छोटी-सी अलमारी के कोने में रखी थी एक पुरानी शीशी—गुलाब के इत्र की। हर बार जब भी राधिका उस अलमारी को खोलती, एक हल्की-सी खुशबू पूरे कमरे में फैल जाती। वह वही खुशबू थी जिसे उसकी माँ अपनी साड़ी के पल्लू पर छिड़क कर मंदिर जाया करती थीं।
माँ अब नहीं थीं। पाँच साल हो गए थे उन्हें गए हुए, लेकिन वो इत्र… उसकी खुशबू… आज भी वैसे ही थी। जैसे माँ ने ही अभी अभी अलमारी खोली हो।
राधिका अब एक कामकाजी महिला थी। बड़े शहर में रहती थी, ऊँची इमारत में, कई कमरों वाले फ्लैट में। लेकिन उस गाँव वाले छोटे से घर की मिट्टी की खुशबू, माँ के पल्लू की महक, बारिश में भीगी तुलसी की गंध — सब उसे खींचते थे।
एक दिन राधिका छुट्टी लेकर गाँव गई। माँ का आँगन वैसा ही था, तुलसी चौरा अब भी सुबह की धूप में नहा रहा था। वह चुपचाप तुलसी में जल डालते हुए रो पड़ी — उस मिट्टी में आज भी माँ की खुशबू थी।
राधिका ने इत्र की वही शीशी अपने साथ शहर ले ली। ऑफिस के एक दिन, जब वह बेहद थकी हुई लौटी, उसने उस इत्र को खोलकर थोड़ा अपने रूमाल पर लगाया। एक अजीब सुकून था उसमें।
उस खुशबू ने मानो माँ की गोद की छाया फैला दी हो। उस दिन पहली बार राधिका को एहसास हुआ कि माँ कहीं गई नहीं हैं — वो तो बस एक खुशबू बनकर, उसके आसपास हर समय मौजूद हैं।
"कुछ रिश्ते दिखाई नहीं देते, लेकिन उनकी महक हर सांस में होती है। खुशबू कभी मरती नहीं — वह हमेशा कहीं न कहीं मौजूद रहती है, ठीक उसी तरह जैसे माँ।"

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