उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव सतवापुर की पहचान वहाँ की पारंपरिक कला और संस्कृति से थी। खासकर, वहाँ की औरतें चूड़ियाँ बनाने की कला में माहिर थीं। पीढ़ी दर पीढ़ी ये कला माँ से बेटी को सौंप दी जाती, जैसे एक अमूल्य धरोहर।
मीरा, उसी गाँव की एक होशियार और स्वाभिमानी लड़की थी। उसकी माँ, रुक्मिणी देवी, गाँव की सबसे कुशल चूड़ी शिल्पकार थीं। मीरा बचपन से ही उनके पास बैठकर सीखा करती — रंगों का मेल, काँच की नज़ाकत, और हाथों की चपलता।
लेकिन जब मीरा शहर पढ़ने गई, तो वहाँ के लोग उसकी कला का मज़ाक उड़ाने लगे।
"ये सब गाँव की बातें हैं, आज के ज़माने में कौन चूड़ी पहनता है?"
"काँच की चूड़ी पहनकर फैशन नहीं बनता, मीरा!"
मीरा का मन दुख से भर गया। कुछ दिन तो उसने अपनी कला से नज़रें चुराईं, पर एक दिन जब उसने अपनी माँ की बनाई हुई चूड़ियाँ एक विदेशी पर्यटक को बेहद सम्मान से खरीदते देखा, तो उसका आत्मविश्वास लौट आया।
मीरा ने तय किया कि अब वह अपनी संस्कृति को शर्म नहीं, गर्व का कारण बनाएगी।
उसने एक ऑनलाइन पेज शुरू किया — "स्वाभिमान चूड़ी कला", जहाँ वह गाँव की औरतों द्वारा बनाई गई पारंपरिक चूड़ियाँ बेचने लगी। धीरे-धीरे उसके काम को पहचान मिली। शहर के बड़े-बड़े बुटीक और फैशन हाउस भी उससे संपर्क करने लगे।
एक दिन वही लोग जो उसकी कला का मज़ाक उड़ाते थे, उसे मंच पर पुरस्कार लेते देख रहे थे।
मीरा ने मंच से कहा:
"हमारी संस्कृति हमारे स्वाभिमान की पहचान है। जब हम खुद अपनी जड़ों से शर्माते हैं, तब दुनिया भी हमें तुच्छ समझती है। लेकिन जब हम सिर ऊँचा करके कहते हैं — हाँ, मैं इस मिट्टी से हूँ, तब पूरी दुनिया झुककर सलाम करती है।"
उसके गाँव की महिलाएँ गर्व से फूली नहीं समा रही थीं। अब सतवापुर सिर्फ एक गाँव नहीं, सांस्कृतिक पुनर्जागरण की मिसाल बन गया था।

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