अद्भुत अप्सरा: एक माँ की अनकही कहानी
सुजाता जी की दुनिया उनकी बेटी, अनन्या, के इर्द-गिर्द घूमती थी। अनन्या, जिसे प्यार से सब 'अनु' कहते थे, एक अद्भुत नर्तकी थी। जब वह घुँघरू पहनकर मंच पर उतरती, तो ऐसा लगता मानो कोई अप्सरा स्वर्ग से उतर आई हो। उसकी हर मुद्रा, हर भाव, देखने वालों का मन मोह लेता था। लोग कहते थे, "सुजाता जी, आपकी बेटी तो साक्षात कला की देवी है!"
यह कहानी है एक माँ के त्याग की, एक बेटी के सपनों की, और एक ऐसे सच की जो मंच की चकाचौंध के पीछे छिपा था।
सुजाता जी खुद एक बेहतरीन कथक नृत्यांगना बनना चाहती थीं। उनका सपना था देश के सबसे बड़े मंचों पर प्रदर्शन करना। लेकिन शादी और फिर अनु के जन्म के बाद, उनके सपने घर की चारदीवारी में कहीं खो गए। उन्होंने अपने सारे अधूरे सपनों को अपनी बेटी की आँखों में देखना शुरू कर दिया।
वह अनु की गुरु भी थीं और माँ भी। वह सुबह चार बजे उठकर अनु को रियाज़ करातीं, उसके खाने-पीने का ध्यान रखतीं, और उसके हर प्रदर्शन के लिए खुद उसके कपड़े तैयार करतीं। अनु की हर सफलता पर सबसे ज़्यादा खुशी सुजाता जी को ही होती थी।
इस कहानी के दो और महत्वपूर्ण किरदार हैं - सुजाता जी के पति, रमेश जी, और उनका बेटा, अमित। रमेश जी एक सीधे-सादे सरकारी कर्मचारी थे। उन्हें कला की ज़्यादा समझ नहीं थी, पर वह अपनी पत्नी और बेटी, दोनों से बहुत प्यार करते थे। अमित, जो अपनी बहन से दो साल छोटा था, अक्सर अपनी माँ से शिकायत करता था, "माँ, आप हमेशा दीदी पर ही ध्यान देती हो। मैं तो जैसे इस घर में हूँ ही नहीं।"
सुजाता जी उसे समझातीं, "बेटा, तेरी दीदी को अभी मेरी ज़्यादा ज़रूरत है। उसे बहुत बड़ा कलाकार बनना है।"
धीरे-धीरे, अमित के मन में अपनी बहन के लिए एक अनकही ईर्ष्या और अपनी माँ के लिए एक शिकायत घर करने लगी। उसे लगता था कि उसकी माँ का सारा प्यार सिर्फ अनु के लिए है।
समय बीता। अनु अब देश की एक जानी-मानी नृत्यांगना बन चुकी थी। उसे लंदन के एक प्रतिष्ठित कला महोत्सव में भारत का प्रतिनिधित्व करने का निमंत्रण मिला। यह उसके और सुजाता जी के जीवन का सबसे बड़ा सपना था जो सच होने जा रहा था।
घर में खुशी का माहौल था, पर इसी बीच एक दुखद घटना घटी। एक छोटे से एक्सीडेंट में, सुजाता जी के दाहिने पैर में गंभीर चोट आ गई। डॉक्टर ने कहा कि चोट बहुत गहरी है और अब वह शायद कभी ठीक से चल भी नहीं पाएँगी, नाचना तो बहुत दूर की बात है।
यह खबर सुनकर अनु टूट गई। उसने लंदन जाने से मना कर दिया। "मैं आपको इस हालत में छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगी, माँ," उसने रोते हुए कहा।
"पगली," सुजाता जी ने मुस्कुराते हुए कहा, "मेरी चिंता मत कर। तू मेरा सपना पूरा करने जा रही है। यही मेरे लिए सबसे बड़ी दवा होगी।"
उस रात, जब अनु अपनी माँ के पास सो रही थी, तो उसने देखा कि दर्द के मारे उनकी आँखों से चुपचाप आँसू बह रहे हैं, पर उनके होठों पर एक शांत मुस्कान थी।
अनु लंदन चली गई, पर उसका मन अपनी माँ के पास ही अटका हुआ था।
यहाँ घर पर, रमेश जी और अमित, सुजाता जी की देखभाल कर रहे थे। एक दिन, जब अमित अपनी माँ के पैर में मरहम लगा रहा था, तो उसने देखा कि उनके पैर कितने खराब हो चुके हैं। सालों तक नंगे पैर रियाज़ करने और मंच के पीछे भाग-दौड़ करने के कारण उनकी एड़ियाँ फट चुकी थीं और पैरों में अनगिनत चोटों के निशान थे।
उसने धीरे से पूछा, "माँ, आपको बहुत दर्द होता होगा, है ना?"
सुजाता जी ने मुस्कुराकर कहा, "जब तेरी दीदी मंच पर नाचती है, तो मैं अपना सारा दर्द भूल जाती हूँ, बेटा।"
अमित की आँखों में आँसू आ गए। आज उसे पहली बार अपनी माँ का त्याग दिखाई दिया था। वह हमेशा सोचता था कि माँ अनु से ज़्यादा प्यार करती हैं, पर आज उसे समझ आया कि माँ ने तो अपने अस्तित्व को ही अपनी बेटी के सपनों में विलीन कर दिया था।
उसने अपनी माँ के हाथ पकड़ लिए। "मुझे माफ कर दो, माँ। मैं आपको कभी समझ ही नहीं पाया।"
उधर लंदन में, अनु का प्रदर्शन था। मंच पर आने से ठीक पहले, उसने अपनी माँ को फोन किया। "माँ, मुझे बहुत डर लग रहा है।"
सुजाता जी ने कहा, "आँखें बंद कर, बेटी। और सोच कि तू अकेली नहीं है। तेरे साथ तेरे घुँघरुओं में मैं भी नाच रही हूँ।"
उस रात, अनु ने ऐसा नृत्य किया जैसा पहले कभी नहीं किया था। उसकी हर मुद्रा में उसकी माँ का त्याग था, हर भाव में उसकी माँ का आशीर्वाद था। जब प्रदर्शन खत्म हुआ, तो पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा। लोगों ने उसे 'अद्भुत अप्सरा' का खिताब दिया।
जब अनु भारत लौटी, तो उसने अपनी सारी पुरस्कार राशि अपनी माँ के इलाज के लिए दे दी। उसने अपने भाई, अमित, से भी माफी माँगी। "मुझे माफ कर दे, अमित। मैं अपने सपनों में इतनी खो गई थी कि यह देख ही नहीं पाई कि मेरी वजह से तू कितना अकेला महसूस कर रहा था।"
अमित ने उसे गले से लगा लिया। "गलती तुम्हारी नहीं, दीदी। गलती मेरी थी। मैं माँ के त्याग को उनका पक्षपात समझ बैठा था।"
उस दिन, उस परिवार के सारे गिले-शिकवे धुल गए।
कुछ महीनों बाद, सुजाता जी के पैरों का सफल ऑपरेशन हुआ। वह अब धीरे-धीरे चलने लगी थीं।
एक शाम, जब अनु रियाज़ कर रही थी, तो सुजाता जी धीरे से उठीं, अपने घुँघरू पहने, और सालों बाद, अपनी बेटी के साथ एक ताल पर थिरकने लगीं। उनकी गति धीमी थी, पर उनके भावों में वही पुरानी आत्मा थी।
रमेश जी और अमित दरवाज़े पर खड़े यह अद्भुत दृश्य देख रहे थे। आज मंच पर दो अप्सराएँ थीं - एक बेटी, जो दुनिया के लिए अद्भुत अप्सरा थी, और एक माँ, जो उस अप्सरा को बनाने वाली असली, अनकही और अद्भुत अप्सरा थी।
यह कहानी हमें सिखाती है कि हर सफलता के पीछे त्याग और प्रेम की एक अनकही कहानी होती है। एक माँ का प्यार और बलिदान ही वह नींव है, जिस पर उसके बच्चे अपने सपनों का महल खड़ा करते हैं।
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