
गाँव के उस पुराने पीपल के पेड़ के नीचे एक मिट्टी का घर था — छोटा, मगर बेहद प्यारा। उसी घर में रहते थे दादाजी — श्री हरिनारायण शुक्ला। सफेद धोती, खादी का कुर्ता, माथे पर चंदन की पट्टी और एक गहरी, स्नेहभरी मुस्कान उनके चेहरे की पहचान थी।
दादाजी सिर्फ इस घर के मुखिया नहीं थे, वे पूरे गाँव के संरक्षक थे। कोई बीमार हो, किसी के खेत में नदानी करनी हो, या किसी के बेटे की शादी — बिना दादाजी की सलाह के कोई निर्णय नहीं लिया जाता।
उनके चार बेटे शहर में नौकरी करते थे। साल में बस एक बार, दिवाली या होली पर, कुछ दिनों के लिए आते और फिर चले जाते। गाँव की मिट्टी, वह चौपाल, वह गंध — सब अब उनके लिए सिर्फ एक पुरानी याद बन गई थी।
लेकिन वह चौखट...
दादाजी की नज़रें हर शाम चौखट की ओर उठती थीं। “शायद आज कोई आ जाए” — उनकी आँखों में उम्मीद की झलक दिखती।
गाँव के बच्चे उन्हें घेरकर रामायण सुनते। दादाजी जब भी कहानियाँ सुनाते, उनकी आँखें चमक उठतीं। वे सबको कहते, "बचपन में जो सुना, वो कभी नहीं भूलता बेटा।"
एक दिन, अचानक दादाजी की तबीयत बिगड़ गई। गाँव के डॉक्टर ने बताया, "अब ज्यादा समय नहीं है।" बेटे बुलाए गए। सब आए, मगर अब देर हो चुकी थी। दादाजी की सांसें थम चुकी थीं — मगर चेहरे पर वही मुस्कान थी। जैसे किसी अपने को आते देख ली हो।
उनकी चौखट अब खाली थी, लेकिन उनकी कहानियाँ, उनका प्यार, उनकी खुशबू — सब कुछ उस मिट्टी में अब भी जीवित था।
आज गाँव में एक पुस्तकालय है — "हरिनारायण ग्रंथालय" — जहाँ बच्चे अब भी दादाजी की कहानियाँ पढ़ते हैं।
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