विश्वास की कीमत: एक टूटे हुए धागे की कहानी

 विश्वास की कीमत: एक टूटे हुए धागे की कहानी

viswash ki kimat

रिश्तों में विश्वास उस नाजुक धागे की तरह होता है, जो अगर एक बार टूट जाए, तो उसे फिर से जोड़ना बहुत मुश्किल होता है। और अगर जुड़ भी जाए, तो एक गाँठ हमेशा रह जाती है। यह कहानी है ऐसे ही एक टूटे हुए विश्वास की, और उस एक परीक्षा की, जिसने एक परिवार को इस विश्वास की असली कीमत समझाई।
यह कहानी है दो भाइयों, आदित्य और रोहन, की।
आदित्य, बड़ा भाई, एक जिम्मेदार और शांत स्वभाव का था। वह एक छोटी सी सरकारी नौकरी करता था और अपने परिवार को ही अपनी दुनिया मानता था। रोहन, छोटा भाई, थोड़ा चंचल और महत्वाकांक्षी था। उसे हमेशा से लगता था कि वह बड़े काम करने के लिए बना है।
उनके पिता के देहांत के बाद, सारी जिम्मेदारी आदित्य के कंधों पर आ गई थी। उसने अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी, ताकि वह काम करके अपने छोटे भाई को पढ़ा-लिखा सके। यह एक बड़े भाई का निःस्वार्थ त्याग था।
इस कहानी की एक और महत्वपूर्ण पात्र है, आदित्य की पत्नी, सीमा। सीमा एक समझदार और धैर्यवान महिला थी, जो अपने पति के हर फैसले में उसका साथ देती थी।
रोहन ने अपनी पढ़ाई पूरी की और एक बड़ा बिजनेसमैन बन गया। अब उसके पास पैसा था, रुतबा था, और वह अपने भाई को उस 'छोटी सी ज़िंदगी' से बाहर निकालना चाहता था।
"भैया," उसने एक दिन कहा, "आप यह नौकरी छोड़ दीजिए और मेरे बिजनेस में मेरे साथ आ जाइए। हम मिलकर काम को और भी बड़ा बनाएँगे।"
आदित्य ने मुस्कुराकर मना कर दिया। "नहीं, रोहन। मैं अपनी इस ज़िंदगी में खुश हूँ। मुझे स्थिरता पसंद है।"
यह एक गलतफहमी की शुरुआत थी। रोहन को लगा कि उसका भाई उसकी तरक्की से जलता है और इसलिए उसके साथ काम नहीं करना चाहता। और आदित्य को लगा कि उसका भाई पैसे के नशे में इतना अंधा हो गया है कि वह उसके सुकून और संतोष को समझ ही नहीं पा रहा।
दोनों भाइयों के बीच एक अनकही सी दूरी आने लगी।
कहानी में सबसे बड़ा मोड़ तब आया, जब शहर में एक ज़मीन का सौदा सामने आया। रोहन उस ज़मीन पर एक बड़ा प्रोजेक्ट शुरू करना चाहता था। पर उसके पास कुछ पैसों की कमी पड़ रही थी।
उसे पता था कि आदित्य ने अपनी बेटी की शादी के लिए कुछ पैसे जोड़कर रखे हैं। उसने झिझकते हुए अपने भाई से मदद माँगी।
"भैया, मुझे बस छह महीने के लिए कुछ पैसे उधार चाहिए। मैं दोगुने करके लौटाऊँगा। यह मेरी ज़िंदगी का सवाल है।"
आदित्य के लिए यह एक बहुत बड़ा फैसला था। एक तरफ उसके भाई का भविष्य था, और दूसरी तरफ उसकी अपनी बेटी की ज़िंदगी की जमा-पूँजी।
उसने अपनी पत्नी, सीमा, से सलाह की।
"मुझे डर लग रहा है," आदित्य ने कहा। "बिजनेस का कोई भरोसा नहीं होता। अगर कुछ ऊँच-नीच हो गई, तो हम कहीं के नहीं रहेंगे।"
"मुझे आप पर और आपके भाई पर पूरा भरोसा है," सीमा ने एक शांत विश्वास के साथ कहा। "रिश्ते पैसों से बड़े होते हैं। आप मदद कर दीजिए।"
आदित्य ने अपनी सारी जमा-पूँजी रोहन को दे दी। पर उसने एक शर्त रखी - "रोहन, यह मेरी बेटी की अमानत है। छह महीने में मुझे यह वापस चाहिए।"
"आप चिंता मत कीजिए, भैया," रोहन ने वादा किया।
पर किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। मार्केट में मंदी आ गई और रोहन का प्रोजेक्ट बुरी तरह से फंस गया। वह दिवालिया हो गया।
छह महीने बीत गए। आदित्य ने जब अपने पैसे माँगे, तो रोहन की आँखें शर्म से झुकी हुई थीं। "भैया... मैं... मैं बर्बाद हो गया।"
यह सुनकर आदित्य के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसे लगा जैसे उसके छोटे भाई ने उसे धोखा दिया है। रिश्तों में विश्वास का धागा उस दिन टूट गया।
"तुमने मेरा भरोसा तोड़ा है, रोहन!" आदित्य उस दिन पहली बार अपने भाई पर चीखा था। "आज के बाद, मैं तुम्हारी शक्ल भी नहीं देखना चाहता।"
उस दिन, दो भाई हमेशा के लिए अलग हो गए।
समय का पहिया घूमा।
दो साल बीत गए। आदित्य ने फिर से मेहनत करके पैसे जोड़े और अपनी बेटी की शादी तय कर दी।
शादी के दिन, जब वह मंडप में अपनी बेटी का हाथ उसके पति के हाथ में दे रहा था, तो उसकी आँखें अपने छोटे भाई को ढूँढ़ रही थीं। उसे आज उसकी कमी सबसे ज़्यादा खल रही थी।
तभी, किसी ने पीछे से उसके कंधे पर हाथ रखा।
उसने मुड़कर देखा। सामने रोहन खड़ा था। वह बहुत दुबला और कमजोर लग रहा था, पर उसकी आँखों में आज एक अजीब सी शांति थी।
उसने एक बैग आदित्य के हाथ में थमा दिया। "इसमें आपके पूरे पैसे हैं, भैया। सूद समेत।"
आदित्य हैरान था। "पर... पर कैसे?"
"इन दो सालों में, मैंने दिन-रात एक कर दिया," रोहन ने एक थकी हुई मुस्कान के साथ कहा। "मैंने एक फैक्ट्री में मजदूरी की, रात में गार्ड की नौकरी की... पर मुझे आपका टूटा हुआ विश्वास वापस जोड़ना था।"
यह एक भाई का अपने भाई के प्रति पश्चाताप और प्रेम था।
आदित्य की आँखों से आँसू बहने लगे। उसने वह बैग एक तरफ फेंका और अपने छोटे भाई को कसकर गले से लगा लिया।
"मुझे पैसे नहीं, तू चाहिए था, पागल!" उसने रोते हुए कहा।
यह कहानी हमें सिखाती है कि रिश्तों में विश्वास काँच की तरह होता है। एक बार टूट जाए, तो उसे जोड़ना बहुत मुश्किल होता है। पर अगर रिश्तों में सच्चा प्यार और अपनी गलतियों को सुधारने की सच्ची लगन हो, तो उस टूटे हुए काँच को भी फिर से जोड़ा जा सकता है।
उस दिन, मंडप में सिर्फ दो दिलों का नहीं, बल्कि दो भाइयों का भी मिलन हुआ था। उन्होंने सीखा कि ज़िंदगी में सबसे बड़ी दौलत पैसा नहीं, बल्कि एक-दूसरे का अटूट विश्वास ही है।

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