नाभि - प्राणों का केंद्र बिंदु

 

 नाभि - प्राणों का केंद्र बिंदु
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  विज्ञान का अहंकार और एक अनसुलझी पहेली

डॉ. विहान मल्होत्रा मुंबई के सबसे प्रतिष्ठित न्यूरोसर्जन थे। उनका जीवन एमआरआई स्कैन, शल्य चिकित्सा (Surgery) और दवाइयों के रसायनिक सूत्रों के बीच गुजरता था। उनके लिए शरीर एक मशीन था और बीमारियाँ उस मशीन में आई तकनीकी खराबी। आत्मा, प्राण-ऊर्जा या नाड़ियों का उनके शब्दकोश में कोई स्थान नहीं था।

लेकिन, उनका यह विश्वास तब डगमगा गया जब उनकी अपनी 7 साल की बेटी, आन्या, एक अजीब बीमारी की चपेट में आ गई। आन्या को न कोई संक्रमण था, न कोई चोट। फिर भी, वह दिन-ब-दिन सूखती जा रही थी। उसे भूख नहीं लगती थी, पेट में हमेशा एक मरोड़ रहती, और सबसे बड़ी बात—उसकी आँखों की चमक बुझ गई थी। शहर के बड़े-बड़े गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट और पीडियाट्रिशियन हार मान चुके थे। रिपोर्टें सामान्य थीं, लेकिन बच्ची मरणासन्न थी।

हताश होकर, विहान की माँ, सावित्री देवी ने कहा, "विहान, तू दुनिया का बड़ा डॉक्टर होगा, पर मेरी बात मान। इसे गाँव ले चल, वैद्य हरिहर काका के पास। मुझे लगता है इसकी 'धरण' (नाभि) डिग गई है।"

विहान झल्ला उठा। "माँ! 21वीं सदी में आप नाभि खिसकने जैसी अंधविश्वासी बातें कर रही हैं? यह मेडिकल साइंस का केस है।"

"तेरा साइंस मेरी पोती को ठीक कर पाया क्या?" माँ ने कठोर स्वर में पूछा। विहान के पास कोई जवाब नहीं था। हारकर, वह अपनी मर्सिडीज में आन्या और माँ को बैठाकर कोंकण के एक सुदूर गाँव 'माधवपुर' की ओर चल पड़ा।

  जड़ों की ओर वापसी

माधवपुर एक शांत गाँव था जहाँ आज भी बिजली से ज़्यादा सूर्य की रोशनी का महत्व था। वैद्य हरिहर का आश्रम नदी किनारे स्थित था। 85 वर्ष के वैद्य हरिहर का शरीर सूखा हुआ लेकिन कसी हुई मांसपेशियों वाला था। उनकी आँखों में एक बच्चे जैसी जिज्ञासा और एक ऋषि जैसी शांति थी।

विहान ने अपनी डॉक्टरी फाइल मेज पर पटक दी। "वैद्य जी, यह सारी रिपोर्ट्स हैं। इसे ईटिंग डिसऑर्डर है या शायद कोई ऑटो-इम्यून डिजीज जो पकड़ में नहीं आ रही।"

हरिहर काका ने फाइल को हाथ भी नहीं लगाया। उन्होंने मुस्कुराते हुए आन्या को पास बुलाया। उन्होंने बच्ची की कलाई नहीं पकड़ी, न ही माथा छूआ। उन्होंने उसे सीधा लिटाया और अपनी उंगलियाँ सीधे उसकी नाभि (Navel) पर रख दीं।

विहान चिढ़कर देख रहा था। वैद्य जी ने अपनी उंगलियों से नाभि के केंद्र को दबाया, फिर दोनों पैरों के अंगूठों को मिलाकर देखा। बाएँ पैर का अंगूठा, दाएँ से आधा इंच छोटा दिख रहा था।

"डॉक्टर साहब," वैद्य जी ने शांत स्वर में कहा, "शरीर रूपी वृक्ष की जड़ें सूख रही हैं, और आप पत्तों पर पानी छिड़क रहे हैं। बच्ची की नाभि अपने केंद्र से ऊपर की ओर खिसक गई है। जब मूल (जड़) ही अपने स्थान पर नहीं है, तो पोषण शरीर तक कैसे पहुँचेगा?"

"नाभि?" विहान ने उपहास से कहा। "वह तो बस जन्म के बाद बचा हुआ एक निशान (Scar) है। उसका शरीर की कार्यप्रणाली से क्या लेना-देना?"

वैद्य हरिहर ने विहान की आँखों में देखा और कहा, "यही तुम्हारी भूल है। आज रात यहीं रुको। कल सुबह ब्रह्म मुहूर्त में मैं तुम्हें समझाऊंगा कि यह 'निशान' नहीं, बल्कि 'ब्रह्मांड' है।"

  जीवन का प्रथम द्वार

अगली सुबह, नदी के घाट पर कोहरा छाया हुआ था। वैद्य हरिहर ने विहान को अपने पास बैठाया।

"विहान, जब तुम अपनी माँ के गर्भ में थे, तब तुम्हारा मुँह बंद था, नाक बंद थी। तुम साँस नहीं लेते थे, तुम खाना नहीं खाते थे। फिर तुम नौ महीने तक जीवित कैसे रहे? तुम्हारा विकास कैसे हुआ?"

विहान ने रटा-रटाया जवाब दिया, "गर्भनाल (Umbilical Cord) के ज़रिए। माँ के शरीर से रक्त और पोषण बच्चे तक पहुँचता है।"

"बिल्कुल सही," वैद्य जी बोले। "लेकिन वह नाल बच्चे के शरीर में कहाँ जुड़ती है? नाभि पर। इसका अर्थ यह हुआ कि नाभि जीवन का प्रवेश द्वार है। मनुष्य का निर्माण इसी एक बिंदु से शुरू होता है। जब एक बीज से वृक्ष बनता है, तो बीज तने के बीच में कहीं लुप्त हो जाता है, लेकिन उसका अस्तित्व पूरे वृक्ष को थामे रहता है। वैसे ही, हमारे शरीर का निर्माण नाभि से शुरू होकर बाहर की ओर फैलता है।"

वैद्य जी ने एक गहरा रहस्य खोला, "जन्म के बाद डॉक्टर नाल काट देते हैं, लेकिन क्या ऊर्जा का वह प्रवाह खत्म हो जाता है? नहीं। नाभि शरीर का 'सेंटर ऑफ ग्रेविटी' (गुरुत्वाकर्षण केंद्र) है। यह शरीर का मध्य बिंदु है। जब तक यह केंद्र में है, ऊर्जा का प्रवाह ऊपर (मस्तिष्क) और नीचे (पैरों) समान रूप से होता है। जैसे ही यह खिसकता है, शरीर का पूरा तंत्र गड़बड़ा जाता है।"

 72,000 नाड़ियों का संगम

वैद्य जी ने जमीन पर एक चित्र बनाया। एक चक्र, और उससे निकलती हुई हजारों रेखाएं।

"आयुर्वेद और योग शास्त्र के अनुसार, हमारे शरीर में 72,000 ऊर्जा वाहिकाएं हैं, जिन्हें 'नाड़ियाँ' कहते हैं। ये रक्त धमनियां नहीं, बल्कि प्राण-ऊर्जा (Bio-energy) के रास्ते हैं। इन 72,000 नाड़ियों का उद्गम स्थल और मिलन स्थल नाभि ही है। इसे 'मणिपुर चक्र' कहा जाता है। मणिपुर का अर्थ है—मणियों का शहर। यहाँ अग्नि तत्व का वास है।"

विहान ध्यान से सुन रहा था। यह एनाटॉमी की किताबों में नहीं था, लेकिन तर्कपूर्ण लग रहा था।

वैद्य जी ने आगे कहा, "नाभि के ठीक पीछे एक ग्रंथि होती है जिसे 'पेचोटी' (Pechoti) कहते हैं। आधुनिक विज्ञान इसे शायद अभी तक ढूँढ नहीं पाया है या इसे 'मेसेंटरिक' नर्व्स का गुच्छा मानता है। यह ग्रंथि शरीर के हर अंग से जुड़ी है। जब हम माँ के पेट में होते हैं, तो इसी नाभि से दिमाग, दिल, लीवर और किडनी का निर्माण होता है। इसलिए, जन्म के बाद भी, अगर नाभि पर सही औषधि (तेल) लगाई जाए, तो वह उन सूखी हुई नाड़ियों के माध्यम से संबंधित अंग तक पहुँच सकती है।"

"क्या सबूत है इसका?" विहान ने पूछा।

"सबूत तुम्हारी बेटी होगी," वैद्य जी ने कहा।

  नाभि पूरण - चिकित्सा का चमत्कार

वैद्य हरिहर ने सरसों का तेल गुनगुना किया। उन्होंने आन्या को लिटाया। पहले उन्होंने उसके पैरों की नसें खींचीं (एक विशेष मालिश) ताकि मांसपेशियों का तनाव कम हो और नाभि अपनी जगह पर वापस आ सके। इसे 'नाभि बिठाना' कहते हैं।

फिर उन्होंने एक अद्भुत क्रिया की। उन्होंने आन्या की नाभि के चारों ओर आटे का एक घेरा बनाया और उसमें गुनगुना तेल भर दिया। इसे 'नाभि पूरण' या 'नाभि बस्ती' कहते हैं।

"देखो विहान," वैद्य जी समझाते गए, "नाभि की त्वचा शरीर की सबसे पतली और सबसे अधिक अवशोषक (Absorbent) त्वचा होती है। यहाँ तेल डालते ही यह सीधे उन 72,000 नाड़ियों में फैलने लगता है। चूंकि आन्या का पाचन तंत्र (जठराग्नि) बुझ चुका है, यह तेल उस अग्नि को फिर से प्रज्वलित करेगा।"

लगभग 20 मिनट तक वह तेल नाभि में रहा। आन्या, जो पिछले कई हफ्तों से चिड़चिड़ी थी और ठीक से सो नहीं पा रही थी, प्रक्रिया के दौरान ही गहरी नींद में सो गई।

विहान हैरान था। उसने आन्या के चेहरे पर एक हल्का गुलाबीपन देखा जो महीनों से गायब था।

  ब्रह्मांड से जुड़ाव

शाम को विहान और वैद्य जी फिर मिले। विहान का अहंकार अब जिज्ञासा में बदल चुका था।

"वैद्य जी, आपने कहा था कि यह केवल शरीर नहीं, ब्रह्मांड से जुड़ा है। वह कैसे?"

वैद्य जी ने आकाश की ओर इशारा किया। "विहान, हमारा शरीर पंचतत्वों से बना है। नाभि 'अग्नि' का स्थान है। और अग्नि ही भोजन को पचाती है, विचारों को पचाती है और जीवन को ऊर्जा देती है। क्या तुमने कभी गौर किया है? जब किसी व्यक्ति को बहुत डर लगता है, तो सबसे पहले उसके पेट में मरोड़ उठती है। जब कोई बहुत खुश होता है, तो पेट में 'गुदगुदी' होती है। क्यों? क्योंकि नाभि हमारा दूसरा मस्तिष्क (Second Brain) है। आधुनिक विज्ञान अब इसे 'एन्टेरिक नर्वस सिस्टम' (Enteric Nervous System) कहता है और मानता है कि ज़्यादातर सेरोटोनिन (खुशी का हार्मोन) पेट में बनता है। हमारे ऋषि यह हजारों साल पहले जानते थे।"

उन्होंने आगे कहा, "सिर्फ शारीरिक ही नहीं, नाभि भावनाओं का भी केंद्र है। एक बच्चा जब डरता है, तो माँ के पेट में छिपना चाहता है। यह नाभि का ही आकर्षण है। जो लोग अपनी नाभि के प्रति जागरूक होते हैं, उनका आत्मविश्वास अडिग होता है। जिनकी नाभि कमजोर होती है, वे डरपोक और अनिर्णायक होते हैं।"

  स्वयं का अनुभव

"क्या मैं अपनी नाभि चेक कर सकता हूँ?" विहान ने झिझकते हुए पूछा।

वैद्य जी हँसे। उन्होंने विहान को लिटाया और एक धागा लिया। धागे का एक सिरा विहान की नाभि पर रखा और दूसरा उसके छाती के निप्पल (Nipple) तक मापा। फिर वही दूरी नाभि से दूसरे निप्पल तक मापी। अंतर था। फिर नाभि से दोनों पैरों के अंगूठों की दूरी मापी। वहां भी अंतर था।

"तुम दुनिया का इलाज करते हो, डॉक्टर, लेकिन तुम्हारा अपना केंद्र (Center) हिला हुआ है। तुम्हें अक्सर अनिद्रा और चिंता (Anxiety) रहती है, सही कहा न?"

विहान सन्न रह गया। यह सच था। वह रातों को सो नहीं पाता था।

वैद्य जी ने विहान की नाभि पर दबाव डाला और एक विशेष झटके के साथ उसे सेट किया। विहान को लगा जैसे उसके पेट के अंदर कोई गांठ खुल गई हो। एक अजीब सी हल्कापन पूरे शरीर में दौड़ गई। उस रात, विहान को ऐसी नींद आई जो उसे पिछले दस सालों में नहीं आई थी।

 तेल का विज्ञान (नाभि के रहस्य)

अगले कुछ दिनों तक विहान वही रहा। उसने सीखा कि अलग-अलग तेल नाभि में लगाने से कैसे अलग-अलग परिणाम मिलते हैं। वैद्य जी ने उसे अपनी डायरी से कुछ सूत्र बताए:

  1. बादाम का तेल: यदि नाभि में लगाया जाए, तो यह चेहरे पर चमक लाता है और आंखों की रोशनी बढ़ाता है (क्योंकि नाभि का संबंध दृष्टि की नाड़ियों से है)।
  2. सरसों का तेल: फटे होंठों को ठीक करता है और आंतों के बैक्टीरिया को मारता है। साथ ही जोड़ों के दर्द में राहत देता है।
  3. नीम का तेल: मुहांसे और त्वचा के रोग ठीक करता है।
  4. गाय का घी: त्वचा को कोमल बनाता है और वात (Vata) दोष को संतुलित करता है।
  5. ब्रांडी या अल्कोहल: (रुई में भिगोकर) तेज बुखार और माहवारी के दर्द को तुरंत खींच लेता है।

"यह कोई जादू नहीं है," वैद्य जी ने कहा। "यह 'ड्रग डिलीवरी सिस्टम' का सबसे शुद्ध रूप है। जब तुम गोली खाते हो, तो उसे लीवर और किडनी से गुजरना पड़ता है, जिससे नुकसान होता है। नाभि के जरिए औषधि सीधे खून और अंगों में मिलती है, बिना किसी अंग को नुकसान पहुँचाए।"

  एक नई शुरुआत

पाँच दिन बीत चुके थे। आन्या अब आंगन में दौड़ रही थी। उसे भूख लगने लगी थी। उसने आज सुबह भरपेट दलिया खाया था। विहान की माँ, सावित्री देवी, की आँखों में आँसू थे।

विहान, वैद्य हरिहर के चरणों में झुक गया। "आपने मेरी बेटी ही नहीं, मुझे भी नया जीवन दिया है। मुझे मेरी जड़ें वापस मिल गईं।"

वैद्य जी ने उसके सिर पर हाथ रखा। "जाओ पुत्र। अपनी आधुनिक मशीनों का उपयोग करो, वे जीवन बचाने के लिए जरूरी हैं। लेकिन यह मत भूलो कि जीवन को 'बनाए रखने' के लिए प्रकृति के नियमों का पालन करना होगा। नाभि को केवल शरीर का एक गड्ढा मत समझो, यह वह दीपक है जहाँ से प्राणों की लौ जलती है। इसे बुझने मत देना।"

मुंबई लौटकर, डॉ. विहान मल्होत्रा ने अपने अस्पताल में एक नया विभाग खोला—"होलिस्टिक हीलिंग विंग"। जहाँ सर्जरी भी होती थी, लेकिन साथ ही मरीजों की नाभि-चिकित्सा और आहार पर भी ध्यान दिया जाता था।

उन्होंने अपने शोध पत्र में लिखा:
"मनुष्य वृक्ष की तरह है। हम अक्सर पत्तियों (लक्षणों) का इलाज करते हैं और जड़ (नाभि) को भूल जाते हैं। नाभि शरीर का गुरुत्वाकर्षण केंद्र ही नहीं, बल्कि प्राण शक्ति का पावर हाउस है। यह हमारे अस्तित्व का आदि है और अंत भी। नाभि स्वस्थ है, तो जीवन स्वस्थ है।"

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