स्वर्ण मुकुट/डायडेम
समुद्र के पास वाले शहर में बारिश की बूँदें शीशे पर ऐसे गिर रही थीं जैसे कोई बहुत पुरानी भाषा में धीरे-धीरे दस्तक दे रहा हो। संग्रहालय का “धातु-कक्ष” रात में भी जगमगाता रहता था—सफेद रोशनी, नियंत्रित तापमान, और हर वस्तु के साथ एक छोटा-सा लेबल, मानो इतिहास को एक पंक्ति में समेट देने की कोशिश।
अन्वी (एक युवा क्यूरेटर) ने दस्ताने पहने और वह डिब्बा खोला जिसकी सील पर लिखा था:
“10वीं शताब्दी, चाम (चंपा) साम्राज्य, वियतनाम — स्वर्ण मुकुट/डायडेम, 84 ग्राम, रिपूसे (repoussé) तकनीक; तीन शिव-मुख, रत्न जड़ित।”
डिब्बा खुलते ही सोने की हल्की गरमाहट जैसी चमक बाहर आई—हालाँकि कमरे का तापमान ठंडा था। वस्तु छोटी थी, पर उसके भीतर जैसे पूरी समुद्री दुनिया फँसी हो: यात्रा, व्यापार, पूजा, सत्ता, कला—और उन सब पर समय की धूल नहीं, समय की चमक।
डायडेम के बीचोंबीच तीन चेहरे थे—शिव के तीन मुख—उभरे हुए, नक्काशी नहीं बल्कि धातु को पीछे से ठोककर उभारने वाली रिपूसे शैली में। आँखों के पास रत्न जड़े थे, और मूँछें… मूँछें इतनी अलंकृत कि वे सिर्फ़ सजावट नहीं लगती थीं, बल्कि किसी शैली का घोषणा-पत्र: “हम यहाँ हैं; हम अपने ढंग से देव को गढ़ते हैं।”
अन्वी की उँगलियाँ हवा में ठिठकी रहीं। उसे लगा, यह वस्तु सिर्फ़ सोना नहीं है—यह एक बहस है, जो हजार साल से शांत बैठी है।
उसी वक्त दरवाज़ा खटखटाया।
“आ सकती हूँ?” आवाज़ में विनम्रता थी।
यह लिन्ह थी—वियतनाम की चाम विरासत पर काम करने वाली शोधार्थी, जो आज विशेष अनुमति से कक्ष देखने आई थी। उसके साथ प्रोफेसर आर. के. शास्त्री भी थे—समुद्री मार्गों से फैले हिंदू प्रतीक-विज्ञान के विशेषज्ञ, जिनकी किताबें अन्वी ने छात्रावस्था में पढ़ी थीं।
अन्वी ने डायडेम को धीरे से मखमली सतह पर रखा। “यही है,” उसने कहा, “जिसकी वजह से आप दोनों यहाँ हैं।”
लिन्ह ने एक लंबी साँस ली। “कभी-कभी लगता है, यह हमारे पूर्वजों की आवाज़ है… और कभी लगता है, दूसरों की कहानी हम पर चिपका दी गई है।”
शास्त्री ने बिना छुए देखा, जैसे वस्तु को आँखों से सम्मान दे रहे हों। “और कभी लगता है,” उन्होंने धीमे से कहा, “कि ‘हम’ और ‘दूसरे’ की दीवारें बाद में बनाई गईं। समुद्र दीवारें नहीं मानता।”
उनके बीच एक छोटा-सा मौन फैल गया—वैसा मौन जो किसी चीज़ के टूटने से नहीं, किसी चीज़ के खुलने से पैदा होता है।
अन्वी को लगा, इस डायडेम की असली कथा उस 10वीं शताब्दी के किसी कारीगर की हथेली में शुरू होती होगी—जहाँ सोना सिर्फ़ धातु नहीं, मंत्र का पात्र बनता होगा।
और जैसे किसी ने उसके भीतर धीमे से दरवाज़ा खोला, दृश्य बदल गया।
1) करघे नहीं, समुद्र की लय (10वीं शताब्दी, चंपा)
चंपा के तटीय नगर में सुबह नमक और धूप की मिली-जुली खुशबू लेकर आती थी। बंदरगाह पर जहाज़ों की रस्सियाँ चरमरातीं, और बाज़ार में अलग-अलग भाषाएँ एक साथ बहतीं—चाम, खमेर, संस्कृत के उच्चारण, और उन नाविकों की टूटी-फूटी बोलियाँ जो बस “मोल-भाव” की भाषा जानते थे।
थियेन नाम का युवा स्वर्णकार अपने पिता की छोटी-सी कार्यशाला में बैठा था। उसके सामने सोने की पतली पट्टी थी—न ज़्यादा चौड़ी, न ज़्यादा भारी। पर उसके भीतर एक राजदरबार की अपेक्षा का वजन था।
आज उसे आदेश मिला था:
राजकुल की एक अनुष्ठान-समारोह के लिए शिव-प्रतिष्ठा का “मस्तकाभूषण” बनाना है।
महल के दूत ने जाते-जाते कहा था, “यह मुकुट सिर्फ़ पहनने के लिए नहीं। यह पूजा में देव की उपस्थिति का संकेत होगा। इसे देखकर लोग समझेंगे कि राजा का मस्तक केवल सत्ता नहीं—भक्ति भी है।”
थियेन ने हथौड़ी उठाई, और सोने को हथौड़े की भाषा में समझाने लगा।
रिपूसे में एक नियम होता है:
चेहरा सामने से नहीं बनता—पीछे से उभरता है।
जैसे देवता भी कई बार हमारे सामने नहीं आते—वे हमारे भीतर से उभरते हैं।
उसने पहले मुख की रूपरेखा बनाई—शिव का। फिर दूसरा। फिर तीसरा—एक ही सिर में तीन दिशाओं की दृष्टि। उसे याद आया कि मंदिर के पुजारी ने कहा था:
“तीन मुख—तीन काल, तीन दृष्टि, और एक ही चैतन्य।”
काम के बीच दरवाज़े पर हल्की-सी खड़खड़ हुई। एक यात्री आया—दक्षिण से समुद्र पार करके। उसके कपड़ों पर नमक की परत थी और माथे पर भस्म की पतली रेखा।
“तुम ही थियेन हो?” उसने चाम भाषा के कुछ शब्दों के साथ पूछ लिया। “मैं सोमदेव। कांची के पास से आया हूँ। सुना है यहाँ धातु में देव उतारने वाले हाथ रहते हैं।”
थियेन ने सावधानी से सिर हिलाया। “मैं कोशिश करता हूँ।”
सोमदेव ने मुस्कुरा कर एक छोटी-सी पोटली खोली। उसमें कुछ चित्र थे—कागज़ नहीं, ताड़पत्र पर। शिव की अलग-अलग आकृतियाँ—कहीं शांत, कहीं उग्र, कहीं नटराज, कहीं त्रिमुख।
“ये देखो,” उसने कहा, “कभी-कभी मूँछें भी बनाते हैं—राजसी प्रतीक के तौर पर। कई जगह शिल्प में यह आ गया है।”
थियेन ने चित्र देखे। “हमारे यहाँ भी योद्धाओं की मूँछें गर्व का चिन्ह हैं,” उसने कहा। “पर देव के चेहरे पर…?”
सोमदेव ने कंधे उचकाए। “देव को लोग अपने समय की भाषा में देखते हैं। देव बदलते नहीं, पर हमारे देखने का ढंग बदल जाता है।”
थियेन के मन में जैसे एक चिंगारी बैठ गई। उसने समझा—यह “उधार” नहीं, संवाद हो सकता है। समुद्र के रास्ते विचार आते हैं, और किनारे पर उन्हें स्थानीय हवा का रंग लग जाता है।
2) रत्नों की आँखें
डायडेम पर आँखों के पास रत्न जड़ने थे। राजमहल ने रत्न दिए थे—छोटे, चमकदार, किसी की नज़र में बस “वैभव”, किसी की नज़र में “सुरक्षा”।
थियेन ने धातु को मोड़कर रत्नों की जगह बनाई। हर पत्थर जड़ते समय उसे ऐसा लगा जैसे वह आँखों में रोशनी नहीं—जागरण भर रहा है।
तीनों मुखों की मूँछें उसने साधारण नहीं रखीं। उसने उन्हें लहरदार, अलंकृत बनाया—स्थानीय योद्धा-शैली और समुद्र पार की कलात्मक लकीरें, दोनों का मिश्रण।
मूँछें जैसे कह रही थीं: “यह शिव यहाँ के भी हैं, और वहाँ के भी—या शायद दोनों के बीच की लहरों के भी।”
उसने डायडेम के किनारों पर छोटे-छोटे स्थानीय फूल-पत्तों के संकेत भी दिए—ऐसे फूल जो मंदिरों के बाहर जंगल में खिलते थे, और ऐसे पत्ते जिन्हें चाम स्त्रियाँ बालों में लगाती थीं। वह चाहता था कि यह वस्तु किसी “शुद्ध” शैली की घोषणा न करे; वह चाहती थी कि यह वस्तु कहे—हम मिले हुए लोग हैं।
जब काम पूरा हुआ, थियेन ने उसे तौलने के काँटे पर रखा।
पलड़ा थमा: 84 ग्राम।
उसने हल्का-सा हँस दिया। सोने का वजन नापा जा सकता है, पर उसके भीतर की कथा का वजन नहीं।
3) अनुष्ठान—जहाँ कला, सत्ता और भक्ति एक साथ बैठते हैं
समारोह के दिन समुद्र से हवा तेज़ थी। मंदिर के शिखरों पर ध्वज फड़फड़ा रहे थे। पुजारी मंत्र बोल रहे थे—कुछ संस्कृत के टुकड़े, कुछ स्थानीय उच्चारण में ढले हुए। राजा ने स्नान के बाद साधारण वस्त्र पहने और फिर वह स्वर्ण-डायडेम माथे पर रखा गया।
क्षण भर के लिए लोगों की आँखें झुकीं।
फिर उठीं—और तीन शिव-मुखों पर ठहर गईं।
कोई बोला, “देखो, त्रिमुख शिव।”
कोई बोला, “मूँछें कितनी राजसी!”
और किसी बूढ़ी स्त्री ने, जिसे शब्द नहीं मिले, बस इतना कहा: “देव आज बहुत पास हैं।”
समुद्री व्यापारी भीड़ में खड़े थे—कुछ भारत से, कुछ द्वीपों से। उन्होंने अलग-अलग ढंग से उस वस्तु को देखा:
किसी ने उसे “दक्षिण एशिया की शैली” कहा,
किसी ने “चंपा की शुद्ध कला”,
और किसी ने इसे सिर्फ़ सुंदर कहा—बिना सीमा के।
थियेन दूर खड़ा था। उसे गर्व नहीं, एक अजीब-सी जिम्मेदारी महसूस हुई। क्योंकि उसे लग रहा था—आज जो बनाया गया है, वह कल किसी और कहानी का हिस्सा बन जाएगा। और हर कहानी में लोग अपना मतलब जोड़ देते हैं।
4) हजार साल बाद: उसी वस्तु के सामने तीन नजरें
दृश्य वापस संग्रहालय में लौट आया।
अन्वी की साँस थोड़ी तेज़ थी, जैसे वह अभी-अभी किसी पुराने किनारे से लौटकर आई हो।
लिन्ह ने डायडेम को देखते हुए कहा, “बहुत लोग इसे ऐसे बताते हैं जैसे यह ‘भारतीय प्रभाव’ की सीधी नक़ल हो। और कई लोग इसे ऐसे देखते हैं जैसे सबकुछ ‘बाहरी’ है। दोनों ही बातें मुझे अधूरी लगती हैं।”
शास्त्री ने धीरे-धीरे सिर हिलाया। “सही। ‘प्रभाव’ शब्द में अक्सर ऊपर-नीचे की भावना आ जाती है—जैसे एक तरफ देने वाला, दूसरी तरफ लेने वाला। पर समुद्री दुनिया में अक्सर लेन-देन समान होता है। कभी किसी का मंत्र यहाँ ढलता है, कभी यहाँ का फूल वहाँ की मूर्ति पर खिल जाता है।”
अन्वी ने पूछा, “पर आज लोग इसे कैसे देखें? कुछ लोग कहते हैं—यह हमारी पहचान का प्रमाण है। कुछ कहते हैं—यह हमारी पहचान पर परछाईं है। कुछ बस कला देखते हैं।”
लिन्ह ने अपनी नोटबुक बंद की। “शायद इसीलिए यह वस्तु इतनी शक्तिशाली है। क्योंकि यह एक साथ कई सच सहन कर सकती है।”
शास्त्री ने डायडेम की ओर देख कर कहा, “मूँछें देखिए—ये वही जगह है जहाँ लोग बहस करते हैं। कोई कहेगा ‘विदेशी शैली’, कोई कहेगा ‘स्थानीय वीरता का प्रतीक’। पर सच यह भी हो सकता है कि कारीगर ने दोनों को एक ही रेखा में बाँध दिया हो—क्योंकि उसकी दुनिया में वे अलग नहीं थे।”
अन्वी को लगा—यह मुकुट एक “रिलिक” नहीं, एक “पुल” है। और पुल पर खड़े होकर हर व्यक्ति अपनी तरफ का किनारा ज्यादा साफ़ देखता है—दूसरे किनारे को कम। पर पुल का काम ही है: बीच में खड़े रहकर दोनों को जोड़ना।
उसने लेबल फिर पढ़ा—“84g.”
इतना छोटा-सा अंक, और उसके पीछे इतनी बड़ी यात्रा।
5) एक आख़िरी वाक्य, जो वस्तुओं से आता है
लिन्ह ने धीरे से कहा, “क्या आप जानते हैं, कुछ लोग आज भी पूछते हैं—यह ‘किसका’ है? किस देश का, किस धर्म का, किस परंपरा का?”
अन्वी ने जवाब नहीं दिया। उसने बस डायडेम की ओर देखा—तीन शिव-मुख, रत्नों की आँखें, और वह लहरदार मूँछें—जिनमें समुद्र की हवा अभी भी फँसी लगती थी।
शास्त्री ने जैसे अपने आप से कहा, “कभी-कभी सबसे सही जवाब होता है—यह यात्रा का है। यह उन लोगों का है जो किनारों पर मिले, जिन्होंने देव को एक-दूसरे की भाषा में सुनने की कोशिश की।”
लिन्ह ने हल्के से मुस्कुराकर जोड़ा, “और यह उन कारीगरों का भी है, जिनके नाम हम भूल गए—पर जिनकी उँगलियों की याद सोने में बची रह गई।”
अन्वी ने डायडेम को मखमली डिब्बे में रखते हुए सोचा—इतिहास का सबसे बड़ा सच शायद यही है:
आदान-प्रदान से डरने वाली सभ्यताएँ नहीं टिकतीं।
जो सभ्यताएँ संवाद को कला में बदल देती हैं, वे हजार साल बाद भी चमकती रहती हैं—84 ग्राम में भी, अनंत कथा के साथ।


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