बेटी का विवाह: एक पिता के दिल की अनकही विदाई
बेटी का विवाह - यह सिर्फ़ एक समारोह नहीं होता; यह एक पिता के जीवन भर की कमाई, उसकी भावनाओं और उसके आँगन की रौनक की एक खामोश विदाई होती है। यह कहानी है ऐसे ही एक पिता, श्री रमाकांत, की, और उनकी लाडली बेटी, मीरा, के विवाह की। यह कहानी है उस खुशी की, जिसके पीछे एक मीठा सा दर्द छिपा होता है।
रमाकांत जी, लखनऊ के एक मध्यमवर्गीय मोहल्ले में रहने वाले एक साधारण सरकारी कर्मचारी थे। उनकी दुनिया उनकी दो बेटियों, मीरा और छोटी बेटी रिया, के इर्द-गिर्द घूमती थी। मीरा, जो अब चौबीस साल की थी, उनकी सिर्फ बेटी नहीं, बल्कि उनकी सबसे अच्छी दोस्त भी थी। वह शांत, समझदार और अपने पिता के हर अनकहे एहसास को पढ़ लेने वाली थी।
यह एक आम भारतीय पिता और बेटी के बीच के गहरे, पर खामोश रिश्ते की कहानी थी।
जब मीरा के लिए एक अच्छा रिश्ता आया, तो रमाकांत जी की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। लड़का, अमित, एक होनहार इंजीनियर था और उसका परिवार बहुत संस्कारी था। शादी तय हो गई, और घर में शहनाइयाँ बजने की तैयारियाँ शुरू हो गईं।
पर जैसे-जैसे बेटी का विवाह का दिन नज़दीक आ रहा था, रमाकांत जी के दिल में एक अजीब सी बेचैनी घर करने लगी। वह बाहर से तो खुश दिखते, तैयारियों में लगे रहते, पर रात में अकेले में उनकी आँखें भर आतीं। जिस बेटी को उन्होंने अपनी उंगली पकड़कर चलना सिखाया था, वह अब हमेशा के लिए किसी और की होने जा रही थी। यह एहसास उन्हें अंदर ही अंदर खोखला कर रहा था।
इस कहानी की एक और महत्वपूर्ण पात्र हैं, रमाकांत जी की पत्नी, सावित्री। वह अपने पति की इस खामोशी को, इस अंदरूनी संघर्ष को समझ रही थीं।
"आप इतना क्यों सोचते हैं?" वह अक्सर रात में कहतीं। "यह तो खुशी का मौका है। मीरा एक अच्छे घर जा रही है।"
"जानता हूँ, सावित्री," रमाकांत जी एक ठंडी साँस भरकर कहते। "पर यह आँगन... यह घर... इसके बिना सूना हो जाएगा।"
यह एक पिता का वह डर था, जिसे वह किसी से कह नहीं पा रहा था।
शादी के दिन, घर मेहमानों और खुशियों से भरा हुआ था। हर तरफ़ हँसी-ठिठोली और संगीत का शोर था। पर रमाकांत जी का मन कहीं और ही था। वह चुपचाप अपनी बेटी को दुल्हन के लाल जोड़े में सजे हुए देख रहे थे। उनकी आँखों के सामने मीरा के बचपन की तस्वीरें एक फिल्म की तरह चल रही थीं - उसका पहला कदम, उसका पहला शब्द, उसका स्कूल का पहला दिन।
कहानी में सबसे मार्मिक मोड़ 'कन्यादान' के समय आया।
जब पंडित जी ने रमाकांत जी को 'कन्यादान' के लिए बुलाया, तो उनके पैर जैसे ज़मीन में धंस गए। उन्होंने कांपते हाथों से अपनी बेटी का हाथ पकड़ा। वह हाथ, जो कल तक उनका था, आज वह उसे किसी और को सौंपने जा रहे थे।
जैसे ही उन्होंने मीरा का हाथ अमित के हाथ में रखा, उनके सब्र का बाँध टूट गया। वह, जो हमेशा मजबूत दिखते थे, आज सबके सामने बच्चों की तरह रो पड़े।
यह एक पिता का अपनी बेटी के प्रति प्रेम का चरम था, जो आज आँसुओं के रूप में बह रहा था।
मीरा ने अपने पिता को इस तरह टूटते हुए पहली बार देखा था। उसने अपना दूसरा हाथ धीरे से अपने पिता के हाथ पर रखा। "पापा..." उसकी आवाज़ भी nghẹn ngat हो रही थी।
उस एक स्पर्श में, मीरा ने अपने पिता को वह सारी हिम्मत दे दी, जिसकी उन्हें उस वक्त ज़रूरत थी।
विदाई का समय आया।
मीरा अपनी माँ से गले लगकर बहुत रोई। पर जब वह अपने पिता के सामने आई, तो दोनों एक-दूसरे को बस देखते रह गए। दोनों की आँखों में आँसू थे, पर कोई कुछ बोल नहीं पा रहा था।
तभी, रमाकांत जी ने एक छोटा सा, पुराना टिफिन बॉक्स मीरा के हाथ में थमाया।
"यह क्या है, पापा?"
"इसमें... इसमें तुम्हारे लिए इमली के लड्डू हैं," उन्होंने एक भारी आवाज़ में कहा। "बचपन में तुम्हें बहुत पसंद थे न। जब भी हमारी याद आए, तो खा लेना।"
यह एक पिता का निःस्वार्थ त्याग था, जो अपनी बेटी को विदा तो कर रहा था, पर अपने प्यार का एक छोटा सा हिस्सा उसके साथ भेज रहा था, ताकि वह कभी खुद को अकेला न समझे।
मीरा अपने पिता से लिपट गई। "मैं आपको कभी नहीं भूलूँगी, पापा।"
जब डोली उठी, और वह अपने घर से हमेशा के लिए विदा हो गई, तो रमाकांत जी वहीं दरवाज़े पर जड़ होकर खड़े रहे, जब तक कि डोली आँखों से ओझल नहीं हो गई।
यह कहानी हमें सिखाती है कि बेटी का विवाह सिर्फ़ रस्मों और रिवाजों का नाम नहीं है। यह भावनाओं का एक ऐसा समंदर है, जिसमें खुशी की लहरें भी हैं और विदाई का दर्द भी। यह एक पिता के सबसे बड़े त्याग और उसके सबसे गहरे प्यार की कहानी है।
उस दिन, रमाकांत जी ने अपनी बेटी को विदा नहीं किया था, उन्होंने अपने दिल का एक टुकड़ा विदा किया था। पर साथ ही, उन्होंने एक बेटे के रूप में एक नया सहारा भी पाया था, और यही एक पिता के जीवन की सबसे बड़ी पूंजी होती है।
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