पारिवारिक धरोहर: एक पुरानी घड़ी की अनमोल विरासत
'धरोहर' - यह शब्द सुनते ही हमारे मन में अक्सर पुरानी हवेलियों, सोने-चाँदी के गहनों या ज़मीन-जायदाद का ख्याल आता है। पर सच्ची पारिवारिक धरोहर वह होती है, जिसे पैसों से नहीं तौला जा सकता। यह कहानी है ऐसी ही एक धरोहर की - एक पुरानी, हाथ से बनी घड़ी की, जिसने एक परिवार की तीन पीढ़ियों को समय का सबसे बड़ा सबक सिखाया।
यह कहानी है सेवानिवृत्त पोस्टमास्टर, श्री दीनानाथ, उनके बेटे, सुबोध, और उनके पोते, आरव, की।
दीनानाथ जी के पास उनके पिता की दी हुई एक पुरानी, जेब में रखने वाली घड़ी थी। वह घड़ी अब चलती नहीं थी, पर दीनानाथ जी के लिए वह सिर्फ एक घड़ी नहीं, बल्कि उनके पिता के सिद्धांतों और उनके समय की पाबंदी का प्रतीक थी। वह उसे रोज़ साफ करते और अपने कुर्ते की जेब में रखते।
यह एक पिता और पुत्र के बीच के खामोश रिश्ते की निशानी थी।
उनका बेटा, सुबोध, एक सफल बिजनेसमैन था। उसकी दुनिया तेज रफ्तार से चलती थी। उसके लिए, समय का मतलब था पैसा। उसे अपने पिता की इस 'पुरानी, बेकार' घड़ी से कोई लगाव नहीं था।
"पापा, आप आज भी इस कबाड़ को लेकर क्यों घूमते हैं?" वह अक्सर कहता। "मैं आपके लिए एक नई, स्विस घड़ी ले आता हूँ।"
दीनानाथ जी बस मुस्कुरा देते। "बेटा, यह घड़ी समय नहीं, संस्कार बताती है।"
यह दो पीढ़ियों के बीच की सोच का टकराव था।
आरव, सुबोध का बेटा और दीनानाथ जी का पोता, एक आधुनिक और महत्वाकांक्षी लड़का था। वह अमेरिका में पढ़ना चाहता था। उसे भी अपने दादाजी की बातें पुरानी और अव्यावहारिक लगती थीं, पर वह अपने दादाजी से बहुत प्यार करता था।
कहानी में मोड़ तब आया, जब आरव को अमेरिका की एक बड़ी यूनिवर्सिटी में दाखिला मिल गया। पर उसकी स्कॉलरशिप पूरी फीस को कवर नहीं कर रही थी। बाकी के पैसों का इंतज़ाम करना एक बड़ी चुनौती थी।
सुबोध ने अपने बिजनेस में हुए एक नुकसान के कारण हाथ खड़े कर दिए। "इस साल मुश्किल है, बेटा। तुम्हें अगले साल तक इंतज़ार करना होगा।"
यह सुनकर आरव का दिल टूट गया। उसे लगा जैसे उसका सबसे बड़ा सपना टूटकर बिखर गया हो।
उस रात, जब आरव अपने कमरे में निराश बैठा था, तो उसके दादाजी, दीनानाथ जी, उसके पास आए।
उन्होंने वह पुरानी, जेब वाली घड़ी आरव के हाथ में रख दी।
"दादाजी, मुझे यह नहीं चाहिए," आरव ने उदासी से कहा।
"इसे खोलो," दीनानाथ जी ने शांत स्वर में कहा।
आरव ने जब उस घड़ी का पिछला ढक्कन खोला, तो वह हैरान रह गया। अंदर, घड़ी के पुर्जों के साथ, छोटे-छोटे, कीमती हीरे जड़े हुए थे, जो चाँदनी में चमक रहे थे।
"यह... यह क्या है, दादाजी?"
"यह हमारी पारिवारिक धरोहर है, बेटा," दीनानाथ जी ने बताया। "यह घड़ी मेरे परदादा ने बनवाई थी। उन्होंने इसमें ये हीरे इसलिए जड़वाए थे, ताकि परिवार पर जब भी कोई सबसे बड़ी मुसीबत आए, तो यह काम आ सके। पर एक शर्त के साथ - कि इसे सिर्फ किसी के सपनों को पूरा करने के लिए ही इस्तेमाल किया जाएगा, किसी लालच के लिए नहीं।"
यह एक पुरखे का अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए किया गया त्याग था।
"मेरे पिता ने इसे मेरे लिए सँभालकर रखा, और मैंने इसे तुम्हारे पिता के लिए। पर उसे कभी इसकी ज़रूरत नहीं पड़ी। आज, यह तुम्हारी अमानत है।"
आरव की आँखों में आँसू थे। जिस घड़ी को वह 'कबाड़' समझता था, वह तो उसके परिवार का सबसे बड़ा खजाना निकली।
"पर दादाजी, यह तो आपकी..."
"मेरी सबसे बड़ी दौलत तुम हो, बेटा," दीनानाथ जी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा। "जाओ, और अपने सपनों को एक नई उड़ान दो।"
जब यह बात सुबोध को पता चली, तो उसे अपनी गलती का गहरा एहसास हुआ। यह एक बेटे का आत्म-बोध था। उसे शर्मिंदगी महसूस हुई कि जिस पिता को वह पुराना और अव्यावहारिक समझता रहा, उन्होंने ही परिवार के भविष्य को सबसे ज़्यादा सुरक्षित रखा था।
उसने अपने पिता के पैर पकड़ लिए। "मुझे माफ कर दीजिए, बाबूजी। मैं ही अंधा था। मैं पैसे के पीछे भागता रहा, और आप असली दौलत सँभाले बैठे थे।"
यह कहानी हमें सिखाती है कि सच्ची पारिवारिक धरोहर भौतिक वस्तुएँ नहीं, बल्कि वे मूल्य, वे संस्कार और वह निःस्वार्थ प्रेम है जो एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को सौंपती है।
वह पुरानी घड़ी सिर्फ समय नहीं बताती थी; वह त्याग, दूरदर्शिता और परिवार के प्रति निःस्वार्थ प्रेम की कहानी कहती थी। दीनानाथ जी ने अपने पोते को सिर्फ पैसे नहीं, बल्कि अपनी विरासत का सबसे बड़ा सबक दिया - कि परिवार का भविष्य सिर्फ पैसों से नहीं, बल्कि एक-दूसरे के सपनों का सम्मान करने और उन्हें पूरा करने में मदद करने से बनता है।
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