दादी की विरासत: एक संदूक में छिपी अनमोल दौलत

 

दादी की विरासत: एक संदूक में छिपी अनमोल दौलत
dadi ki virast

'विरासत' - यह शब्द सुनते ही हमारे मन में ज़मीन, जायदाद और गहनों की तस्वीर उभरती है। पर कुछ विरासतें ऐसी भी होती हैं, जिन्हें किसी तिजोरी में बंद नहीं किया जा सकता, न ही किसी कागज़ पर लिखा जा सकता है। यह कहानी है ऐसी ही एक दादी की विरासत की, जो एक पुरानी, लकड़ी की संदूकची में बंद थी, और जिसने एक परिवार को उसकी असली दौलत का एहसास कराया।

यह कहानी है नेहा की, उसकी दादी, जिसे सब 'अम्मा' कहते थे, और उस एक संदूकची की, जो घर के एक कोने में चुपचाप पड़ी रहती थी।

नेहा, दिल्ली में पली-बढ़ी एक महत्वाकांक्षी और आधुनिक लड़की थी। उसकी दुनिया मल्टीनेशनल कंपनियों, डेडलाइन्स और एक तेज रफ्तार ज़िंदगी से बनी थी। उसे अपने गाँव आना, जहाँ उसकी दादी और माता-पिता रहते थे, थोड़ा पुराना और उबाऊ लगता था।

उसकी दादी, अम्मा, एक शांत और ममतामयी महिला थीं। उनकी दुनिया उनके आँगन, उनकी पूजा और उनकी उस पुरानी संदूकची के इर्द-गिर्द घूमती थी, जिसे वह किसी को छूने भी नहीं देती थीं।

यह दो पीढ़ियों के बीच की सोच का एक आम संघर्ष था।

"अम्मा, क्या है इस पुरानी पेटी में?" नेहा अक्सर पूछती। "इसमें से तो दीमक की बू आती है।"

अम्मा बस मुस्कुरा देतीं। "इसमें मेरी ज़िंदगी की कमाई है, बेटा।"

नेहा को लगता था कि शायद उसमें कुछ पुराने, पुश्तैनी गहने होंगे।

इस कहानी में एक और महत्वपूर्ण किरदार है, नेहा के पिता, रमेश। रमेश अपनी माँ का बहुत सम्मान करते थे, पर वह भी अपनी माँ और अपनी बेटी के बीच की इस वैचारिक खाई को भर नहीं पा रहे थे।

कहानी में मोड़ तब आया, जब शहर में मंदी के कारण नेहा की नौकरी चली गई। जिस सफलता पर उसे बहुत घमंड था, वह रातों-रात एक अनिश्चितता में बदल गई। वह हताश, निराश और टूटी हुई, अपने गाँव लौट आई।

यह एक आधुनिक युवती का अपनी जड़ों की ओर लौटना था, पर यह वापसी हार की वापसी थी।

वह दिन भर अपने कमरे में बंद रहती, किसी से बात नहीं करती। उसे लगता था कि उसकी ज़िंदगी खत्म हो गई है।

एक दोपहर, जब नेहा सो रही थी, तो अम्मा चुपचाप उसके कमरे में आईं। उन्होंने अपने साथ वह पुरानी, चंदन की संदूकची भी लाई थी।

"उठ, बेटा," उन्होंने बड़े प्यार से कहा। "आज मैं तुझे अपनी असली दादी की विरासत दिखाती हूँ।"

नेहा ने बेमन से आँखें खोलीं।

अम्मा ने कांपते हाथों से वह संदूकची खोली। नेहा की आँखें यह देखकर फैल गईं कि उसमें कोई गहने या पैसे नहीं थे।

उसमें थे - हाथ से सिले हुए बच्चों के छोटे-छोटे कपड़े, कुछ पुरानी, पीली पड़ चुकी चिट्ठियाँ, एक सूखा हुआ गुलाब का फूल, और सबसे ऊपर, हाथ से लिखी हुई एक डायरी।

"यह... यह क्या है, अम्मा?" नेहा ने हैरानी से पूछा।

अम्मा ने वह डायरी उठाई। "यह मेरी विरासत है।"

उन्होंने बताया कि कैसे शादी के बाद, जब तुम्हारे दादाजी का बिजनेस डूब गया था, तो उन्होंने घर चलाने के लिए सिलाई का काम शुरू किया था। ये छोटे-छोटे कपड़े उन्होंने ही सिले थे। ये चिट्ठियाँ तुम्हारे दादाजी ने तब लिखी थीं, जब वह काम के सिलसिले में दूसरे शहर गए थे। और यह गुलाब... यह उन्होंने मुझे पहली बार दिया था।

उन्होंने डायरी खोली। उसमें खाने की रेसिपी नहीं, बल्कि ज़िंदगी के नुस्खे लिखे थे।

एक पन्ने पर लिखा था - "जब ज़िंदगी का धागा उलझ जाए, तो उसे तोड़ने की बजाय, धैर्य से सिरा ढूँढ़ना चाहिए।"
एक और पन्ने पर लिखा था - "खुशियाँ कमाने में नहीं, बाँटने में होती हैं।"

यह एक दादी का अपनी पोती को दिया गया सबसे बड़ा ज्ञान था।

"बेटा," अम्मा ने नेहा का हाथ पकड़कर कहा, "मैंने अपनी ज़िंदगी में बहुत उतार-चढ़ाव देखे हैं। गरीबी भी देखी है और अमीरी भी। पर एक चीज़ जो मैंने सीखी है, वह यह है कि हमारी असली दौलत हमारी डिग्रियाँ या बैंक बैलेंस नहीं होतीं। हमारी असली दौलत होती है हमारी हिम्मत, हमारा हुनर और हमारे रिश्ते।"

उन्होंने कहा, "तेरी नौकरी चली गई, तेरा कमाया हुआ पद चला गया। पर तेरा हुनर, तेरी हिम्मत, वह तो तेरे पास ही है। तूने हार नहीं मानी है, तुझे बस एक नया सिरा ढूँढ़ने की ज़रूरत है।"

यह एक पोती का आत्म-बोध था। उस एक पल में, नेहा को अपनी दादी में एक बिजनेस गुरु, एक मोटिवेशनल स्पीकर और एक सबसे अच्छी दोस्त नज़र आई।

उस दिन, नेहा ने रोना बंद कर दिया।

उसने अपनी दादी की उस डायरी से प्रेरणा ली। उसने अपनी दादी के हाथ के सिले हुए कपड़ों के डिज़ाइन को आधुनिक रूप दिया और "अम्मा की विरासत" नाम से एक छोटा सा ऑनलाइन स्टोर शुरू किया।

उसने अपनी दादी की रेसिपी से अचार और मुरब्बे बनाए और उन्हें भी अपने स्टोर पर बेचा।

धीरे-धीरे, उसकी मेहनत रंग लाने लगी। लोगों को उसके प्रोडक्ट्स में सिर्फ सामान नहीं, बल्कि एक कहानी, एक विरासत और एक माँ का प्यार नज़र आया।

यह कहानी हमें सिखाती है कि दादी की विरासत सिर्फ़ भौतिक चीज़ें नहीं होतीं। असली विरासत तो वे संस्कार, वह हिम्मत और वह ज़िंदगी जीने का नज़रिया है, जो वे हमें अपनी बातों और अपने जीवन से सिखाती हैं।

आज, नेहा एक सफल उद्यमी है। पर अब उसे अपनी सफलता पर घमंड नहीं, बल्कि अपनी जड़ों पर गर्व है। और उसकी सबसे बड़ी प्रेरणा आज भी वही है - उसकी अम्मा और उनकी वह जादुई संदूकची।

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