भारत का दोस्त रूस: दो पीढ़ियों की अटूट मैत्री

 

भारत का दोस्त रूस: दो पीढ़ियों की अटूट मैत्री
bharat ka dost russia

कुछ रिश्ते सरहदों और सियासतों से परे होते हैं। वे समय और भरोसे की नींव पर टिके होते हैं। ऐसी ही एक गहरी और समय की कसौटी पर खरी उतरी दोस्ती है भारत और रूस की। यह कहानी सिर्फ दो देशों की नहीं, बल्कि दो परिवारों की है, जिनकी ज़िंदगी इस दोस्ती के धागों से बुनी हुई थी।

यह कहानी है कर्नल बलवंत सिंह की, उनके बेटे, मेजर समीर, की और एक रूसी इंजीनियर, एलेक्सी, की।

कर्नल बलवंत सिंह, 1971 के युद्ध के एक नायक थे। वह उस पीढ़ी के थे, जिसने भारत का दोस्त रूस की मैत्री को अपनी आँखों से देखा और महसूस किया था। उनके लिए रूस सिर्फ एक देश नहीं, बल्कि एक ऐसा भाई था जो हर मुश्किल घड़ी में भारत के साथ खड़ा रहा।

"तुम बच्चे नहीं समझोगे," वह अक्सर अपने बेटे, समीर, से कहते। "जब पूरी दुनिया हमारे खिलाफ थी, तब रूस ही था जिसने हमारी ढाल बनकर हमारी रक्षा की थी।"

समीर, जो भारतीय सेना में एक युवा मेजर था, अपने पिता का बहुत सम्मान करता था। पर वह आज की पीढ़ी का था, जो दुनिया को कूटनीति और राष्ट्रीय हितों के नज़रिए से देखता था। उसे लगता था कि अब ज़माना बदल गया है और अंतरराष्ट्रीय रिश्तों में कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता।

यह दो पीढ़ियों के बीच का एक वैचारिक मतभेद था।

कहानी में मोड़ तब आया, जब समीर को एक संयुक्त सैन्य अभ्यास (joint military exercise) के लिए एक महीने के लिए रूस जाने का मौका मिला।

रूस पहुँचकर, उसकी मुलाकात हुई एलेक्सी से। एलेक्सी एक अनुभवी रूसी सैन्य इंजीनियर था, जिसके पिता भी सोवियत सेना में थे।

शुरू-शुरू में, समीर और एलेक्सी के बीच एक पेशेवर दूरी थी। पर धीरे-धीरे, जब वे साथ में काम करने लगे, तो उन्होंने महसूस किया कि उन दोनों में बहुत कुछ समान है - देश के लिए जुनून, अनुशासन और अपने परिवार के लिए गहरा प्यार।

एक शाम, जब अभ्यास खत्म हो गया था, तो एलेक्सी ने समीर को अपने घर खाने पर बुलाया।

एलेक्सी का घर छोटा और साधारण था, पर उसमें एक अजीब सा अपनापन था। वहाँ समीर की मुलाकात एलेक्सी की बूढ़ी माँ, येलेना, से हुई।

"नमस्ते," समीर ने हाथ जोड़कर कहा।

येलेना ने उसे गौर से देखा और मुस्कुराईं। "नमस्ते, बेटे। तुम बिल्कुल अपने पिता पर गए हो।"

समीर हैरान रह गया। "आप... आप मेरे पिता को जानती हैं?"

येलेना अंदर गईं और एक पुरानी, काले-सफ़ेद रंग की तस्वीर लेकर आईं। तस्वीर में, एक युवा बलवंत सिंह एक युवा रूसी सैनिक के साथ खड़े मुस्कुरा रहे थे। वह सैनिक एलेक्सी के पिता थे।

"तुम्हारे पिता और मेरे पति, दिमित्री, 1971 के युद्ध के दौरान एक साथ थे," येलेना ने एक nghẹn ngat आवाज़ में कहा। "दिमित्री हमेशा कहते थे कि बलवंत सिर्फ एक साथी नहीं, उनका भाई है।"

उन्होंने बताया कि कैसे एक लड़ाई के दौरान, दिमित्री बुरी तरह से घायल हो गए थे और बलवंत सिंह ने अपनी जान पर खेलकर उन्हें बचाया था। यह एक भारतीय सैनिक का अपने रूसी साथी के लिए निःस्वार्थ त्याग था।

यह सुनकर समीर स्तब्ध रह गया। उसके पिता ने उसे अपनी बहादुरी के किस्से तो सुनाए थे, पर यह कहानी कभी नहीं बताई।

उस रात, एलेक्सी ने अपने पिता की पुरानी डायरी निकाली। उसमें दिमित्री ने लिखा था -
"आज बलवंत ने मेरी जान बचाई। उसने कहा, 'हम दोस्त हैं, और 

यह समीर का आत्म-बोध था। उसे आज पहली बार समझ आया कि उसके पिता के लिए रूस सिर्फ एक सहयोगी देश क्यों नहीं है। यह दोस्ती सिर्फ हथियारों और संधियों की नहीं, बल्कि खून, पसीने और बलिदान की नींव पर बनी है।

जब समीर भारत लौटा, तो वह एक बदला हुआ इंसान था।

उसने अपने पिता, कर्नल बलवंत सिंह, को वह तस्वीर दिखाई।

बलवंत सिंह की बूढ़ी आँखों में आँसू भर आए। "दिमित्री... मेरा भाई।"

"पापा," समीर ने अपने पिता का हाथ पकड़कर कहा, "मुझे माफ कर दीजिए। मैं कभी समझ ही नहीं पाया कि यह दोस्ती कितनी गहरी है।"

यह कहानी हमें सिखाती है कि अंतरराष्ट्रीय रिश्ते सिर्फ नक्शों पर खींची गई लकीरें नहीं होते। वे मानवीय भावनाओं, साझा इतिहास और पीढ़ियों की यादों से बनते हैं। भारत का दोस्त रूस की यह कहानी हमें याद दिलाती है कि सच्चा दोस्त वही है जो हर अच्छे-बुरे वक्त में आपके साथ खड़ा रहे।

उस दिन, दो पीढ़ियों का मतभेद खत्म हो गया। समीर ने सीखा कि कुछ रिश्ते इतने गहरे होते हैं कि उन्हें सिर्फ कूटनीति के तराजू पर नहीं तौला जा सकता। वे तो विश्वास और सम्मान की अनमोल विरासत होते हैं।

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