कावेरी का शाश्वत प्रहरी: दक्षिण तट की एक गाथा
पोन्नी का प्रवाह और विस्मृत खंडहर
दक्षिण भारत की जीवन रेखा, पवित्र कावेरी नदी, जिसे प्रेम से 'पोन्नी' (स्वर्णमयी) भी कहा जाता है, अपनी मंद गति से बह रही थी। समय संध्या का था। डूबते सूर्य की लालिमा कावेरी के जल पर पिघले हुए सोने की तरह चमक रही थी। इसी पावन नदी के दक्षिणी तट (थेनकरई) पर, घने वटवृक्षों और नारियल के झुरमुटों के बीच, एक प्राचीन शिवालय खड़ा था—'तिरुवल्लुवरै' (एक काल्पनिक नाम, जो 'पाडल पेट्रा स्थलम्' की शैली में है)।
यह मंदिर समय की मार झेल रहा था। इसके गोपुरम (शिखर) पर उगी झाड़ियाँ बताती थीं कि सदियों से किसी राजा ने इसके जीर्णोद्धार की सुध नहीं ली थी। फिर भी, गर्भगृह के भीतर जल रहा अखंड दीप इस बात का साक्षी था कि यहाँ शिव का वास कभी कमज़ोर नहीं हुआ।
गाँव के बूढ़े पुजारी, सदाशिव गुरुक्कल, अपनी कांपती उंगलियों से शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ा रहे थे। उनकी आवाज़ में बुढ़ापे की खनक थी, लेकिन जब वे 'थेवारम्' का पाठ करते, तो उनमें एक युवा का ओज आ जाता था।
"तोटुडैय सेबियन विडै येरियोर..." (वह जिसके कान में कुंडल है, जो वृषभ पर सवार है...)
यह थेवारम् का वह पवित्र पद्य था जिसे बाल संत तिरुज्ञान संबंधर ने गाया था। कहा जाता है कि सदियों पहले, जब संबंधर अपने अनुयायियों के साथ कावेरी के दक्षिण तट की यात्रा कर रहे थे, तब उन्होंने इस मंदिर में विश्राम किया था। उनकी वाणी से निकले शब्द ही इस मंदिर की प्राण-शक्ति थे।
लेकिन आज, मंदिर खतरे में था। कावेरी का जलस्तर बढ़ रहा था और मंदिर की नींव, जो शताब्दियों पुरानी ईंटों से बनी थी, अब जवाब दे रही थी। चोल साम्राज्य के एक सामंत, वल्लवराय, ने मंदिर के पुनर्निर्माण का बीड़ा उठाया था। लेकिन समस्या पत्थरों की नहीं, बल्कि 'प्राण' की थी। कोई भी शिल्पकार उस प्राचीन शिवलिंग के लिए उपयुक्त 'नंदी' और 'विमान' (गुंबद) का निर्माण नहीं कर पा रहा था जो थेवारम् के भावों को व्यक्त कर सके।
शिल्पकार का आगमन
उसी संध्या, एक युवा शिल्पकार, माधवन, अपनी छेनी और हथौड़ी की पोटली लटकाए मंदिर के घाट पर उतरा। माधवन कांचीपुरम के महान शिल्पकारों के वंशज थे, लेकिन उनके मन में एक अजीब-सी बेचैनी थी। वह पत्थरों को आकार तो दे देते थे, लेकिन उन्हें लगता था कि उनकी मूर्तियों में वह 'स्पंदन' नहीं है जो भक्त को रुला दे।
उसने सुना था कि कावेरी के दक्षिण तट पर स्थित यह शिवालय जागृत है। यहाँ पत्थर भी गाते हैं। वह अपनी कला की अपूर्णता को पूर्ण करने यहाँ आया था।
माधवन ने सदाशिव गुरुक्कल को प्रणाम किया।
"मैं वल्लवराय के आदेश पर आया हूँ, गुरुदेव। गर्भगृह के द्वार और नंदी मंडप का कार्य मुझे सौंपा गया है।"
सदाशिव ने अपनी धुंधली आँखों से युवक को देखा। "पत्थर तराशना आसान है, पुत्र। लेकिन यहाँ पत्थर तराशने से पहले तुम्हें 'नाद' (ध्वनि) को तराशना होगा। क्या तुम थेवारम् जानते हो?"
माधवन ने सिर झुका लिया। "नहीं गुरुदेव, मैं केवल शिल्प शास्त्र जानता हूँ।"
सदाशिव मुस्कुराए, एक रहस्यमयी मुस्कान। "बिना अप्पर और संबंधर के गीतों को समझे, तुम इस मंदिर का एक पत्थर भी नहीं हिला पाओगे। यह मंदिर ईंटों से नहीं, भजनों से बंधा है। आज रात यहीं रुको। कावेरी क्या कहती है, उसे सुनो।"
नाद और पाषाण
माधवन ने मंदिर के मंडप में डेरा जमाया। रात गहरी हो गई थी। कावेरी के बहने की आवाज़ 'कल-कल' से बदलकर एक गहरे ओंकार जैसी हो गई थी। माधवन को नींद नहीं आ रही थी। वह उठा और गर्भगृह के पास गया। वहां अंधेरे में केवल शिवलिंग दिखाई दे रहा था।
अचानक, उसे लगा जैसे हवा में कोई गा रहा है। यह कोई मानवीय आवाज़ नहीं थी। यह हवाओं का झोंका था जो पुराने स्तंभों से टकराकर संगीत उत्पन्न कर रहा था।
“मसिल वीणैयुम, मालै मदियामुम...” (दोषरहित वीणा का स्वर और शाम का चंद्रमा...)
यह संत अप्पर (तिरुनावुक्करासर) का भजन था। माधवन ने महसूस किया कि मंदिर का हर कोना एक विशेष आवृत्ति (Frequency) पर कंपन कर रहा है।
अगले दिन से, माधवन ने छेनी नहीं उठाई। वह भोर में उठता, कावेरी में स्नान करता और सदाशिव गुरुक्कल के पास बैठ जाता। वह उनसे थेवारम् के पद्य सुनता और उनका अर्थ समझता।
गुरुक्कल समझाते, "देखो माधवन, अप्पर स्वामी कहते हैं कि शिव का चरण कमल ही एकमात्र शरण है। जब तुम नंदी की मूर्ति बनाओ, तो उसकी आँखों में वह प्रतीक्षा होनी चाहिए जो शिव के आदेश के लिए अनंत काल तक रुक सके। जब तुम द्वारपाल बनाओ, तो उसमें वह कठोरता हो जो अज्ञान को भीतर आने से रोक सके।"
दिन हफ्तों में बदल गए। सामंत वल्लवराय अधीर हो रहे थे। "माधवन! कार्य कब शुरू होगा? महाशिवरात्रि आने वाली है और मंदिर जीर्ण-शीर्ण है।"
माधवन ने केवल इतना कहा, "पत्थर अभी तैयार नहीं है, राजन। अभी उसने गीत नहीं सीखा।"
अदृश्य बाधा और दैवीय परीक्षा
आखिरकार, वह दिन आया जब माधवन ने अपनी छेनी उठाई। उसे गर्भगृह के ऊपर के विमान (शिखर) के लिए एक 'कीर्तिमुख' (राक्षस मुख जो नकारात्मकता को निगलता है) और शिव-पार्वती के विवाह का दृश्य उकेरना था।
जैसे ही उसने पहली चोट मारी, पत्थर चटक गया। माधवन हैरान रह गया। उसने दूसरा पत्थर लिया, वह भी टूट गया। यह सामान्य नहीं था। यह काले ग्रेनाइट पत्थर थे, जो लोहे से भी सख्त होते हैं।
गाँव में कानाफूसी शुरू हो गई। "यह शिल्पकार शापित है," लोग कहने लगे। "इसने देवताओं को क्रोधित कर दिया है।"
हताश होकर माधवन रात को कावेरी के तट पर बैठ गया। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे। "हे महादेव! क्या मेरी भक्ति में खोट है? या मेरी कला अधूरी है?"
तभी, एक जटाधारी साधु, जिसके हाथ में एक छोटा सा वाद्ययंत्र (कंजिरा) था, वहां आया। साधु ने माधवन के कंधे पर हाथ रखा।
"क्यों रोता है मूर्तिकार?"
"बाबा, पत्थर मेरी बात नहीं सुन रहे। वे टूट जाते हैं।"
साधु हँसा। उसकी हँसी में बादलों की गर्जना थी। "पत्थर इसलिए टूट रहे हैं क्योंकि तुम उन पर अपना अहंकार थोप रहे हो। तुम सोच रहे हो कि 'मैं' बना रहा हूँ। अरे पगले! यह कावेरी का दक्षिण तट है। यहाँ 'अहं' नहीं, 'सोहम' (वह मैं हूँ) चलता है।"
साधु ने गाना शुरू किया। यह सुंदरर का एक थेवारम् था—“पिट्ठा पिरई सूडी...” (हे पागल प्रभु! जिसने अर्धचंद्र धारण किया है... मैं तुम्हारा दास हूँ, मैं तुम्हें कैसे भूल सकता हूँ?)
जैसे-जैसे साधु गा रहा था, माधवन को लगा कि उसके आस-पास की प्रकृति उस गीत के साथ लयबद्ध हो रही है। साधु ने कहा, "छेनी को हथौड़े से मत चलाओ, उसे इस लय (Rhythm) से चलाओ। जब तुम्हारा हाथ और शिव का नाद एक हो जाएगा, पत्थर मक्खन बन जाएगा।"
यह कहकर साधु कोहरे में विलीन हो गया। माधवन को समझ नहीं आया कि वह कौन था, लेकिन उसे अपना मार्ग मिल गया था। वह दौड़ा और सीधे अपनी कार्यशाला में गया।
लयबद्ध सृजन
अब माधवन बदल चुका था। वह काम करते समय मौन नहीं रहता था, वह गाता था।
"नमः शिवाय... नमः शिवाय..."
उसकी हथौड़ी की चोट थेवारम् के छंदों (Meter) के साथ गिरती थी।
ठक-ठक-ठक... (हर चोट एक ताल थी)।
आश्चर्यजनक रूप से, पत्थर अब टूट नहीं रहे थे। वे ऐसे आकार ले रहे थे मानो वे सदियों से उसी रूप में बाहर आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। उसने शिव-पार्वती के विवाह का दृश्य उकेरा। पार्वती की आँखों में लज्जा और शिव के चेहरे पर जगत-पिता का गांभीर्य—सब कुछ इतना जीवंत था कि देखने वालों को भ्रम हो जाता कि कहीं मूर्तियाँ सांस तो नहीं ले रहीं।
मंदिर का निर्माण तेज़ी से होने लगा। मंडप के खंभों पर उसने 63 नयनारों (शैव संतों) की कहानियाँ उकेर दीं। एक खंभे पर अप्पर पत्थर से बंधे समुद्र में तैर रहे थे, तो दूसरे पर संबंधर ज्ञान का दूध पी रहे थे।
पूरा गाँव इस चमत्कार को देख रहा था। सदाशिव गुरुक्कल की आँखों में खुशी के आँसू थे। उन्होंने कहा, "माधवन, तुमने पत्थरों को थेवारम् सिखा दिया है।"
महाबाढ़ और अंतिम परीक्षा
महाशिवरात्रि से दो दिन पहले, प्रकृति ने अपनी भृकुटी तान ली। कावेरी के ऊपरी इलाकों में भारी वर्षा हुई। 'पोन्नी' नदी, जो हमेशा जीवनदायिनी थी, अब रौद्र रूप धारण कर चुकी थी। पानी का स्तर खतरे के निशान से ऊपर था। दक्षिण तट पर पानी भरने लगा।
मंदिर का गर्भगृह अभी पूरी तरह से सील नहीं हुआ था। नंदी मंडप का कार्य चल रहा था। अगर पानी मंदिर में घुसता, तो नवनिर्मित संरचना और प्राचीन शिवलिंग, दोनों को नुकसान पहुँचता।
गाँव वाले ऊँचे स्थानों की ओर भागने लगे। वल्लवराय ने भी सैनिकों को पीछे हटने का आदेश दिया। "माधवन! छोड़ो सब कुछ! बाढ़ आ रही है!"
लेकिन माधवन नहीं हटा। गर्भगृह के द्वार को सुरक्षित करना बाकी था। उसने देखा कि पानी सीढ़ियों तक आ पहुँचा है। लहरें उफन रही थीं।
माधवन ने एक बड़ा पत्थर उठाया और द्वार के पास उसे लगाने की कोशिश की। लेकिन पानी का बहाव इतना तेज़ था कि वह पत्थर को टिका नहीं पा रहा था। वह अकेला था। मृत्यु उसके सामने नाच रही थी।
तभी उसे वह जटाधारी साधु याद आया। उसे थेवारम् याद आया।
उसने ज़ोर से गाना शुरू किया—आंधी और तूफ़ान की आवाज़ को चीरते हुए।
"कादल आगि, कसिंदु कण्णीर मल्गी..." (प्रेम बनो, पिघलो, और आँखों से अश्रु धारा बहने दो...)
उसने अपनी पूरी शारीरिक शक्ति और आत्मिक बल लगा दिया। वह पत्थर को अपनी पीठ से धकेल रहा था ताकि पानी भीतर न जाए। ठंडा पानी उसकी छाती तक आ गया था।
अचानक, उसे लगा कि वह अकेला नहीं है।
उसे लगा जैसे हज़ारों हाथ उसके साथ उस पत्थर को धकेल रहे हैं। उसने अपनी दाईं ओर देखा—वहाँ सदाशिव गुरुक्कल खड़े थे, कमर तक पानी में, कांपते हुए लेकिन मंत्र पढ़ते हुए। उनके पीछे गाँव के कुछ युवक थे। फिर सामंत वल्लवराय भी आ गए।
भक्ति ने भय को जीत लिया था। सबने मिलकर, 'हर-हर महादेव' के उद्घोष के साथ उस विशाल शिलाखंड को द्वार पर स्थापित कर दिया। उन्होंने मिट्टी और चूने से दरारों को भर दिया।
कावेरी उफनती रही, मंदिर की दीवारों से टकराती रही, लेकिन वह भीतर प्रवेश न कर सकी। वह प्राचीन शिवालय, जो भजनों की नींव पर खड़ा था, अटल रहा।
अभिषेक और विसर्जन
सुबह होते-होते बाढ़ का पानी उतर गया। सूर्यदेव की पहली किरण जब मंदिर के नए स्वर्ण कलश (शिखर) पर पड़ी, तो वह दैदीप्यमान हो उठा।
महाशिवरात्रि का उत्सव ऐसा था जैसा सदियों में नहीं देखा गया। जब सदाशिव गुरुक्कल ने नए मंडप में पहली आरती की, तो घंटियों की आवाज़ कावेरी की लहरों के साथ मिल गई।
माधवन एक खंभे के पीछे खड़ा था, चुपचाप। उसका काम पूरा हो गया था।
वल्लवराय ने उसे पुकारा, "आओ शिल्पी! अपना सम्मान लो।"
माधवन आगे आया और शिवलिंग के सामने साष्टांग लेट गया। उसे उस पत्थर में अब अपनी कला नहीं, बल्कि उस साधु का चेहरा और थेवारम् का स्वर सुनाई दे रहा था।
उसने मन ही मन कहा, "हे प्रभु, यह मंदिर मैंने नहीं बनाया। यह तो कावेरी की मिट्टी, नयनारों के गीत और आपकी कृपा का रूप है। मैं तो बस एक माध्यम था।"
उस दिन के बाद, कावेरी के दक्षिण तट पर स्थित उस मंदिर को 'गान-पुरेश्वर' (संगीत के ईश्वर का नगर) कहा जाने लगा। आज भी, जब हवाएँ वहां के खंभों से टकराती हैं, तो ध्यान से सुनने पर छेनी-हथौड़ी की आवाज़ नहीं, बल्कि थेवारम् की धुन सुनाई देती है।
कहा जाता है कि माधवन ने अपना शेष जीवन उसी मंदिर में एक साधारण सेवक बनकर बिताया, जहाँ वह आने वाले यात्रियों को पत्थर की नहीं, बल्कि 'भक्ति' की भाषा समझाता था।

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