ज्ञान-यज्ञ: एक ब्राह्मण का संकल्प
प्राचीन भारत के नैमिषारण्य वन में ऋषि भारद्वाज का गुरुकुल था। वहां देश भर से विद्यार्थी ज्ञान अर्जित करने आते थे। लेकिन समय बदल रहा था। समाज में प्राचीन विद्याएं लुप्त हो रही थीं और जो बची थीं, वे मिलावट और अज्ञान के कारण विकृत हो चुकी थीं।
आर्यमन, गुरुकुल का सबसे तेजस्वी छात्र था। एक दिन उसने देखा कि पास के गाँव में महामारी फैली है। वैद्य जड़ी-बूटियां तो दे रहे थे, लेकिन लोग ठीक होने के बजाय और बीमार हो रहे थे। आर्यमन दौड़कर गुरु के पास गया।
"गुरुदेव, आयुर्वेद के ग्रंथ तो कहते हैं कि यह औषधि जीवनदायिनी है, फिर लोग मर क्यों रहे हैं?" आर्यमन ने व्यथा से पूछा।
ऋषि भारद्वाज ने एक पुराना, जीर्ण-शीर्ण भोजपत्र आर्यमन के हाथ में थमाया और कहा, "पुत्र, ब्राह्मण का जन्म केवल वेद पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि वेद के विज्ञान को जीने और बचाने के लिए होता है। देखो, कालक्रम से यह ज्ञान विलुप्त हो गया है। लोगों ने अधूरी जानकारी को ही पूरा सच मान लिया है, जिससे ज्ञान 'विकृत' (दूषित) हो गया है। और जो मूल सूत्र हैं, वे इतने संक्षिप्त (सूत्रात्मक) हैं कि साधारण बुद्धि उन्हें समझ नहीं पा रही।"
गुरु ने आर्यमन की आँखों में झांककर आदेश दिया, "आर्यमन! मैं तुम्हें दायित्व सौंपता हूँ। जाओ, अपने तपोबल से इस लुप्त विज्ञान को फिर से खोजो (उद्भासित करो), अशुद्धियों को हटाकर इसे विशुद्ध करो और इन कठिन सूत्रों की ऐसी व्याख्या करो (विशद करो) कि एक साधारण किसान भी इसे समझ सके।"
आर्यमन ने उस रात वन की एक गुफा में आसन जमाया। यह तपस्या किसी देवता को प्रसन्न करने के लिए नहीं थी, बल्कि प्रकृति के रहस्यों को समझने के लिए थी। उसने तीन दिन और तीन रात तक 'संजीवनी सूत्र' पर ध्यान लगाया। उसने अपने मन को इतना एकाग्र किया कि उसे पौधों की आणविक संरचना (molecular structure) और मानव शरीर की नाड़ियों का स्पंदन अपने आप दिखने लगा। इसे ही 'तपोबल से ज्ञान को उद्भासित करना' कहते हैं।
उसने पाया कि वैद्य जिस पौधे का उपयोग कर रहे थे, वह असली औषधि जैसा दिखता ज़रूर था, लेकिन वह विषैला था। असली ज्ञान समय की धूल में दब गया था।
चौथे दिन आर्यमन बाहर आया। उसका चेहरा तेज से चमक रहा था। वह गाँव के बीच पहुँचा। उसने लोगों को रोका और उस 'विषैले पौधे' को फेंक दिया। उसने सही औषधि की पहचान बताई।
फिर उसने एक सभा बुलाई। आयुर्वेद के जिस श्लोक का अर्थ लोग रटते आ रहे थे, आर्यमन ने उसे तोड़ा और सरल भाषा में समझाया। उसने बताया कि कैसे, कब और कितनी मात्रा में औषधि लेनी है। जो ज्ञान केवल एक 'सूत्र' (Code) में था, उसने उसे 'विशद' (Decode/Elaborate) कर दिया।
गाँव स्वस्थ हो गया। उस दिन आर्यमन ने समझा कि ब्राह्मण होने का अर्थ श्रेष्ठता का अहंकार नहीं, बल्कि समाज को अज्ञान के अंधेरे से निकालकर ज्ञान के प्रकाश में लाना है।

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