धुरंधर: एक कलाकार के अहंकार और आत्म-खोज की कहानी
'धुरंधर' - यह शब्द सिर्फ़ एक उपाधि नहीं, बल्कि एक नशा है। एक ऐसा नशा, जो इंसान को सफलता की ऊँचाइयों पर तो ले जाता है, पर अक्सर उसे उसकी जड़ों और इंसानियत से दूर कर देता है। यह कहानी है ऐसे ही एक धुरंधर, पंडित रविशंकर शर्मा, की।
पंडित रविशंकर, बनारस घराने के एक विश्व-प्रसिद्ध सितार वादक थे। उनकी उँगलियाँ जब सितार के तारों पर चलतीं, तो लगता मानो स्वयं सरस्वती वीणा बजा रही हों। दुनिया उन्हें 'सुरों का जादूगर' कहती थी। वह सचमुच अपने फन के धुरंधर थे। पर इस सफलता ने उन्हें अभिमानी और अकेला बना दिया था।
यह कहानी है पंडित जी की, उनके एकमात्र शिष्य, आलोक, की और उस एक घटना की, जिसने उन्हें 'धुरंधर' होने का असली मतलब सिखाया।
आलोक, एक छोटे से गाँव का लड़का था, जिसकी आँखों में अपने गुरु जैसा बनने का सपना था। वह पिछले दस सालों से पंडित जी की सेवा में था। वह उनका शिष्य भी था, सेवक भी, और शायद अकेला दोस्त भी। वह अपने गुरु की हर डाँट को प्रसाद समझकर ग्रहण करता, इस उम्मीद में कि एक दिन उसे भी वह ज्ञान मिलेगा, जो उसके गुरु के पास है।
इस कहानी की एक और महत्वपूर्ण पात्र हैं, पंडित जी की बेटी, मीरा। मीरा अपने पिता से बहुत प्यार करती थी, पर उनके अहंकार और अकेलेपन से बहुत दुखी रहती थी।
"पापा," वह अक्सर कहती, "आप क्यों हर समय इस खोल में बंद रहते हैं? दुनिया आपसे प्यार करती है, पर आप किसी को अपने करीब ही नहीं आने देते।"
"कलाकार का जीवन एकाकी होता है, बेटी," पंडित जी एक गहरी, गंभीर आवाज़ में कहते। "भीड़ साधारण लोगों के लिए होती है, धुरंधर के लिए नहीं।"
यह एक पिता और बेटी के बीच की वैचारिक खाई थी।
कहानी में मोड़ तब आया, जब भारत सरकार ने देश के सबसे बड़े संगीत समारोह, 'तानसेन समारोह', में पंडित जी को 'संगीत मार्तंड' की उपाधि से सम्मानित करने का फैसला किया।
यह उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि थी। पर इस खुशी के साथ एक चुनौती भी थी। समारोह में उन्हें एक युवा कलाकार के साथ जुगलबंदी करनी थी।
पंडित जी ने इसके लिए अपने सबसे प्रिय शिष्य, आलोक, को चुना।
आलोक के लिए, यह एक सपने के सच होने जैसा था। अपने गुरु के साथ एक ही मंच पर प्रदर्शन करना, इससे बड़ा सम्मान और क्या हो सकता था? उसने दिन-रात एक कर दिया।
पर जैसे-जैसे समारोह का दिन नज़दीक आ रहा था, पंडित जी का अहंकार उन पर और भी हावी होता जा रहा था। उन्हें लगने लगा कि आलोक अभी उनके स्तर का नहीं है। वह उसकी हर छोटी-बड़ी गलती पर उसे बुरी तरह डाँटते।
"तुम्हारे सुरों में आत्मा कहाँ है, आलोक?" वह रियाज़ के दौरान चीखते। "तुम सिर्फ नकल कर रहे हो, महसूस नहीं कर रहे!"
यह एक गुरु और शिष्य के बीच की गलतफहमी थी। पंडित जी अपनी कला की पवित्रता को लेकर इतने जुनूनी थे कि वह यह देख ही नहीं पा रहे थे कि उनकी डाँट उनके शिष्य का आत्मविश्वास तोड़ रही है।
समारोह से एक रात पहले, रियाज़ के दौरान, आलोक से एक छोटी सी चूक हो गई। पंडित जी का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया।
"तुमसे नहीं होगा!" वह गरजे। "तुम मेरे साथ मंच पर बैठने के लायक नहीं हो। तुमने मेरी नाक कटवा दी!"
यह शब्द आलोक के दिल में कटार की तरह चुभ गए। दस साल की सेवा, दस साल की तपस्या, एक पल में मिट्टी में मिल गई। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। वह चुपचाप उठा और बिना कुछ कहे, वहाँ से चला गया।
उस रात, आलोक गायब हो गया।
अगले दिन, समारोह का दिन था। मंच सजा हुआ था, दर्शक इंतज़ार कर रहे थे, पर आलोक का कहीं पता नहीं था।
पंडित जी परेशान थे, पर उनका अहंकार अब भी उन पर हावी था। "ठीक है! अगर वह नहीं आना चाहता, तो न आए। मैं अकेला ही प्रदर्शन करूँगा। एक धुरंधर को किसी सहारे की ज़रूरत नहीं होती।"
जब वह मंच पर पहुँ-चे, और हज़ारों लोगों की भीड़ को देखा, तो आज पहली बार उनके हाथ कांप रहे थे। उनका सितार बेसुरा लग रहा था। उन्हें आज पहली बार अकेलेपन का एहसास हो रहा था।
तभी, उन्होंने दर्शकों के बीच अपनी बेटी, मीरा, को देखा, जो रो रही थी।
उस एक पल में, उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ। यह एक कलाकार का आत्म-बोध था। उन्हें समझ आया कि उन्होंने अपनी कला के अहंकार में, उस एक इंसान को खो दिया है, जो निःस्वार्थ भाव से हमेशा उनके साथ था।
उन्होंने अपना सितार नीचे रखा और माइक हाथ में लिया।
"देवियों और सज्जनों," उनकी nghẹn ngat आवाज़ में कहा, "आज मैं यहाँ प्रदर्शन करने के लायक नहीं हूँ। एक सच्चा धुरंधर वह नहीं जो अकेले ऊँचाई पर पहुँ-चे, बल्कि वह है जो अपने साथ दूसरों को भी लेकर चले। मैंने अपने अभिमान में, अपने सबसे योग्य शिष्य का दिल दुखाया है। आलोक, अगर तुम मुझे सुन रहे हो, तो मुझे माफ कर दो। यह मंच, यह सम्मान, सब कुछ तुम्हारे बिना अधूरा है।"
वह मंच पर ही घुटनों के बल बैठ गए।
तभी, हॉल के पिछले दरवाज़े से कोई अंदर आया। वह आलोक था। उसकी आँखें लाल थीं, पर आज उनमें डर नहीं, अपने गुरु के लिए एक गहरा सम्मान था।
वह दौड़कर मंच पर आया और अपने गुरु को उठाया।
"गुरुजी," उसने रोते हुए कहा, "शिष्य कभी गुरु से रूठता नहीं। मैं तो बस इसलिए दूर चला गया था, ताकि मेरी वजह से आपके सम्मान पर कोई आँच न आए।"
उस रात, उस मंच पर दो शरीर नहीं, बल्कि दो आत्माएँ एक हो गईं। गुरु और शिष्य ने मिलकर ऐसी जुगलबंदी प्रस्तुत की, जिसे लोगों ने सालों तक याद रखा।
यह कहानी हमें सिखाती है कि सच्ची महानता या 'धुरंधर' होना सिर्फ़ अपने हुनर में सर्वश्रेष्ठ होना नहीं है। यह अपनी सफलता को विनम्रता के साथ सँभालने, और उन लोगों का सम्मान करने में है जो हमारी यात्रा में हमारा साथ देते हैं। अहंकार हमें अकेला कर देता है, जबकि प्रेम और सम्मान हमें पूर्ण बनाते हैं।
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