दादी का इलाज: भरोसा, परिवार और इंसानियत

  दादी का इलाज: भरोसा, परिवार और इंसानियत

dadi ka ilaj

वाराणसी के पास एक छोटे-से कस्बे की तंग गलियों में, जहाँ बरसात के बाद मिट्टी की सोंधी गंध और नालियों के पानी की पतली धार साथ-साथ बहती थी, मीरा अपने आँगन में गीले कपड़े निचोड़ रही थी। उसके हाथों की नसें उभरी थीं, जैसे जिम्मेदारियों ने उनमें स्थायी घर बना लिया हो।

घर के अंदर दादी शांति की खाँसी की आवाज़ बार-बार दीवारों से टकराकर बाहर आती थी—पतली, थकी हुई, पर जिद्दी।

मीरा ने दरवाज़े की ओर देखा। आँखें लाल नहीं थीं, लेकिन उनमें एक ऐसी चमक थी जो रोने से पहले आती है। वह खुद से ही बुदबुदाई,
“भगवान… बस आज राघव सच बोल दे।”

राघव—उसका पति—शहर में टेम्पो चलाता था। महीने की शुरुआत में वह हँसता-हँसाता घर आता, लेकिन पिछले कुछ हफ्तों से उसके चेहरे पर एक अलग-सी खामोशी उतर आई थी। जेब में पैसे कम दिखते, और फोन पर वह अक्सर धीमी आवाज़ में किसी से बात करता—इतनी धीमी कि मीरा का शक तेज़ हो जाता।

उसी शाम, मोहल्ले की मस्जिद से अज़ान और पास के मंदिर से आरती की घंटी एक साथ हवा में घुल रही थीं। मीरा चूल्हे पर दाल चढ़ा रही थी, तभी दरवाज़े की चिटखनी हिली।

राघव अंदर आया। कपड़ों में बारिश की नमी, माथे पर पसीने की महीन परत, और आँखों में थकान के साथ कोई छिपी हुई बेचैनी। उसने जूते बाहर उतारे, बिना ऊपर देखे बोला,
“दादी ने दवा ली?”

मीरा ने प्लेट रखते हुए उसकी तरफ देखा। उसके चेहरे पर मुस्कान नहीं थी, बस एक कसा हुआ संयम।
“ली… पर डॉक्टर ने कहा है जाँच करवानी पड़ेगी। पैसे…?”

राघव ने जेब टटोली, कुछ सिक्के निकाले, फिर रुक गया। उसकी पलकें झपकते-झपकते भारी हो गईं।
“कल… कल देखता हूँ।”

“हर बार कल।” मीरा की आवाज़ धीमी थी, पर उसमें काँटा था। “राघव, सच बोलो। पैसे कहाँ जा रहे हैं?”

राघव की गर्दन की नस तन गई। उसने पानी का गिलास उठाया, जैसे गिलास का सहारा लेकर शब्दों से बच जाएगा।
“मीरा, अभी दिमाग मत खा। दिन भर सड़क पर…।”

“सड़क पर क्या?” मीरा का संयम टूटने लगा। उसकी भौंहें सिकुड़ गईं, आँखें तेज़, होंठ काँपते हुए। “मैंने तुम्हें दो दिन पहले… चाय की दुकान के पास… इमरान के साथ देखा था। तुमने मुझे देखा भी नहीं। बस… पैसे पकड़ा रहे थे।”

राघव के चेहरे से रंग उतर गया। गिलास उसके हाथ में हल्का-सा काँप गया।
“तुम पीछा कर रही थी?”

मीरा ने पल भर को नजरें झुकाईं—जैसे शर्म और गुस्सा आपस में लड़ रहे हों। फिर वह सीधे खड़ी हो गई।
“मैं तुम्हारी पत्नी हूँ। घर का खर्च, दादी की दवा, किराया… मैं किस पर भरोसा करूँ? तुम बोलते क्यों नहीं?”

राघव ने गहरी साँस ली। उसकी आँखों में कुछ टूटा हुआ सा था।
“मुझे बहस नहीं करनी। खाना दे दो।”

मीरा के भीतर कुछ चटक गया—काँच की तरह। उसने थाली वहीं रख दी, आवाज़ भर्राई,
“खाना? तुम्हें खाना चाहिए, और मुझे… मुझे सच चाहिए, राघव। मैं झूठ के साथ नहीं जी सकती।”

उसी वक्त अंदर से दादी शांति की आवाज़ आई, कमजोर लेकिन साफ़—
“अरे… क्या हो रहा है? क्यों गला फाड़ रहे हो दोनों?”

मीरा की पलकों पर आँसू तैर आए। उसने जल्दी से पोंछ लिए, पर गालों पर नमी रह गई।
“दादी, कुछ नहीं… बस—”

दादी धीरे-धीरे चौखट तक आ गईं। उनकी झुकी कमर, सफेद बालों की पतली लट, और आँखों में वर्षों का अनुभव। उन्होंने राघव को देखा।
“बेटा, पैसा कम पड़ रहा है तो बताता क्यों नहीं?”

राघव ने चेहरे पर थकी हुई हँसी खींचने की कोशिश की, जो बन नहीं पाई।
“दादी… सब ठीक है।”

मीरा ने दबी आवाज़ में कहा,
“ठीक है? दादी की जाँच रुकी है। और तुम… किसी और को—”

“किसी और को?” राघव अचानक तमतमाया। उसकी आँखें भीगी थीं, पर गुस्से का खोल चढ़ा हुआ।
“मीरा, तुमने मुझे क्या समझा है?”

मीरा ने सिर हिलाया, जैसे खुद को रोक रही हो कि कोई कठोर शब्द न निकल जाए।
“मैंने… मैंने बस इतना देखा कि तुम घर से छुपा रहे हो। और छुपाने का मतलब…”

कमरे में चुप्पी भर गई। बाहर बारिश फिर तेज़ हो गई, टिन की छत पर बूंदें जैसे किसी की अधूरी बात को पीट रही थीं।

तभी दरवाज़े पर हल्की दस्तक हुई।

मीरा ने दरवाज़ा खोला तो इमरान खड़ा था—बीस-बाईस साल का, भीगा हुआ, आँखों में घबराहट। उसके हाथ में एक छोटा-सा लिफाफा था।
“भाभी… राघव भैया घर हैं?”

राघव ने इमरान को देखा और पल भर के लिए उसकी आँखों में डर चमका—जैसे कोई राज़ पकड़ा गया हो।
“क्या हुआ, इमरान?”

इमरान ने लिफाफा आगे किया। उसकी आवाज़ टूट रही थी।
“भैया… ये… ये कुछ पैसे हैं। मैं लौटाने आया हूँ। आज… अम्मी ने कहा, ‘जिसने वक्त पर मदद की, उसका हक पहले।’ मैं देर नहीं करना चाहता था।”

मीरा की उँगलियाँ लिफाफे पर ठिठक गईं। वह कुछ समझ नहीं पाई।
“लौटाने? किस बात के पैसे?”

इमरान ने आँखें नीचे कर लीं।
“मेरी बहन सना… उसकी किडनी की दिक्कत बढ़ गई थी। अस्पताल वाले एडवांस माँग रहे थे। भैया ने… बिना बताए मदद कर दी। उन्होंने कहा था किसी को मत बताना। बोले थे, ‘घर में बुज़ुर्ग हैं, बहू परेशान होगी।’”

मीरा के चेहरे का तनाव जैसे एक झटके में ढीला पड़ गया। उसकी आँखें बड़ी हो गईं, होंठ आधे खुले रह गए। दादी शांति ने चौखट पकड़कर लंबी साँस ली, जैसे किसी बोझ की गांठ खुल गई हो।

मीरा की नजर राघव पर गई। राघव का चेहरा अपराधबोध से भरा था—पलकें गीली, जबड़ा भींचा हुआ, जैसे वह खुद से नाराज़ हो।

मीरा की आवाज़ बहुत धीमी निकली, पर उसमें दर्द साफ़ था।
“तो… तुम छुपा रहे थे क्योंकि… मुझे परेशान नहीं करना चाहते थे?”

राघव ने सिर झुका लिया।
“मैंने सोचा दादी की दवा मैं किसी तरह संभाल लूँगा। तुम पहले ही नौकरी, घर, सब में… थक जाती हो। इमरान की बहन की हालत देखी नहीं गई। पर मुझे बोलना चाहिए था, मीरा। मैंने तुम्हें… अंधेरे में रखा।”

मीरा की आँखों से आँसू बह निकले—इस बार रोक नहीं पाई। वह रो नहीं रही थी सिर्फ शक के लिए; वह उस दूरी के लिए रो रही थी जो चुप्पी ने उनके बीच बना दी थी।

उसने धीरे से कहा,
“मैं तुम्हारी तकलीफ में साझेदार बनना चाहती हूँ, राघव। मैं बोझ नहीं… परिवार हूँ।”

दादी शांति आगे बढ़ीं। उनका हाथ काँपता हुआ, लेकिन स्नेह से भरा, राघव के सिर पर आकर रुका।
“बेटा, नेकी चुपके करो, ठीक है… पर अपना घर अँधेरा करके नहीं। घर की दीवारें भरोसे से खड़ी रहती हैं।”

इमरान बीच में ही बोल पड़ा, उसकी आँखें चमक रही थीं।
“भाभी, मैं वादा करता हूँ, अब किस्तों में पूरा लौटाऊँगा। सना ठीक हो रही है। डॉक्टर ने कहा… वक्त पर इलाज मिल गया, तो बच गई।”

मीरा ने इमरान की तरफ देखा। उसके चेहरे पर कृतज्ञता थी, और एक भारतीय मोहल्ले की असली सच्चाई—जहाँ रिश्ते खून से नहीं, वक्त पर साथ खड़े होने से बनते हैं।
उसने लिफाफा वापस इमरान की तरफ बढ़ाया।
“इमरान, पैसे बाद में लौटाना। पहले सना को ठीक रखना। और सुनो… कल से तुम हमारी चाय साथ में पीओगे। मदद छुपाकर नहीं, मिलकर होती है।”

राघव ने मीरा की तरफ देखा। उसकी आँखों में राहत और पछतावा एक साथ था।
“तुम… नाराज़ नहीं हो?”

मीरा ने आहिस्ता से राघव का हाथ पकड़ा। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं, जैसे बाहर की बारिश भीतर तक आ गई हो।
“नाराज़ हूँ… क्योंकि तुमने मुझे अपना समझकर भी अपना नहीं बनाया। पर… आज से हम बोलेंगे, राघव। चाहे डर लगे, चाहे शर्म आए—हम बोलेंगे।”

राघव की आँखों से एक आँसू गिरा। वह जल्दी से पोंछने लगा, जैसे मर्दानगी की कोई परीक्षा हो। दादी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,
“रो लेने से आदमी छोटा नहीं होता, बेटा। रोके रखने से दिल छोटा हो जाता है।”

उस रात मीरा ने दाल में थोड़ा घी ज्यादा डाला—जैसे रिश्ते में थोड़ा भरोसा। राघव ने दादी की दवा की पर्ची निकाली और पहली बार बिना झिझक कहा,
“कल सुबह मैं छुट्टी ले रहा हूँ। जाँच करवाएँगे। पैसे… हम मिलकर देख लेंगे।”

बाहर बारिश धीमी हो चुकी थी। गली के कुत्ते भी चुप थे। बस घर के भीतर, एक टूटता हुआ रिश्ता फिर से जुड़ रहा था—शब्दों, आंसुओं और सच के धागे से।

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