सैंक्चुअरी ऑफ ट्रुथ
पटाया की सुबह नमकीन हवा से भरी थी। समुद्र किनारे धूप ऐसे फैल रही थी जैसे किसी ने सुनहरी चादर बिछा दी हो। आरव पहली बार थाईलैंड आया था—काम के लिए, पर मन में एक अनजानी-सी तलाश भी थी। वह पिछले कुछ महीनों से भीतर ही भीतर उलझा हुआ था: सच क्या है, और वह कहाँ मिलता है—किताबों में, लोगों में, या खुद के भीतर?
टैक्सी वाले ने बस इतना कहा था, “सैंक्चुअरी ऑफ ट्रुथ… यू सी, यू फील।”
और फिर रास्ता लकड़ी की गंध की तरफ मुड़ गया।
1) लकड़ी का मंदिर, जो साँस लेता था
समुद्र के किनारे खड़ा वह अभयारण्य कोई साधारण इमारत नहीं लगा। ऊँचे शिखर, गहन नक्काशी, और हर जगह लकड़ी की मूर्तियाँ—ऐसी जैसे पत्थर की नहीं, समय की परतों को तराशकर बनाई गई हों। हवा जब लकड़ी के गलियारों से गुजरती, तो लगता इमारत सचमुच साँस ले रही है।
आरव ने भीतर कदम रखा। कारीगरों की धीमी ठक-ठक सुनाई दी—छेनी और हथौड़ी की, जो किसी प्रार्थना की लय जैसी थी। लकड़ी की महीन रेत हवा में तैर रही थी—जैसे मंदिर खुद अपना नया रूप गढ़ रहा हो।
वहीं उसे एक बूढ़ा कारीगर दिखा—पतले हाथ, स्थिर आँखें, और चेहरे पर शांत गंभीरता। उसके नाम की पट्टी पर लिखा था: सोमचाई।
आरव ने झिझकते हुए पूछा, “यह मंदिर… इतना अलग क्यों लगता है?”
सोमचाई ने बिना काम रोके कहा, “क्योंकि यह सिर्फ देखने के लिए नहीं है। यह समझने के लिए है। यहाँ हर मूर्ति एक सवाल है—और हर गलियारा, जवाब तक पहुँचने की कोशिश।”
2) गरुड़ के पंखों की छाया
चलते-चलते आरव एक विशाल आकृति के सामने ठहर गया। ऊपर ऊँचाई में, लकड़ी में तराशी हुई गरुड़ की मूर्ति—पंख फैले हुए, देह में गति, और चेहरे पर वह दृढ़ता जो तूफान से भी नहीं डरती। गरुड़ के साथ श्री विष्णु की उपस्थिति थी—शांत, स्थिर, जैसे सारी हलचल के बीच भी भीतर कोई केंद्र हो जो नहीं डगमगाता।
आरव को लगा, यह मूर्ति केवल कथा नहीं—किसी अनुभव का रूप है।
वह देर तक देखता रहा। फिर अनायास बोल पड़ा, “गरुड़ उड़ते हैं… विष्णु स्थिर हैं। दोनों साथ कैसे?”
सोमचाई पास आकर बोले, “सत्य भी ऐसा ही है। बाहर की दुनिया गरुड़ की तरह दौड़ती है—समाचार, चिंता, लालच, डर। लेकिन भीतर का सत्य विष्णु की तरह स्थिर रहता है। अगर भीतर स्थिरता नहीं, तो उड़ान दिशा खो देती है।”
आरव ने देखा—गरुड़ के पंखों के नीचे छोटी-छोटी नक्काशियाँ थीं: मनुष्य, पशु, देव-आकृतियाँ, लहरें, और समय की लकीरें। जैसे पूरा संसार एक ही पंख में समा गया हो।
3) मूर्ति के भीतर जागती कथा
उसी रात आरव होटल में सो नहीं पाया। उसके मन में वही दृश्य घूमता रहा—गरुड़ की उड़ान, विष्णु की शांति। अगले दिन वह फिर अभयारण्य पहुँचा। इस बार वह भीड़ से अलग, एक शांत कोने में बैठ गया।
लकड़ी की सुगंध, समुद्र की गूँज, और दूर से आती छेनी की लय—इन सबके बीच उसकी आँखें अपने आप बंद हो गईं।
और तब उसने एक दृश्य देखा—जैसे सपना हो, पर इतना साफ कि जागरण लगे।
एक विशाल आकाश में गरुड़ उड़ रहा था। नीचे समुद्र उफन रहा था, हवा काँप रही थी। गरुड़ के पंखों पर धूल नहीं—मानो लोगों की चिंताएँ चिपकी थीं: किसी का झूठ, किसी का अहं, किसी का लोभ, किसी का डर। गरुड़ उड़ तो रहा था, पर भारी होता जा रहा था।
तभी विष्णु की आवाज़—बहुत धीमी, पर भीतर तक जाती हुई—उभरी:
“उड़ना तुम्हारा स्वभाव है, गरुड़। पर उड़ान का भार तुम्हें नहीं उठाना। भार उन असत्यों का है, जिन्हें तुमने सच मान लिया।”
गरुड़ ने पूछा, “तो सत्य क्या है?”
विष्णु बोले, “जो किसी को तोड़कर नहीं बनता। जो भय से नहीं चलता। जो तुम्हें और दूसरों को एक ही जीवन की डोर में जोड़ देता है—वही सत्य है।”
तूफान की आवाज़ कम होने लगी। गरुड़ के पंख हल्के होते गए। समुद्र की लहरों में भी एक लय आ गई—जैसे भीतर की शांति बाहर की हलचल को दिशा दे रही हो।
आरव की आँखें खुलीं। वह उसी कोने में बैठा था, पर अब उसका मन पहले जैसा नहीं था।
4) “सत्य” की परिभाषा, एक कारीगर से
सोमचाई फिर मिला। आरव ने धीरे से कहा, “मुझे लगा… जैसे मूर्ति ने मुझसे बात की।”
सोमचाई ने मुस्कुराकर छेनी रख दी। “अच्छा है। यहाँ कई लोग तस्वीर लेते हैं, कुछ लोग इतिहास पूछते हैं, पर बहुत कम लोग मूर्ति की भाषा सुनते हैं।”
आरव ने पूछा, “आपके लिए सत्य क्या है?”
सोमचाई ने लकड़ी का एक छोटा टुकड़ा उठाया। उस पर आधा चेहरा तराशा था—आँख अभी अधूरी थी। उन्होंने कहा,
“देखो, यह आँख पूरी नहीं है, पर तुम पहचान लेते हो कि यह आँख है। सत्य भी अक्सर अधूरा दिखता है—हमारी समझ के कारण। पर वह झूठ नहीं होता। झूठ वह है जो पूरा दिखे, पर भीतर खोखला हो।”
आरव ने उस अधूरी आँख को देखा। उसे लगा जैसे किसी ने उसकी अपनी ज़िंदगी का एक हिस्सा उसके सामने रख दिया हो—जहाँ वह पूर्णता के दिखावे में भागता रहा, और भीतर की सच्चाई से दूर होता गया।
5) गरुड़-विष्णु: उड़ान और केंद्र
वह फिर उसी विशाल मूर्ति के सामने गया। अब उसे गरुड़ का आवेग केवल शक्ति नहीं लगा—वह जिम्मेदारी भी लगा। और विष्णु की शांति केवल मौन नहीं—वह सत्य का केंद्र लगी।
आरव ने मन ही मन कहा:
“मेरी ज़िंदगी में गरुड़ बहुत है—दौड़, लक्ष्य, प्रतिस्पर्धा। पर विष्णु कम है—वह केंद्र, जहाँ से मैं खुद को देख सकूँ।”
समुद्र की हवा अंदर आई। लकड़ी के गलियारों में एक धीमी सरसराहट हुई—जैसे किसी ने पर्दा हटाकर रोशनी डाल दी हो।
6) लौटते कदम, बदला हुआ मन
जब आरव बाहर निकला, पटाया वैसा ही था—सड़कें, दुकानें, पर्यटक, शोर। पर उसके भीतर कुछ बदल चुका था। उसे लगा उसने “सत्य” कोई नया शब्द नहीं पाया—उसने बस अपने भीतर पुराने शब्दों की धूल साफ की है।
और उस अभयारण्य में, गरुड़ और श्री विष्णु की वह अद्भुत मूर्ति, उसके लिए अब सिर्फ कला नहीं रही—वह एक संकेत बन गई:
उड़ते रहो, पर केंद्र मत खोओ।
शक्ति रखो, पर सत्य से अलग मत हो।
और सबसे जरूरी—भीतर की शांति के बिना, बाहर की जीत भी अधूरी है।
अगर आप चाहें, मैं इसी कहानी का एक “बाल-कथा” संस्करण या फिर “मिथकीय-रहस्य” (जहाँ अभयारण्य की नक्काशी एक छुपा संदेश खोलती है) वाला संस्करण भी लिख दूँ।

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