बस… मन बहुत भटकता है

 बस… मन बहुत भटकता है

Ganesh


वाराणसी के एक पुराने मुहल्ले में रहने वाला अमित बाहर से सफल दिखता था—नौकरी अच्छी, बोलचाल तेज़, लोगों में उठना-बैठना। पर भीतर एक चीज़ रोज़ उसे थोड़ा-थोड़ा खा जाती थी: डर।

डर किस चीज़ का?
किसी एक का नहीं—सबका।

गलत होने का डर, अकेले पड़ जाने का डर, लोगों की राय का डर, अपने ही मन में उठने वाले गुस्से और ईर्ष्या का डर। और सबसे बड़ा डर—कि कहीं वह खुद को पहचान ही न पाए।

रात को सोते समय उसे अक्सर लगता, जैसे कमरे में कोई अदृश्य परछाईं है। वह समझता—ये बस तनाव है। मगर तनाव भी तो परछाईं ही है, मन के भीतर की।

एक दिन दफ्तर से लौटते हुए, उसे संकरी गलियों में एक छोटा-सा मंदिर दिखा। दरवाज़े पर घंटी नहीं, शंख नहीं—बस एक शांत-सा दीपक और धुएँ की हल्की गंध। अंदर पत्थर पर उकेरी हुई गणेश की प्रतिमा थी, पर वैसी नहीं जैसी वह बचपन से देखता आया था। चेहरा तेजस्वी, आँखें स्थिर, मुद्रा गंभीर—जैसे कोई देवता नहीं, जागी हुई चेतना हो।

मंदिर में बैठे पुजारी ने अमित को ऊपर से नीचे तक देखा और बोला,
“किसी चीज़ से भागते हो, बेटा?”

अमित ने हँसकर बात टालनी चाही, पर उसकी हँसी सूखी निकली।
“बस… मन बहुत भटकता है।”

पुजारी ने दीये की लौ को देखा, जैसे वही जवाब हो। फिर बोले,
“भटकना नहीं, डर पकड़ता है। और डर तब पकड़ता है जब हम अपने भीतर के अँधेरे को ‘अशुद्ध’ कहकर दूर फेंक देते हैं।”

अमित को यह वाक्य अजीब लगा।
“अँधेरा… अशुद्ध नहीं?”

पुजारी की आवाज़ धीमी हो गई—पर काटती हुई साफ़।
“अँधेरा भी अनुभव है। अनुभव पर ‘पवित्र-अशुद्ध’ की मुहर लगाकर हम उसे देखना बंद कर देते हैं। और जिसे देखना बंद करते हैं, वही छाया बनकर पीछा करता है।”

फिर उन्होंने प्रतिमा की ओर इशारा किया।
“यह अघोरा गणपति हैं। जो भय से परे हैं। जो साधक को सिखाते हैं—सच्चा ज्ञान आराम की कुर्सी पर नहीं आता, वह तब आता है जब तुम सच को वैसा ही देखो जैसा वह है।”

अमित ने प्रतिमा की आँखों में देखा। वहाँ कोई धमकी नहीं थी। न ही कोई मीठा आश्वासन। बस एक अजीब-सी दृढ़ शांति—जैसे कह रही हो: “मैं तुम्हारे सामने आई हूँ, भागो मत।”

रात का आमंत्रण
पुजारी ने अमित को कोई कठिन साधना नहीं बताई। कोई विधि-विधान नहीं। बस एक बात कही—

“आज रात, जब मन सबसे ज्यादा शोर करेगा, तुम इस प्रश्न के साथ बैठना:
‘मैं किससे डर रहा हूँ—और वह डर मुझे क्या दिखाना चाहता है?’
और फिर, भागना नहीं। देखना।”

अमित को लगा, यह तो साधारण-सा है। पर रात आई तो साधारण कुछ भी नहीं रहा।

कमरे की बत्तियाँ बंद थीं, पर मन का पर्दा उजला—और उस पर डर की तस्वीरें चलने लगीं।
विफलता, अपमान, अकेलापन, मृत्यु—सब।

अमित ने आँखें खोल लीं। पानी पिया। मोबाइल देखा। फिर भी वही।
उसने मन में सोचा—“मैं फिर भाग रहा हूँ।”

उसी क्षण उसे मंदिर की वह प्रतिमा याद आई—अघोरा गणपति—जो अँधेरे से डरते नहीं, बल्कि अँधेरे में छुपे भ्रम को पकड़ लेते हैं।

अमित ने फिर आँखें बंद कीं—और इस बार भागा नहीं।

डर आया। बहुत आया। पर वह बैठा रहा।
उसने देखा कि डर के पीछे असल में एक पुरानी कहानी छुपी है: “अगर मैं कमजोर दिखा, तो लोग छोड़ देंगे।”
और उस कहानी के पीछे एक और सच: “मैं खुद को छोड़ देता हूँ, इसलिए मुझे दूसरों के छोड़ने का डर लगता है।”

अमित की सांस गहरी हो गई। पहली बार उसे लगा—डर कोई राक्षस नहीं, एक संदेशवाहक है। गलत, पर ईमानदार। तेज़, पर सिखाने वाला।

छोटा-सा पत्थर, बड़ा-सा द्वार
अगले दिन दफ्तर में उसके सामने “छोटी” रुकावट आई—जैसी रोज़ आती है। बॉस ने किसी दूसरे की गलती उस पर डाल दी। पुराने अमित का नियम था: चुप रहो, मुस्कुराओ, अंदर से जलो।

लेकिन अब उसके भीतर अघोरा गणपति की वह स्थिर दृष्टि थी—जो सामाजिक डर से परे जाकर साफ़ सच देखती है।

उसने शांत स्वर में कहा,
“यह मेरी गलती नहीं है। और अगर हम सच नहीं बोलेंगे, तो यह फिर होगा।”

कमरे में एक पल सन्नाटा छा गया।
अमित का दिल तेज़ धड़का—पर वह भागा नहीं। वह खड़ा रहा।

बॉस ने बात टालने की कोशिश की, फिर मजबूरी में जांच बिठाई। गलती सामने आ गई।
किसी ने उसकी पीठ थपथपाई, किसी ने उसे “जिद्दी” कहा। लेकिन पहली बार अमित ने समझा—डर पर काबू मतलब डर का न होना नहीं, डर के रहते हुए भी सही होना।

यह वही “छोटी रुकावट” थी, जो वर्षों से उसके रास्ते में पड़ी थी—सच बोलने का डर। और उसे हटाते ही जैसे भीतर कोई दरवाज़ा खुल गया।

अनदेखी ताकतें
कुछ हफ्तों बाद अमित ने नोटिस किया कि उसके भीतर कई “अनदेखी ताकतें” चलती हैं—क्रोध, वासना, अहं, तुलना, अपराधबोध। पहले वह इन्हें “गंदा” कहकर दबा देता था। अब वह उन्हें देखता—नाम देता—और समझता कि वे किस कमी से पैदा हो रही हैं।

वह समझ गया:
इन ताकतों पर नियंत्रण किसी जादू से नहीं, अनुशासित जागरूकता से आता है।

अघोरा गणपति उसे यही सिखा रहे थे—कि जो चीज़ें हम “अशुद्ध” कहकर बाहर करते हैं, वही भीतर अंधेरे में बढ़ती हैं। और जिन्हें हम रोशनी में देख लेते हैं, वे अपना ज़हर खो देती हैं।

अंतिम दृश्य: मंदिर के सामने
एक शाम अमित फिर उसी मंदिर पहुँचा। दीया वही था, प्रतिमा वही—पर देखने वाला बदल चुका था।

उसने हाथ जोड़े नहीं, बस देर तक बैठा रहा।
मन में डर आया भी, तो अब वह राजा नहीं रहा—बस एक गुजरती लहर।

पुजारी ने दूर से कहा,
“अब समझे? अघोरा का मतलब भयावह नहीं। अघोरा का मतलब—जो भय के पार है।”

अमित ने धीमे से जवाब दिया,
“और ज्ञान… पवित्रता-अशुद्धता से परे।”

पुजारी ने सिर हिलाया।
“हाँ। क्योंकि सच को ‘साफ’ या ‘गंदा’ कहकर नहीं देखा जाता। सच को बस देखा जाता है। जैसा वह है।”

अमित जब बाहर निकला, रात उतर रही थी। पर अब रात उसे अंधकार नहीं लगी—बस एक समय, जिसमें आँखें भीतर की तरफ खुलती हैं।

और कहीं बहुत अंदर, जैसे अघोरा गणपति की वह स्थिर दृष्टि कह रही थी—
“देखो। डरो मत। और जो देख लिया, वही मुक्त कर देगा।”

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