राग-अनुराग

राग-अनुराग
rag

बनारस की तंग गलियों में एक पुरानी हवेली थी, जिसे 'संगीत सदन' कहा जाता था। वहाँ के उस्ताद वाजिद अली साहब का रियाज़ भोर के अंधेरे में ही शुरू हो जाता था। उनकी शिष्या थी ईरावती, जिसकी आवाज़ में सरस्वती का वास माना जाता था।

उसी हवेली की खिड़की के ठीक सामने वाले घर की छत पर केशव अक्सर अपनी पेंटिंग का कैनवास लेकर बैठता था। केशव एक चित्रकार था, जो आवाज़ों को रंगों में ढालने की कोशिश करता था।

ईरावती जब 'राग भैरवी' का आलाप लेती, तो केशव के ब्रश की गति बदल जाती। वह कभी ईरावती से मिला नहीं था, न कभी बात की थी। उनका रिश्ता सिर्फ सुरों और रंगों का था।

एक दिन, बसंत पंचमी का उत्सव था। हवेली में संगीत सभा सजी थी। ईरावती को पहली बार सबके सामने गाना था। केशव सबसे पीछे वाली कतार में जाकर बैठ गया।

ईरावती ने तानपुरा छेड़ा और 'राग बसंत' शुरू किया। उसकी आँखें बंद थीं, लेकिन गाते-गाते अचानक उसकी नज़रें सामने उठीं और सीधे केशव पर जा टिकीं। केशव ने पीले रंग का कुर्ता पहन रखा था, और ईरावती ने बसंती रंग की साड़ी।

उस एक पल में, बिना कुछ कहे, एक संवाद हुआ। ईरावती की आवाज़ में एक नई लचक आ गई, जैसे वह सिर्फ भीड़ के लिए नहीं, बल्कि उस एक व्यक्ति के लिए गा रही हो जो उसकी आवाज़ के रंगों को समझता था।

सभा खत्म होने के बाद, केशव ने चुपचाप अपनी बनाई एक तस्वीर हवेली के सेवक के हाथ ईरावती तक भिजवा दी।

ईरावती ने अपने कमरे में जाकर वो कागज़ खोला। उसमें ईरावती का चित्र नहीं था, बल्कि एक 'मोर' बना था जो बारिश की पहली बूंद की प्रतीक्षा कर रहा था। नीचे लिखा था:
"तुम्हारी आवाज़ उस मेघ की तरह है, और मेरा कैनवास इस प्यासे मोर की तरह।"

ईरावती मुस्कुरा दी। उसने खिड़की खोली और देखा कि सामने वाली छत पर केशव खड़ा था। ईरावती ने धीरे से अपना तानपुरा उठाया और खिड़की के पास बैठकर एक कोमल 'ठुमरी' गुनगुनाने लगी—“जाओ जी, जाओ, नैना न मिलाओ...”

यह इनकार नहीं था, यह प्रेमाभिव्यक्ति की एक सूक्ष्म शास्त्रीय कला थी। जहाँ शब्दों का शोर नहीं था, बस एक सुर था और एक रंग, जो मिलकर मुकम्मल हो गए थे।

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