मौन का महासागर
प्रयागराज के संगम तट पर मौनी अमावस्या की भोर होने वाली थी। कड़ाके की ठंड थी, और चारों ओर घना कोहरा छाया हुआ था। लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ थी, लेकिन फिर भी एक अजीब सी शांति हवा में घुली हुई थी।
आदित्य, जो शहर की भागदौड़ और शोर-शराबे से तंग आ चुका था, अपने दादाजी के कहने पर यहाँ आया था। उसका मन अशांत था। उसे लगता था कि चुप रहने से क्या होगा? असली काम तो बोलने से होता है।
जैसे ही वे घाट की सीढ़ियों पर पहुँचे, आदित्य ने देखा कि एक बेहद बूढ़े साधु, जिनकी जटाएँ लंबी थीं और शरीर पर भस्म लगी थी, आँखें बंद किए एक पत्थर पर बैठे थे। उनके चेहरे पर एक अद्भुत तेज था। आदित्य को जिज्ञासा हुई। उसने दादाजी से पूछा, "ये बाबा कुछ बोल क्यों नहीं रहे? क्या ये गूंगे हैं?"
दादाजी ने होंठों पर उंगली रखकर चुप रहने का इशारा किया और धीरे से फुसफुसाए, "नहीं बेटा, इन्होंने 'मौन व्रत' धारण किया है। आज मौनी अमावस्या है। आज वाणी का विश्राम और आत्मा का जागरण होता है।"
आदित्य को समझ नहीं आया। वह उस साधु के पास जाकर बैठ गया। साधु ने आँखें खोलीं। उनकी आँखों में इतनी गहराई थी जैसे कोई महासागर हो। आदित्य ने अधीर होकर पूछा, "बाबा, आप चुप क्यों हैं? दुनिया में इतना शोर है, आपकी चुप्पी से क्या बदल जाएगा?"
साधु मुस्कुराए। उन्होंने पास पड़ी गीली रेत पर अपनी उंगली से लिखा:
"जब होठ बंद होते हैं, तभी हम अपने भीतर के शोर को सुन पाते हैं। और जब भीतर का शोर शांत होता है, तभी ईश्वर की आवाज़ सुनाई देती है।"
आदित्य ने वो शब्द पढ़े और सन्न रह गया। उसे एहसास हुआ कि वह हमेशा बाहर की दुनिया से लड़ता रहा है, लेकिन असली युद्ध तो उसके मन के अंदर चल रहा था—चिंताओं का, गुस्से का, और शिकायतों का शोर।
साधु ने फिर इशारा किया—'डुबकी लगाओ, लेकिन सिर्फ शरीर से नहीं, मन से भी।'
आदित्य ने त्रिवेणी संगम के ठंडे पानी में डुबकी लगाई। जैसे ही वह पानी के अंदर गया, बाहर का सारा कोलाहल थम गया। पानी के अंदर एक गहरा सन्नाटा था। उस एक पल के लिए, उसके दिमाग के सारे विचार रुक गए। उसे एक ऐसी शांति मिली जो उसने महंगी छुट्टियों और पार्टियों में कभी महसूस नहीं की थी।
जब वह पानी से बाहर निकला, तो वह एक नया आदित्य था। उसने तय किया कि आज पूरा दिन वह एक शब्द नहीं बोलेगा। उसने समझ लिया था कि मौनी अमावस्या सिर्फ चुप रहने का दिन नहीं, बल्कि खुद से बात करने का दिन है।

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