नन्हा मेहमान: एक खामोश आँगन की मुस्कान
श्रीमती और श्री अवस्थी का घर शहर के सबसे शांत कोने में था। यह घर बड़ा था, सुंदर था, पर खामोश था। उनकी इकलौती बेटी की शादी के बाद, यह खामोशी और भी गहरी हो गई थी। श्री अवस्थी, जो एक रिटायर्ड प्रोफेसर थे, अपना ज़्यादातर समय किताबों में बिताते थे। और श्रीमती अवस्थी, अपने बगीचे में। उनका जीवन एक शांत नदी की तरह बह रहा था, जिसमें कोई हलचल नहीं थी।
एक बरसात की दोपहर, उनकी ज़िंदगी में एक नन्हा मेहमान आया।
श्रीमती अवस्थी ने देखा कि उनके बरामदे में, एक गमले के पीछे, एक छोटा सा, भूरे रंग का पिल्ला ठंड से कांप रहा था। वह बारिश में पूरी तरह भीग चुका था और डर के मारे एक कोने में दुबका हुआ था। उसकी आँखों में एक अजीब सी मासूमियत और डर था।
श्रीमती अवस्थी को जानवरों से कभी कोई खास लगाव नहीं रहा था। उन्होंने सोचा कि उसे भगा दें, पर उस कांपते हुए जीव को देखकर उनका दिल पसीज गया। उन्होंने एक पुराना तौलिया लिया और उसे धीरे से पोंछने लगीं।
श्री अवस्थी अपनी किताब से नज़रें उठाकर बाहर आए। "यह क्या है, सुधा? इसे बाहर निकालो। घर में गंदगी फैलेगी।"
"बारिश रुकने तक रहने दीजिए," सुधा जी ने धीरे से कहा। "बहुत डरा हुआ है।"
उस दिन, वह पिल्ला वहीं रुक गया। सुधा जी ने उसे एक कटोरी में दूध दिया, जिसे उसने एक ही साँस में पी लिया।
धीरे-धीरे, वह नन्हा मेहमान उस घर का हिस्सा बनने लगा। सुधा जी ने उसका नाम 'शेरू' रख दिया। शेरू कोई खास नस्ल का कुत्ता नहीं था, वह एक साधारण सा आवारा पिल्ला था। पर उसकी हरकतों ने उस घर की खामोशी को तोड़ना शुरू कर दिया।
जब श्री अवस्थी अखबार पढ़ते, तो वह उनके पैरों के पास आकर सो जाता। जब सुधा जी बगीचे में काम करतीं, तो वह उनके आस-पास उछलता-कूदता रहता। कभी वह उनकी साड़ी का पल्लू खींचता, तो कभी उनके लगाए हुए फूलों के बीच लुढ़कने लगता।
शुरू-शुरू में श्री अवस्थी को यह सब पसंद नहीं आया। उन्हें अपनी शांति में खलल महसूस होता था। पर एक दिन, जब वह अपनी कुर्सी पर बैठे ऊंघ रहे थे, तो शेरू धीरे से आया और अपना सिर उनकी गोद में रख दिया। उस नरम, गर्म स्पर्श ने श्री अवस्थी के अंदर कुछ पिघला दिया। उन्होंने अनजाने में ही अपना हाथ उसके सिर पर रख दिया और उसे सहलाने लगे।
यह एक प्यारे मेहमान की कहानी थी जो धीरे-धीरे घर का सदस्य बन रहा था।
शेरू ने अवस्थी दंपति को एक बार फिर जीना सिखा दिया था। अब उनकी सुबह की चाय अकेले नहीं, बल्कि शेरू के साथ होती थी। अब उनकी शाम की सैर में एक नन्हा साथी भी शामिल था। वे उससे बातें करते, उसे डाँटते, और उसकी शरारतों पर बच्चों की तरह हँसते। बरसों बाद, उस घर में फिर से हँसी गूँज रही थी।
कहानी में मोड़ तब आया, जब एक दिन अचानक शेरू बीमार पड़ गया। उसने खाना-पीना छोड़ दिया और बस एक कोने में चुपचाप लेटा रहता।
अवस्थी दंपति उसे तुरंत जानवरों के डॉक्टर के पास ले गए। डॉक्टर ने बताया कि उसे एक गंभीर इन्फेक्शन है और उसका बचना मुश्किल है।
यह सुनकर दोनों का दिल बैठ गया। वह रात उन्होंने अस्पताल में ही शेरू के पास बिताई। सुधा जी पूरी रात उसका सिर सहलाती रहीं और श्री अवस्थी बार-बार डॉक्टर से उसकी हालत पूछते रहे। उस रात, उन्हें एहसास हुआ कि यह सिर्फ एक पिल्ला नहीं, बल्कि उनका बच्चा बन चुका है।
उन्होंने उसकी जान बचाने के लिए अपनी सारी जमा-पूँजी लगा दी। उनकी प्रार्थनाएँ और डॉक्टरों की मेहनत रंग लाई। कुछ दिनों बाद, शेरू की हालत में सुधार होने लगा।
जिस दिन शेरू ठीक होकर घर वापस आया, उस दिन अवस्थी जी के घर में दिवाली जैसा माहौल था। सुधा जी ने उसकी आरती उतारी और श्री अवस्थी ने उसे अपने हाथों से खाना खिलाया।
उस शाम, जब वे तीनों अपने आँगन में बैठे थे, तो श्री अवस्थी ने अपनी पत्नी का हाथ पकड़कर कहा, "सुधा, हम कितने अकेले थे, है ना? इस नन्हे मेहमान ने आकर हमें एहसास दिलाया कि ज़िंदगी सिर्फ़ शांति से जीने का नाम नहीं है। ज़िंदगी तो प्यार करने, किसी की परवाह करने और किसी के लिए जीने का नाम है।"
सुधा जी मुस्कुराईं, उनकी आँखों में खुशी के आँसू थे। शेरू, जो अब थोड़ा बड़ा हो गया था, उनके पैरों के पास लेटा हुआ था, और उसकी पूँछ खुशी से हिल रही थी।
यह कहानी हमें सिखाती है कि कभी-कभी ज़िंदगी की सबसे बड़ी खुशियाँ अनचाहे मेहमान बनकर ही आती हैं। वे हमें एहसास दिलाती हैं कि प्यार और अपनेपन के लिए खून का रिश्ता होना ज़रूरी नहीं है। एक नन्हा, बेजुबान मेहमान भी एक खाली घर को खुशियों और हँसी से भर सकता है।
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