्ध किया कि हजारों साल पहले भारतीय ऋषियों ने बिना किसी टेलिस्कोप के, केवल ध्यान के माध्यम से इस ब्रह्मांडीय सत्य को जान लिया था।
उस दिन के बाद, अहान ने विज्ञान नहीं छोड़ा, लेकिन उसका दृष्टिकोण बदल गया। अब वह तारों को केवल गैस का गुब्बारा नहीं, बल्कि ब्रह्मांड के वाद्ययंत्र मानता था।
वह अक्सर अपनी लैब में रात को अकेले बैठता, मशीनों को बंद करता, और उस 'अनहद नाद' को सुनता जो सूर्य से, तारों से, और खुद उसके भीतर से लगातार गूँज रहा था—ॐ।

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