VIP तमाशा: एक आम आदमी के सम्मान की लड़ाई

 

VIP तमाशा: एक आम आदमी के सम्मान की लड़ाई
vip culture

भारत में, कुछ लोग कानून से बड़े होते हैं, कुछ लोग इंसानियत से। उन्हें 'वीआईपी' कहा जाता है। और जब ये 'वीआईपी' सड़क पर निकलते हैं, तो ज़िंदगी थम जाती है, एम्बुलेंस रुक जाती हैं, और इंसानियत शर्मसार हो जाती है। यह कहानी है ऐसे ही एक VIP तमाशे की, और उस एक आम आदमी, हरीश, की, जिसने उस तमाशे के खिलाफ़ आवाज़ उठाने की हिम्मत की।

यह कहानी है हरीश की, उसकी बीमार माँ, शारदा जी, की और एक अहंकारी नेता, श्री विक्रम सिंह, की।

हरीश, दिल्ली की भीड़-भाड़ भरी ज़िंदगी में संघर्ष करता एक साधारण क्लर्क था। उसकी दुनिया छोटी थी - उसका ऑफिस, उसका छोटा सा घर और उसकी बीमार माँ, जिनकी वह दिन-रात सेवा करता था।

एक उमस भरी दोपहर, हरीश की माँ की तबीयत अचानक बहुत बिगड़ गई। उन्हें साँस लेने में तकलीफ हो रही थी। डॉक्टर ने उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाने को कहा।

हरीश ने एक ऑटो लिया और अस्पताल की ओर भागा। हर पल, हर सेकेंड कीमती था। उसकी माँ की साँसें उखड़ रही थीं, और हरीश का दिल बैठा जा रहा था।

यह एक आम भारतीय बेटे का संघर्ष था, जो सिस्टम और समय, दोनों से लड़ रहा था।

जैसे ही वे शहर के मुख्य चौराहे पर पहुँचे, ट्रैफिक पुलिस ने सारे रास्ते बंद कर दिए।

"क्या हुआ, साहब?" हरीश ने घबराकर एक पुलिसवाले से पूछा। "मुझे अस्पताल जाना है, मेरी माँ की हालत बहुत गंभीर है!"

"चुपचाप किनारे खड़े रहो!" पुलिसवाले ने रूखेपन से जवाब दिया। "मंत्रीजी का काफिला निकलने वाला है। VIP मूवमेंट है।"

"VIP तमाशा" शुरू हो चुका था।

सड़क के दोनों ओर गाड़ियों की लंबी कतारें लग गईं। लोग हॉर्न बजा रहे थे, झुंझला रहे थे, पर कोई कुछ कर नहीं सकता था।

हरीश ने अपनी माँ की ओर देखा। उनका चेहरा पीला पड़ चुका था और उनकी आँखें बंद हो रही थीं।

"माँ, आँखें खोलो, माँ!" वह गिड़गिड़ाया। "बस थोड़ा सा और... हम पहुँचने ही वाले हैं।"

दस मिनट... पंद्रह मिनट... बीस मिनट बीत गए। हर गुज़रता पल हरीश के सब्र और उसकी माँ की ज़िंदगी, दोनों को कम कर रहा था।

आखिरकार, सायरन बजाती हुई गाड़ियों का एक लंबा काफिला वहाँ से गुज़रा। एक गाड़ी में, सफेद कुर्ता पहने, मंत्री विक्रम सिंह बैठे थे, जो अपने फोन पर व्यस्त थे। उन्हें शायद पता भी नहीं था कि उनकी 'सुरक्षा' के नाम पर, सड़क पर एक ज़िंदगी मौत से लड़ रही है।

जैसे ही काफिला गुज़रा, ट्रैफिक खुला। हरीश ने ऑटो वाले को चिल्लाकर कहा, "जल्दी चलो, भाई!"

पर शायद बहुत देर हो चुकी थी।

जब वे अस्पताल पहुँ-चे, तो डॉक्टरों ने बहुत कोशिश की, पर वे शारदा जी को नहीं बचा पाए।

"अगर आप दस-पंद्रह मिनट पहले आ जाते, तो शायद हम कुछ कर पाते," डॉक्टर ने अफसोस जताते हुए कहा।

वह एक वाक्य नहीं, हरीश की दुनिया पर गिरा एक बम था। वह वहीं, अस्पताल के ठंडे फर्श पर, घुटनों के बल गिर पड़ा। उसकी माँ चली गई थीं... सिर्फ इसलिए क्योंकि किसी 'वीआईपी' को रास्ता चाहिए था।

यह एक बेटे की सबसे बड़ी हार थी।

उस रात, घर में एक गहरा सन्नाटा था। हरीश अपनी माँ की तस्वीर के सामने चुपचाप बैठा था। उसकी आँखों में आँसू नहीं, एक भयानक आग थी।

अगले दिन, हरीश ने एक फैसला किया।

वह चुप नहीं बैठेगा।

उसने अपनी माँ की तस्वीर और डॉक्टर की रिपोर्ट ली, और सीधा उस चौराहे पर पहुँच गया, जहाँ ट्रैफिक रोका गया था। वह सड़क के बीचोबीच, एक प्लेकार्ड लेकर बैठ गया, जिस पर लिखा था - "मेरा VIP कौन? मेरी माँ या आपका मंत्री?"

शुरू में, किसी ने उस पर ध्यान नहीं दिया। पर धीरे-धीरे, भीड़ जमा होने लगी। कुछ लोगों ने उसकी तस्वीरें खींचीं, वीडियो बनाए और सोशल मीडिया पर डाल दिए।

#JusticeForMaa, #EndOfVIPCulture जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे।

यह अब सिर्फ हरीश की लड़ाई नहीं रही, यह हर उस आम आदमी की लड़ाई बन गई, जो रोज़ इस VIP तमाशे का शिकार होता है।

कहानी में मोड़ तब आया, जब यह खबर मंत्री विक्रम सिंह तक पहुँची। उनके सलाहकारों ने उन्हें इसे नज़रअंदाज़ करने को कहा।

"यह दो दिन का ड्रामा है, सर। लोग भूल जाएँगे।"

पर विक्रम सिंह की एक युवा बेटी थी, मानसी। उसने जब यह खबर देखी, तो उसने अपने पिता से सवाल किया।

"पापा, क्या यह सच है?" उसने पूछा। "क्या हमारी वजह से किसी की माँ मर गई?"

उस एक सवाल ने विक्रम सिंह को अंदर तक झकझोर दिया। उन्हें पहली बार अपने 'वीआईपी' होने के कवच के पार की दुनिया दिखाई दी।

अगले दिन, विक्रम सिंह ने कुछ ऐसा किया, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।

वह बिना किसी सुरक्षा, बिना किसी काफिले के, अकेले उस चौराहे पर पहुँ-चे, जहाँ हरीश अभी भी बैठा था।

वह हरीश के सामने गए और हाथ जोड़कर खड़े हो गए।

"मुझे माफ कर दो, बेटे," उनकी nghẹn ngat आवाज़ में कहा। "मैं तुम्हारा गुनहगार हूँ। मैं सत्ता के नशे में इतना अंधा हो गया था कि यह भूल ही गया कि इस कुर्सी का असली मतलब सेवा करना है, लोगों की ज़िंदगी को मुश्किल बनाना नहीं।"

यह एक राजनेता का आत्म-बोध था।

यह कहानी हमें सिखाती है कि कोई भी व्यक्ति कानून या इंसानियत से बड़ा नहीं होता। VIP तमाशा हमारे समाज का एक ऐसा कोढ़ है, जिसे हम सब मिलकर ही खत्म कर सकते हैं।

हरीश ने अपनी माँ को तो खो दिया, पर उसकी एक छोटी सी हिम्मत ने पूरे देश की आत्मा को जगा दिया। उसने यह साबित कर दिया कि जब एक आम आदमी अपने सम्मान के लिए खड़ा होता है, तो सबसे बड़ी सत्ता को भी झुकना पड़ता है।

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