गाँव के बाहरी छोर पर एक पुराना नीम का पेड़ था। छांव में सुकून देने वाला, और उसके कड़वे पत्ते जाने कितने बच्चों की बीमारियाँ दूर कर चुके थे। लेकिन इस पेड़ की कहानी उतनी ही गहरी और भावुक थी, जितनी उसकी जड़ें ज़मीन में।
यह नीम का पेड़ रामू काका ने अपने बेटे के जन्म पर लगाया था। उनका सपना था—बेटा बड़ा होकर पढ़-लिख जाए, शहर जाए, और एक बड़ा आदमी बने। “जब तू बड़ा होगा बेटा, इस पेड़ की छांव में बैठकर पढ़ा करेगा,” रामू काका ने कभी छोटे मनु को गोद में लेकर कहा था।
मनु बड़ा हुआ, पढ़ाई में तेज था। नीम के नीचे बैठकर किताबें पढ़ता, कभी माँ से कहता – “माँ, नीम के पत्ते बहुत कड़वे हैं, पर इस पेड़ के नीचे दिमाग तेज़ चलता है।” माँ हँसकर कहती, “बिलकुल, जैसे तेरे बाबा का दिल – बाहर से सख़्त, अंदर से नरम।”
समय के साथ मनु शहर चला गया, पढ़ाई की, नौकरी मिली। पहले ख़त आते थे, फिर फोन... फिर चुप्पी।
गाँव में सिर्फ रामू काका और नीम का पेड़ रह गए थे।
एक दिन गांव में खबर फैली – “मनु बाबू आए हैं!”
पूरा गाँव जमा हो गया। हाथ में मोबाइल, आँखों में चश्मा, और पाँव में जूते – मनु अब किसी शहर के बाबू लगते थे। उन्होंने झेंपते हुए नीम के पेड़ की ओर देखा। पेड़ अब बूढ़ा हो चला था, उसकी एक डाली टूट चुकी थी।
रामू काका ने बेटे से कहा – “बेटा, इस पेड़ को काटने की बात चल रही है। सरपंच कहते हैं, सड़क चौड़ी करनी है।”
मनु ने सिर झुका लिया – “तो काट दीजिए बाबा, अब इसकी क्या ज़रूरत?”
रामू काका की आँखें डबडबा गईं। उन्होंने कांपती आवाज़ में कहा –
“बेटा, नीम का पेड़ अगर काट दिया, तो वो हिस्सा भी मर जाएगा जिसमें तू बड़ा हुआ, जिसके नीचे तूने सपने देखे थे। सड़क बन जाएगी, पर यादें खो जाएँगी।”
मनु कुछ नहीं बोला। लेकिन अगली सुबह उसने खुद गांव के लोगों के साथ मिलकर पेड़ के चारों ओर ईंट की गोल चौकी बनवाई। बोर्ड लगाया –
“यह पेड़ स्मृति है – एक बेटे की सफलता, एक पिता की आशा और एक गांव की आत्मा।”
पेड़ बच गया।
कहते हैं, आज भी जब गर्मियों में नीम की छांव गांव के बच्चों को सुकून देती है, तो पेड़ की फुनगियों पर एक पिता की मुस्कुराहट और बेटे की पश्चाताप तैरती है।

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