माँ का विश्वास: एक बेटे की हार में छिपी जीत की कहानी
दुनिया जब आप पर उंगली उठाती है, जब आपकी अपनी परछाई भी आपका साथ छोड़ देती है, तब सिर्फ एक साया है जो हमेशा आपके साथ खड़ा रहता है - माँ का विश्वास। यह कहानी है उस अटूट विश्वास की, जिसने एक हारे हुए बेटे को फिर से जीना सिखाया।
यह कहानी है कबीर, उसकी माँ, श्रीमती शारदा, और समाज की उस कठोर सच्चाई की, जो अक्सर एक गलती को गुनाह बना देती है।
कबीर, एक छोटे से शहर का, होनहार और ईमानदार लड़का था। उसने अपनी मेहनत से शहर के एक बड़े बैंक में नौकरी पाई थी। उसके पिता, एक साधारण शिक्षक, और उसकी माँ, शारदा जी, अपने बेटे की इस सफलता पर बहुत गर्व करते थे।
यह एक आम भारतीय परिवार की खुशी थी, जहाँ एक बेटे की सफलता पूरे खानदान की सफलता मानी जाती है।
पर किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था।
बैंक में एक बहुत बड़ा घोटाला हुआ, और साजिश के तहत, सारा इल्जाम कबीर पर डाल दिया गया। वह निर्दोष था, पर सारे सबूत उसके खिलाफ थे। उसे अपनी नौकरी से निकाल दिया गया और उस पर मुकदमा चलने लगा।
रातों-रात, कबीर की दुनिया बदल गई। जो लोग कल तक उसकी तारीफ करते थे, आज वे उसे देखकर मुँह फेर लेते थे। उसके दोस्त उससे दूर हो गए। समाज का क्रूर चेहरा उसके सामने था।
इस कहानी में एक और किरदार है, कबीर की मंगेतर, रिया। रिया ने भी, अपने परिवार के दबाव में आकर, कबीर से रिश्ता तोड़ दिया।
कबीर पूरी तरह से टूट गया। वह हताश, निराश और अकेला था। उसे लगने लगा कि अब उसकी ज़िंदगी में कुछ नहीं बचा।
"मैं बेगुनाह हूँ, माँ!" वह अक्सर अपनी माँ से कहता, उसकी आवाज़ में एक बच्चे की सी बेबसी होती थी।
"मुझे पता है, बेटा," शारदा जी उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहतीं। उनकी आवाज़ में न कोई शक था, न कोई सवाल, बस एक गहरा, अटूट विश्वास था। "पूरी दुनिया तेरे खिलाफ हो जाए, पर तेरी माँ हमेशा तेरे साथ खड़ी रहेगी।"
यह एक माँ का विश्वास था, जो उसके लिए दुनिया की सबसे बड़ी अदालत से भी बड़ा था।
मुकदमा कई सालों तक चला। घर की सारी जमा-पूँजी वकीलों की फीस में चली गई। कबीर को कोई दूसरी नौकरी भी नहीं दे रहा था। वह अब घर पर ही रहता, चुपचाप, एक ज़िंदा लाश की तरह।
उसके पिता, जो एक सम्मानित शिक्षक थे, लोगों के तानों से टूट चुके थे। उन्हें लगता था कि उनके बेटे ने उनकी इज़्ज़त मिट्टी में मिला दी है। यह एक पिता और पुत्र के बीच की गलतफहमी थी।
एक रात, जब कबीर अपनी ज़िंदगी से पूरी तरह हार चुका था, तो उसने एक भयानक कदम उठाने का फैसला किया।
वह चुपचाप छत पर गया। पर जैसे ही वह आगे बढ़ा, किसी ने उसका हाथ पकड़ लिया। वह उसकी माँ थी।
"यह क्या कर रहा है, कबीर?" शारदा जी की आवाज़ में गुस्सा नहीं, एक गहरा दर्द था।
"अब और हिम्मत नहीं है, माँ," कबीर रो पड़ा। "मैं हार गया।"
उस रात, शारदा जी ने उसे डाँटा नहीं। उन्होंने उसे अपनी ज़िंदगी की एक कहानी सुनाई।
उन्होंने बताया कि कैसे शादी के कई सालों तक उन्हें संतान नहीं हुई थी, और कैसे लोगों ने उन्हें 'बाँझ' होने के ताने मारे थे। पर उन्होंने कभी उम्मीद नहीं छोड़ी। उन्होंने हर व्रत, हर पूजा, सिर्फ एक विश्वास के साथ की - कि एक दिन भगवान उनकी ज़रूर सुनेगा।
"और फिर," उन्होंने अपनी नम आँखों से कबीर को देखते हुए कहा, "भगवान ने मुझे तुमको दिया। तू मेरी तपस्या का फल है, बेटा। तू मेरी हार नहीं, मेरी जीत है। अगर आज तूने हार मान ली, तो मेरा सालों का विश्वास टूट जाएगा।"
यह एक माँ का त्याग था, जो अपने बेटे को अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी ताकत का एहसास करा रही थी।
"दुनिया की छोड़," उन्होंने कहा। "तू अपनी नज़रों में मत गिर। जब तक तू खुद को बेगुनाह मानता है, तब तक तुझे कोई गुनहगार साबित नहीं कर सकता।"
उस रात, अपनी माँ की बातों ने कबीर के अंदर एक नई जान फूँक दी। उसे एहसास हुआ कि वह अकेला नहीं है।
अगले दिन से, कबीर ने एक नई लड़ाई शुरू की - खुद को साबित करने की लड़ाई। उसने कानून की किताबें पढ़नी शुरू कीं, अपने केस की हर बारीक को समझा। उसने एक छोटा सा ट्यूशन सेंटर खोल लिया, ताकि घर का खर्च चल सके।
उसकी राह आसान नहीं थी, पर अब उसके पास माँ का विश्वास था, जो उसकी सबसे बड़ी ढाल था।
कहानी का चरम बिंदु तब आया, जब कबीर ने अपने केस में कुछ ऐसे सबूत ढूँढ़ निकाले, जिन्हें पुलिस भी नहीं ढूँढ़ पाई थी। उसने अदालत में यह साबित कर दिया कि वह निर्दोष है और असली गुनहगार कोई और है।
जिस दिन अदालत ने उसे 'बाईज़्ज़त बरी' किया, उस दिन उसकी आँखों में जीत की खुशी से ज़्यादा अपनी माँ के विश्वास को सच साबित करने का संतोष था।
यह कहानी हमें सिखाती है कि ज़िंदगी में हालात कितने भी बुरे क्यों न हो जाएँ, हमें कभी हार नहीं माननी चाहिए। पर उससे भी बड़ा सबक यह है कि माँ का विश्वास दुनिया की हर दौलत, हर सफलता से बढ़कर है। यह वह अदृश्य शक्ति है, जो हमें सबसे घने अँधेरे में भी रोशनी दिखाती है और हमें टूटने से बचाती है।
उस दिन, जब कबीर घर लौटा, तो उसने अपना मेडल अपनी माँ के गले में पहना दिया। "यह आपका है, माँ। यह आपके विश्वास की जीत है।"
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