गाँव में भागवत कथा: मन के मैल धोने की एक सप्ताह की यात्रा
हर साल, फसल कटने के बाद, चंदनपुर गाँव में सात दिनों के लिए भागवत कथा का आयोजन होता था। यह सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं था; यह पूरे गाँव के लिए एक उत्सव था। यह समय था जब गाँव की ज़िंदगी थम जाती थी, और हर कोई कथा के रस में डूब जाता था।
यह कहानी है उसी एक गाँव में भागवत कथा की, और उस एक परिवार की, जिसके लिए यह कथा सिर्फ कानों से सुनने के लिए नहीं, बल्कि जीवन में उतारने का एक माध्यम बन गई।
यह कहानी है दो भाइयों, शंकर और मोहन, की।
शंकर, बड़ा भाई, एक शांत और मेहनती किसान था। पर कुछ साल पहले, ज़मीन के एक छोटे से टुकड़े को लेकर अपने छोटे भाई, मोहन, से हुई लड़ाई ने उसके मन में एक गहरी कड़वाहट भर दी थी। दोनों भाइयों के खेत अगल-बगल थे, पर उनके दिलों के बीच एक मोटी दीवार खिंच गई थी। वे एक-दूसरे को देखकर मुँह फेर लेते थे।
मोहन, छोटा भाई, थोड़ा गुस्सैल और ज़िद्दी था। उसे लगता था कि उसके बड़े भाई ने उसके साथ अन्याय किया है। यह एक आम पारिवारिक गलतफहमी थी, जिसने दो सगे भाइयों को दुश्मन बना दिया था।
इस कहानी की एक और महत्वपूर्ण पात्र है, शंकर की पत्नी, राधिका। राधिका एक समझदार और धार्मिक महिला थी। वह हर रोज़ अपने पति और देवर के बीच की इस खाई को देखती और चुपचाप रोती थी।
इस साल, जब गाँव में भागवत कथा का आयोजन हुआ, तो कथावाचक के रूप में एक बहुत ही ज्ञानी और शांत संत, स्वामी प्रेमानंद जी, आए।
पूरा गाँव कथा सुनने के लिए उमड़ पड़ा, सिवाय शंकर और मोहन के। दोनों अपने-अपने अहंकार में इतने अंधे थे कि वे एक ही पंडाल के नीचे बैठने को भी तैयार नहीं थे।
राधिका ने अपने पति, शंकर, से बहुत विनती की। "चलिए न! स्वामी जी बहुत ज्ञानी हैं। मन को शांति मिलेगी।"
"शांति?" शंकर ने कड़वाहट से कहा। "जिस घर में ही शांति न हो, उसे कथा में शांति कैसे मिलेगी? मैं वहाँ नहीं जाऊँगा, जहाँ मोहन हो।"
कथा के चौथे दिन, स्वामी जी ने कृष्ण और सुदामा की दोस्ती की कथा सुनाई।
उन्होंने कहा, "मित्रता और भाईचारे में कोई छोटा-बड़ा, अमीर-गरीब नहीं होता। यहाँ तो बस प्रेम होता है। पर जब अहंकार आ जाता है, तो भगवान कृष्ण को भी अपने मित्र तक पहुँचने के लिए एक लंबा इंतज़ार करना पड़ता है।"
यह शब्द, हवा के झोंके की तरह, पंडाल के बाहर खड़े शंकर के कानों में पड़े। वह अनजाने में ही वहाँ से गुज़र रहा था। उन शब्दों ने उसके दिल पर एक हल्की सी चोट की।
अगले दिन, स्वामी जी ने 'क्षमा' पर प्रवचन दिया।
"क्षमा करने वाला हमेशा बड़ा होता है," उन्होंने कहा। "क्रोध एक ऐसा जहर है, जो दूसरे को नुकसान पहुँचाए या न पहुँचाए, पर पीने वाले को ज़रूर मार देता है। अपने मन के मैल को धो डालो, तभी भगवान तुम्हारे मन में वास करेंगे।"
यह बातें, राधिका ने घर आकर शंकर को बताईं। शंकर चुपचाप सुनता रहा।
कहानी में मोड़ तब आया, जब कथा के आखिरी दिन, स्वामी जी ने एक मार्मिक अपील की।
"आज कथा का विश्राम है," उन्होंने कहा। "पर असली कथा तो अब आपके जीवन में शुरू होगी। मैं आप सबसे एक गुरु दक्षिणा माँगता हूँ। आज घर जाकर, उस इंसान से गले मिलिए, जिससे आपने सालों से बात नहीं की है। उस रिश्ते को एक मौका दीजिए, जिसे आपके अहंकार ने तोड़ दिया है।"
यह सुनकर, शंकर के अंदर एक तूफ़ान उठ गया। उसे अपने छोटे भाई, मोहन, का हँसता हुआ चेहरा याद आया। उसे याद आया कि कैसे बचपन में वे दोनों एक ही थाली में खाना खाते थे। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। यह एक बड़े भाई का आत्म-बोध था।
वह उठा, और पहली बार, पंडाल के अंदर जाकर बैठ गया।
दूसरी तरफ, मोहन भी, जो अपनी पत्नी के ज़ोर देने पर आज कथा में आया था, यह सब सुन रहा था। उसे भी अपनी गलती का एहसास हो रहा था। उसे याद आया कि कैसे उसके बड़े भाई ने पिता की मृत्यु के बाद, अपनी पढ़ाई छोड़कर उसे पढ़ाया था। यह एक छोटे भाई का पश्चाताप था।
कथा समाप्त होने के बाद, जब सब लोग प्रसाद ले रहे थे, तो शंकर धीरे-धीरे चलकर मोहन के पास गया।
दोनों भाई एक-दूसरे के सामने खड़े थे। दोनों की आँखों में आँसू थे, पर कोई कुछ बोल नहीं पा रहा था।
तभी, शंकर ने अपने हाथ जोड़े। "मुझे माफ कर दे, मोहन।"
इससे पहले कि वह कुछ और कहता, मोहन ने दौड़कर अपने बड़े भाई को कसकर गले से लगा लिया। "नहीं भैया, गलती मेरी थी। मुझे माफ कर दो।"
दो भाई, जो सालों से दुश्मन बने हुए थे, आज बच्चों की तरह फूट-फूटकर रो रहे थे। राधिका और मोहन की पत्नी, दूर खड़ी, आँखों में खुशी के आँसू लिए यह मिलाप देख रही थीं।
यह कहानी हमें सिखाती है कि गाँव में भागवत कथा सिर्फ एक आयोजन नहीं, बल्कि एक अवसर है - अपने मन के मैल को धोने का, अपने अहंकार को त्यागने का, और टूटे हुए रिश्तों को फिर से जोड़ने का।
उस दिन, शंकर और मोहन ने सिर्फ एक-दूसरे को गले नहीं लगाया था, उन्होंने अपनी आत्मा को उस कड़वाहट से मुक्त किया था, जो सालों से उन्हें अंदर ही अंदर खाए जा रही थी। उन्होंने सीखा कि ज़मीन का एक छोटा सा टुकड़ा, भाई के प्यार से बड़ा नहीं हो सकता। और यही उस भागवत कथा की सबसे बड़ी सफलता थी।
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