दीदी का विवाह: एक भाई के दिल की अनकही विदाई

 

दीदी का विवाह: एक भाई के दिल की अनकही विदाई
didi ka vivah

'विवाह' - यह शब्द जब भी किसी भारतीय घर में गूँजता है, तो शहनाइयों की आवाज़ के साथ-साथ कुछ खामोश सिसकियाँ भी सुनाई देती हैं। यह कहानी है ऐसी ही एक शादी की, दीदी का विवाह। यह कहानी है एक छोटे भाई, आर्यन, की, जिसके लिए उसकी दीदी का विवाह सिर्फ एक उत्सव नहीं, बल्कि उसके बचपन के एक खूबसूरत अध्याय का अंत था।

यह कहानी है आर्यन की, उसकी दीदी, प्रिया, की और उस एक रिश्ते की, जो शरारतों, शिकायतों और بے پناہ محبت سے بنا تھا۔

आर्यन और प्रिया में सिर्फ़ चार साल का फासला था, पर प्रिया उसके लिए एक बड़ी बहन से कहीं ज़्यादा थी। वह उसकी दोस्त थी, उसकी राज़दार थी, और माँ-पापा की डाँट से बचाने वाली उसकी ढाल थी। उनका रिश्ता टॉम एंड जेरी जैसा था - लड़ते भी बहुत थे, पर एक-दूसरे के बिना रह भी नहीं सकते थे।

यह एक आम भारतीय भाई-बहन के प्यारे रिश्ते की कहानी थी।

जब प्रिया की शादी एक अच्छे, संस्कारी परिवार में, रोहन नाम के लड़के से तय हुई, तो घर में खुशी की लहर दौड़ गई। माँ-पापा, यानी श्री आलोक और श्रीमती सुमन, तैयारियों में जुट गए। घर मेहमानों और हँसी-ठिठोली से भर गया।

पर इस सब के बीच, आर्यन के दिल में एक अजीब सी बेचैनी थी। वह खुश तो था, पर साथ ही उदास भी था। जिस दीदी के साथ वह अपना कमरा, अपनी चॉकलेट्स और अपने सारे राज़ साझा करता था, वह अब हमेशा के लिए किसी और की होने जा रही थी। यह एहसास उसे अंदर ही अंदर परेशान कर रहा था।

वह अब अपनी दीदी से छोटी-छोटी बातों पर लड़ने लगा।

"दीदी, आपने मेरी नीली शर्ट क्यों पहनी?" या "आप हर समय फोन पर ही लगी रहती हैं!"

प्रिया को उसका यह बदला हुआ व्यवहार समझ नहीं आ रहा था। उसे लगता था कि शायद आर्यन उसकी शादी से खुश नहीं है। यह एक भाई-बहन के बीच की प्यारी सी गलतफहमी थी।

"क्या बात है, आर्यन?" उसने एक दिन पूछा। "तू मुझसे ऐसे क्यों लड़ रहा है?"

"कुछ नहीं," आर्यन ने मुँह फेरते हुए कहा।

दीदी का विवाह का दिन आ गया। घर रोशनी और संगीत से जगमगा रहा था। प्रिया, दुल्हन के लाल जोड़े में किसी परी से कम नहीं लग रही थी। पर आर्यन का मन भारी था।

'जूता चुराई' की रस्म के समय, जब सब हँस-खेल रहे थे, आर्यन चुपचाप एक कोने में खड़ा था।

"अरे, दूल्हे का भाई कहाँ है? अपनी दीदी के जीजू से नेग नहीं लोगे क्या?" किसी रिश्तेदार ने छेड़ा।

वह बस फीकी सी मुस्कान देकर रह गया।

कहानी में सबसे मार्मिक मोड़ 'विदाई' के समय आया।

जब प्रिया अपनी माँ और पापा से गले लगकर रो रही थी, तो सब की आँखें नम थीं। पर आर्यन वहीं, पत्थर की मूरत बना खड़ा रहा। उसकी आँखों में आँसू नहीं थे, बस एक गहरी खामोशी थी।

जब प्रिया डोली में बैठने से पहले अपने भाई के पास आई, तो उसने आर्यन को गले से लगा लिया।

"अपना ख्याल रखना, छोटू," उसने सिसकते हुए कहा। "और माँ-पापा को ज़्यादा परेशान मत करना।"

उस एक पल में, आर्यन के सब्र का बाँध टूट गया। वह एक छोटे बच्चे की तरह अपनी दीदी से लिपटकर फूट-फूटकर रो पड़ा।

"मत जाओ, दीदी! प्लीज, मत जाओ," वह कह रहा था। "आपके बिना मैं कैसे रहूँगा? मुझसे अब कौन लड़ेगा? मैं अपनी बातें किसको बताऊँगा?"

यह एक भाई का अपनी बहन के लिए निःस्वार्थ प्रेम था, जो आज विदाई के दर्द में छलक उठा था।

उसका यह रूप देखकर, वहाँ मौजूद हर व्यक्ति की आँखें भर आईं। प्रिया भी अपने आँसू नहीं रोक पाई।

उसने अपने भाई के आँसू पोंछे। "पगले, मैं जा कहाँ रही हूँ? बस एक नए घर में जा रही हूँ। पर मैं हमेशा तेरी वही पुरानी, हिटलर दीदी ही रहूँगी। और हाँ, अब तुझे छेड़ने के लिए जीजू भी तो हैं।"

उसने अपने पर्स से एक छोटी सी, हाथ से बनी राखी निकाली।

"यह... यह तो राखी नहीं है," आर्यन ने हैरानी से कहा।

"यह राखी ही है," प्रिया ने मुस्कुराते हुए कहा। "राखी सिर्फ बहनें ही नहीं, भाई भी बाँध सकते हैं। आज तू मुझे वादा कर कि तू हमेशा एक अच्छा इंसान बनेगा और माँ-पापा का अच्छे से ध्यान रखेगा।"

उसने वह राखी आर्यन की कलाई पर बाँध दी।

यह कहानी हमें सिखाती है कि दीदी का विवाह सिर्फ़ एक बेटी की विदाई नहीं होता, यह एक भाई के जीवन का भी एक महत्वपूर्ण मोड़ होता है। यह उसे जिम्मेदारियों का एहसास कराता है और उसे सिखाता है कि कुछ रिश्ते दूर जाकर भी हमेशा दिल के करीब रहते हैं।

उस दिन, आर्यन ने रोना बंद किया और एक जिम्मेदार भाई की तरह, अपनी दीदी की डोली को कंधा दिया। उसने सीखा कि सच्चा प्यार दूरियों से कम नहीं होता, बल्कि और भी गहरा हो जाता है।

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