डूबती नैया: एक परिवार के भरोसे की कहानी
ज़िंदगी एक नदी की तरह है, और परिवार उस नाव की तरह, जो हमें लहरों के थपेड़ों से बचाकर किनारे तक ले जाती है। पर क्या हो, जब गलतफहमियों और अहंकार के तूफ़ान में, वह नाव ही डूबने लगे? यह कहानी है ऐसी ही एक डूबती नैया की, और उस एक एहसास की, जिसने एक परिवार को पूरी तरह बिखरने से बचा लिया।
यह कहानी है दो भाइयों, केशव और माधव, की।
वाराणसी के घाटों के पास, जहाँ पीढ़ियों से मल्लाहों का बसेरा था, वहीं केशव और माधव का घर था। उनके पिता, गाँव के सबसे सम्मानित मल्लाह थे, जिनकी मृत्यु के बाद, उन्होंने अपनी नाव, 'पार्वती', विरासत में छोड़ी थी।
केशव, बड़ा भाई, बिल्कुल अपने पिता की तरह था - शांत, अनुभवी और अपनी नाव को अपनी जान से ज़्यादा प्यार करने वाला। माधव, छोटा भाई, थोड़ा महत्वाकांक्षी और शहर की चकाचौंध से प्रभावित था। उसे लगता था कि नाव चलाने में कोई भविष्य नहीं है।
यह दो भाइयों के बीच की सोच का टकराव था।
"भैया," माधव अक्सर कहता, "कब तक हम यह पुरानी नाव चलाते रहेंगे? इसे बेचकर शहर में कोई बिजनेस करते हैं।"
"माधव," केशव शांति से जवाब देता, "यह सिर्फ एक नाव नहीं है, यह हमारे बाबूजी का आशीर्वाद है। इसने हमें पाला है, हम इसे कैसे छोड़ दें?"
इस कहानी की एक और महत्वपूर्ण पात्र है, केशव की पत्नी, गौरी। गौरी एक समझदार महिला थी, जो दोनों भाइयों के बीच के इस तनाव को महसूस करती थी और हमेशा उन्हें जोड़े रखने की कोशिश करती थी।
गलतफहमियों का तूफ़ान तब और गहरा हो गया, जब गाँव में एक अमीर व्यापारी, सेठ धर्मपाल, ने नदी में बड़ी, मोटर वाली नावें चलानी शुरू कर दीं। अब लोग केशव की पुरानी, हाथ से चलने वाली नाव में बैठना पसंद नहीं करते थे। उनकी आमदनी लगभग खत्म हो गई।
घर में फाके पड़ने लगे।
"देखा, भैया!" माधव ने एक दिन गुस्से में कहा। "मैंने आपसे कहा था! आपकी ज़िद की वजह से आज हम भूखे मर रहे हैं। यह डूबती नैया अब और नहीं चलेगी!"
उस दिन, दोनों भाइयों में इतनी बहस हुई कि माधव ने घर छोड़ने का फैसला कर लिया। "मैं जा रहा हूँ। मैं अपनी ज़िंदगी इस सड़ी हुई लकड़ी के साथ बर्बाद नहीं कर सकता।"
केशव टूट गया। एक तरफ उसके पिता की विरासत थी, और दूसरी तरफ उसका भाई, जो उसे छोड़कर जा रहा था।
कहानी में मोड़ तब आया, जब उस साल, देव दीपावली के दिन, गंगा में एक भयानक तूफ़ान आ गया।
शाम को, जब हज़ारों दीयों से घाट जगमगा रहे थे, और लोग नावों में बैठकर उत्सव मना रहे थे, तभी अचानक मौसम बदल गया। तेज़ हवाएँ चलने लगीं और नदी में ऊँची-ऊँची लहरें उठने लगीं।
सेठ धर्मपाल की बड़ी-बड़ी मोटरबोटें तूफ़ान में डगमगाने लगीं। एक मोटरबोट, जिसमें कई परिवार सवार थे, एक चट्टान से टकरा गई और डूबने लगी। लोग चीखने-चिल्लाने लगे।
माधव, जो शहर जाने के लिए घाट पर ही खड़ा था, ने यह सब देखा। वह तैरना जानता था, पर इतने बड़े तूफ़ान में अकेले कुछ नहीं कर सकता था।
तभी, उसने देखा कि अँधेरे और लहरों को चीरती हुई, एक छोटी सी नाव उस डूबती हुई मोटरबोट की ओर बढ़ रही है। वह 'पार्वती' थी, और उसे चला रहा था उसका भाई, केशव।
केशव के चेहरे पर डर नहीं, एक अटूट संकल्प था। वह जानता था कि उसकी छोटी सी नाव इस तूफ़ान के सामने कुछ भी नहीं है, पर वह लोगों को मरता हुआ नहीं देख सकता था। यह एक इंसान का इंसानियत के लिए सबसे बड़ा त्याग था।
माधव एक पल के लिए जड़ हो गया। जिस नाव को वह 'सड़ी हुई लकड़ी' कह रहा था, आज वही नाव दर्जनों लोगों की ज़िंदगी बचाने जा रही थी। यह एक भाई का आत्म-बोध था।
वह बिना एक पल सोचे, नदी में कूद गया और अपने भाई की नाव की ओर तैरने लगा।
"भैया, मैं आ गया!" वह नाव पर चढ़ते हुए चिल्लाया।
केशव ने अपने भाई को देखा, और उसकी आँखों में एक नई हिम्मत आ गई।
उस रात, दोनों भाइयों ने मिलकर अपनी जान पर खेलकर, उस नाव से कई चक्कर लगाए और लगभग सभी लोगों को सुरक्षित किनारे तक पहुँचाया। उन्होंने यह साबित कर दिया कि अनुभव और हिम्मत के सामने, बड़ी-बड़ी मशीनें भी हार जाती हैं।
जब सुबह हुई, और तूफ़ान शांत हुआ, तो पूरा गाँव घाट पर इकट्ठा था। सेठ धर्मपाल ने शर्म से अपना सिर झुका लिया था।
माधव अपने भाई, केशव, के पास गया और उसके पैरों में गिर पड़ा।
"मुझे माफ कर दो, भैया," उसने रोते हुए कहा। "मैं ही गलत था। हमारी नाव डूबती नैया नहीं, यह तो बचाने वाली नैया है। यह हमारे बाबूजी का आशीर्वाद है।"
केशव ने अपने भाई को उठाकर गले से लगा लिया। "नाव नहीं डूब रही थी, माधव। हमारा भरोसा डूब रहा था।"
यह कहानी हमें सिखाती है कि परिवार भी एक नाव की तरह ही होता है। जब गलतफहमी और अहंकार का तूफ़ान आता है, तो वह डूबने लगती है। पर अगर परिवार के सदस्य एक-दूसरे का हाथ थाम लें, और निःस्वार्थ प्रेम की पतवार से उसे चलाएँ, तो वह हर तूफ़ान को पार कर सकती है।
उस दिन, दो भाइयों ने सिर्फ लोगों की जान नहीं बचाई थी, उन्होंने अपने परिवार की डूबती नैया को भी बचाया था।
0 टिप्पणियाँ