असली सुंदरता

 

असली सुंदरता
असली सुंदरता

भाभी ने नेहा के कंधे पर हाथ रखा, "हिम्मत रख नेहा, इस बार सब अच्छा होगा। तू बस मुस्कुराती रहना।"

नेहा ने एक गहरी साँस ली और चाय की ट्रे उठाई। उसके हाथ कांप रहे थे। साड़ी का पल्लू संभालते हुए वह धीरे-धीरे बैठक (ड्राइंग रूम) की ओर बढ़ी। बाहर का माहौल एकदम शांत था, बस दादी की माला जपने की धीमी आवाज़ आ रही थी।

जैसे ही नेहा कमरे में दाखिल हुई, सबकी नज़रें उस पर टिक गईं। लड़के का नाम सुमित था। जैसा दादी ने कहा था, वह रंग-रूप में साधारण और शरीर से भारी था, लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक और चेहरे पर सौम्यता थी। नेहा ने झुककर सबको नमस्ते किया और चाय का कप सुमित की ओर बढ़ाया।

सुमित ने कप लेते हुए नेहा की ओर देखा। नेहा की नज़रें झुकी हुई थीं।

लड़के की माँ ने वही पुराने सवाल पूछे—"खाना बनाना आता है? सिलाई-कढ़ाई जानती हो?" नेहा मशीनी अंदाज़ में 'जी' और 'हाँ' में सिर हिलाती रही।

तभी सुमित ने अपनी माँ को रोका और कहा, "माँ, अगर आप इजाज़त दें तो मैं नेहा जी से दो मिनट अकेले में बात करना चाहूँगा?"

दादी और पिताजी ने तुरंत सहमति दे दी। नेहा और सुमित को घर की छोटी बालकनी में भेज दिया गया।

वहाँ पहुँचकर कुछ पल खामोशी रही। नेहा का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। उसे लगा कि अब यह भी कहेगा कि 'तुम मोटी हो' या 'रंग साफ़ नहीं है'।

सुमित ने खामोशी तोड़ी, "पानी पियेंगी आप? आप बहुत घबराई हुई लग रही हैं।"

नेहा ने अचरज से सिर उठाया। सुमित मुस्कुरा रहा था।

"देखिए नेहा जी," सुमित ने संजीदगी से कहा, "मैं जानता हूँ कि आज-कल लड़कियाँ मेरे जैसे दिखने वाले लड़के को पसंद नहीं करतीं। मैं मोटा हूँ, सांवला हूँ। मुझे पता है कि आपके परिवार वाले सिर्फ़ मेरी नौकरी देखकर राज़ी हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या आप राज़ी हैं?"

नेहा चुप रही। सुमित ने आगे कहा, "मुझे एक ऐसी जीवनसाथी चाहिए जो मेरे साथ चल सके, न कि सिर्फ़ सजावट की गुड़िया हो। पिछली बार आपको रिजेक्ट किया गया, यह मुझे पिताजी ने बताया था। पर सच कहूँ? मुझे आप बहुत सादगी भरी और अच्छी लगीं। रंग और वज़न तो वक्त के साथ बदल जाते हैं, पर इंसान का स्वभाव नहीं बदलता।"

नेहा की आँखों में आँसू आ गए। आज पहली बार किसी लड़के ने उसे 'इंसान' समझा था, नुमाइश की चीज़ नहीं।

नेहा ने धीरे से कहा, "मुझे लगा था आप भी... बाकियों की तरह..."

सुमित हँसा, "अरे, जो खुद शीशे में ऋतिक रोशन न दिखता हो, उसे दूसरों में कमी निकालने का हक़ नहीं है। हम दोनों जैसे हैं, वैसे ही परफेक्ट हैं।"

दोनों की हँसी सुनकर अंदर बैठे परिवार वालों के कान खड़े हो गए। जब वे दोनों अंदर आए, तो नेहा के चेहरे पर डर नहीं, बल्कि एक सुकून भरी मुस्कान थी। उसने दादी की ओर देखा और पलकें झुका लीं।

रिश्ता पक्का हो गया। दादी ने गणेश जी को हाथ जोड़े और सवा कुन्तल तो नहीं, पर मोहल्ले भर में लड्डू बँटवाने का हुक्म दे दिया। उस दिन नेहा को समझ आ गया कि सही जोड़ा वही है जहाँ रूह का रंग मिलता हो, चमड़ी का नहीं।


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