धुरंधर दीदी: एक बहन के निःस्वार्थ प्रेम की कहानी

 

धुरंधर दीदी: एक बहन के निःस्वार्थ प्रेम की कहानी
dhurandhar didi

हर परिवार में एक 'दीदी' होती है, जो सिर्फ बड़ी बहन नहीं होती; वह दूसरी माँ होती है, सबसे अच्छी दोस्त होती है, और मुश्किल समय में सबसे मजबूत ढाल होती है। यह कहानी है ऐसी ही एक धुरंधर दीदी, राधिका, की। वह हर काम में माहिर थी - रसोई से लेकर रिश्तों को सँभालने तक, पर इस 'धुरंधर' होने की उसने एक अनकही कीमत चुकाई थी।

यह कहानी है राधिका की, उसके छोटे भाई, रोहन, की और उस एक सपने की, जिसे राधिका ने अपने भाई की खुशियों के लिए कुर्बान कर दिया था।

राधिका और रोहन, देहरादून के एक छोटे से घर में अपनी विधवा माँ, शारदा जी, के साथ रहते थे। राधिका पढ़ाई में बहुत होशियार थी और उसका सपना था एक चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) बनना। वह दिन-रात मेहनत करती थी।

पर जब उनके पिता का अचानक देहांत हो गया, तो घर की सारी जिम्मेदारियाँ राधिका के कंधों पर आ गईं। यह एक बेटी का पहला त्याग था। उसने अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी और एक छोटी सी प्राइवेट कंपनी में अकाउंटेंट की नौकरी कर ली, ताकि घर का खर्चा चल सके और उसके छोटे भाई, रोहन, की पढ़ाई में कोई रुकावट न आए।

रोहन, अपनी बहन से बहुत प्यार करता था, पर वह थोड़ा नासमझ और अपनी ही दुनिया में रहने वाला था। उसे क्रिकेट का बहुत शौक था और वह एक बड़ा क्रिकेटर बनना चाहता था।

"दीदी," वह अक्सर कहता, "देखना, एक दिन मैं इंडिया के लिए खेलूँगा। फिर आपको यह छोटी-मोटी नौकरी करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।"

राधिका मुस्कुरा देती। "ज़रूर, तू खेलेगा। तू बस अपनी प्रैक्टिस पर ध्यान दे।"

राधिका अब घर और ऑफिस, दोनों मोर्चों पर एक धुरंधर दीदी की तरह लड़ रही थी। वह सुबह जल्दी उठकर सबके लिए खाना बनाती, फिर ऑफिस जाती, और शाम को लौटकर रोहन को होमवर्क कराती और घर के बाकी काम निपटाती। वह अपनी थकान और अपने अधूरे सपनों का दर्द अपनी मुस्कान के पीछे छिपा लेती थी।

एक गलतफहमी तब पैदा हुई, जब रोहन का चयन शहर की सबसे अच्छी क्रिकेट अकादमी के लिए हो गया, पर उसकी फीस बहुत ज़्यादा थी।

"मैं यह सब नहीं कर सकता, दीदी," रोहन ने निराश होकर कहा। "हमारे पास इतने पैसे कहाँ हैं?"

"तू चिंता मत कर," राधिका ने कहा। "इंतज़ाम हो जाएगा।"

उस महीने, राधिका ने अपनी कंपनी में डबल शिफ्ट करनी शुरू कर दी। वह अब घर बस कुछ घंटों के लिए सोने ही आती थी। उसकी सेहत गिरने लगी, उसकी आँखों के नीचे काले घेरे पड़ गए।

रोहन को यह सब देखकर बहुत बुरा लगता, पर वह अपने सपने के आगे इतना अंधा हो गया था कि वह अपनी बहन के इस मौन संघर्ष को पूरी तरह से समझ नहीं पा रहा था।

कहानी में मोड़ तब आया, जब अकादमी के फाइनल सिलेक्शन का दिन था। रोहन को उस दिन अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करना था।

ठीक उसी दिन, राधिका, जो रात भर काम करने के बाद सुबह घर लौट रही थी, कमजोरी के कारण सड़क पर बेहोश हो गई।

उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया। डॉक्टर ने बताया कि अत्यधिक तनाव और ठीक से खाना-पीना न करने के कारण वह बहुत ज़्यादा कमजोर हो गई है।

यह खबर सुनकर रोहन के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। एक तरफ उसका क्रिकेट का फाइनल था, और दूसरी तरफ उसकी बहन अस्पताल में थी।

यह एक भाई का आत्म-बोध था। उसे पहली बार एहसास हुआ कि जिस क्रिकेट बैट को वह पकड़ता है, उसकी असली कीमत उसकी धुरंधर दीदी अपनी सेहत और अपनी खुशियों से चुका रही है।

उसने अपना क्रिकेट किट उठाया और उसे एक कोने में रख दिया।

"मैं नहीं जाऊँगा," उसने अपनी माँ से एक दृढ़ निश्चय से कहा। "मेरे लिए मेरी दीदी से बढ़कर कोई मैच नहीं है।"

वह दौड़कर अस्पताल पहुँचा।

जब राधिका की आँखें खुलीं, तो उसने अपने भाई को अपने सिरहाने बैठा पाया।

"रोहन... तू... तू अपने मैच में नहीं गया?" उसने एक कमजोर आवाज़ में पूछा।

"मेरा मैच तो यहाँ है, दीदी," रोहन ने अपनी बहन का हाथ पकड़कर कहा, उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे। "मुझे माफ कर दो, दीदी। मैं बहुत स्वार्थी हो गया था। मैं देख ही नहीं पाया कि आप मेरे लिए क्या-क्या कर रही हैं।"

यह दो भाई-बहन के बीच के रिश्ते की एक नई शुरुआत थी।

उस दिन, रोहन ने एक बड़ा फैसला किया। उसने क्रिकेट के साथ-साथ, अपनी पढ़ाई पर भी ध्यान देना शुरू किया और पार्ट-टाइम काम भी करने लगा, ताकि वह अपनी दीदी का हाथ बँटा सके।

यह कहानी हमें सिखाती है कि हमारे परिवार में अक्सर एक धुरंधर दीदी होती है, जो चुपचाप सबकी खुशियों के लिए अपनी ख्वाहिशों का त्याग कर देती है। हमारा फर्ज़ है कि हम उसके इस त्याग को सिर्फ एक कर्तव्य न समझें, बल्कि उसके सपनों का भी सम्मान करें और उन्हें पूरा करने में उसका सहारा बनें।

सालों बाद, जब रोहन एक सफल क्रिकेटर बन गया, तो उसने अपनी पहली बड़ी कमाई से अपनी बहन, राधिका, के लिए एक CA कोचिंग इंस्टिट्यूट में दाखिला करवाया।

"अब आपकी बारी है, दीदी," उसने कहा। "अब आप अपने सपने को जिएँगी।"

उस दिन, राधिका को लगा कि उसकी सालों की तपस्या सफल हो गई। उसने सिर्फ एक भाई नहीं, बल्कि एक सच्चा दोस्त और हमदर्द पाया था।

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