भारतीय नारी के श्रृंगार में छिपा है संस्कृति का सार

 

भारतीय नारी के श्रृंगार में छिपा है संस्कृति का सार
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भारतीय नारी का श्रृंगार सिर्फ़ सजने-सँवरने का नाम नहीं; यह एक भाषा है, एक कला है, और पीढ़ियों से चली आ रही संस्कृति का एक जीवंत दस्तावेज है। हर बिंदी, हर चूड़ी, हर पायल की अपनी एक कहानी होती है। यह कहानी है उसी कहानी को समझने की, और उस एक बहू की, जिसने अपनी सास की श्रृंगार की पेटी में अपनी जड़ों का सार खोज लिया।

यह कहानी है मीरा की, उसकी सास, श्रीमती शारदा देवी, की और उस पुरानी, चंदन की श्रृंगार पेटी की।

मीरा, मुंबई में पली-बढ़ी एक आधुनिक लड़की थी। वह एक सफल ग्राफिक डिज़ाइनर थी, जिसकी दुनिया रंगों और डिजिटल आर्ट से बनी थी। उसकी शादी एक पुराने, संस्कारी परिवार में, लखनऊ के अनमोल से हुई। अनमोल अपनी माँ, शारदा देवी, से बहुत प्यार करता था, जो उस घर की परंपराओं की संरक्षक थीं।

शारदा देवी एक शांत और गरिमामयी महिला थीं। उनका हर दिन एक अनुष्ठान की तरह था। सुबह पूजा के बाद, वह अपनी पुरानी, नक्काशीदार चंदन की श्रृंगार पेटी के सामने बैठतीं। वह धीरे-धीरे सिंदूर लगातीं, माथे पर एक छोटी सी लाल बिंदी सजातीं, और हाथों में काँच की चूड़ियाँ पहनतीं। उनका यह श्रृंगार सादा था, पर उसमें एक अद्भुत ठहराव और पवित्रता थी।

मीरा को यह सब थोड़ा पुराना और समय की बर्बादी लगता था। उसके लिए, सुंदरता का मतलब था आत्मविश्वास, आरामदायक कपड़े और एक हल्की सी लिपस्टिक। उसे समझ नहीं आता था कि उसकी सास रोज़ इतना समय इन 'पुरानी रस्मों' में क्यों लगाती हैं।

यह दो पीढ़ियों की सोच का एक मौन टकराव था।

"माँजी," मीरा ने एक दिन हिम्मत करके पूछ ही लिया, "आप रोज़ इतनी तैयारी क्यों करती हैं? आपको कहीं जाना तो होता नहीं।"

शारदा देवी ने आईने में से अपनी बहू को देखा और मुस्कुराईं। "बेटी, यह तैयारी मैं किसी और के लिए नहीं, अपने लिए करती हूँ। यह श्रृंगार मेरा आत्मविश्वास है, मेरा स्त्रीत्व है, और तुम्हारे ससुर जी की यादों को ज़िंदा रखने का मेरा तरीका है।"

मीरा को यह जवाब समझ तो नहीं आया, पर वह चुप हो गई।

गलतफहमी तब और बढ़ गई, जब घर में एक बड़ी पूजा थी। शारदा देवी ने मीरा को अपनी एक पुरानी, पारंपरिक बनारसी साड़ी और गहने पहनने को दिए।

"माँजी, यह बहुत भारी है," मीरा ने झिझकते हुए कहा। "क्या मैं अपना सिल्क का सूट पहन लूँ? वह भी बहुत सुंदर है।"

शारदा देवी का चेहरा उतर गया। "बहू, भारतीय नारी के श्रृंगार में छिपा है संस्कृति का सार। यह साड़ी सिर्फ़ कपड़ा नहीं, यह हमारे परिवार की विरासत है। यह मेरी सास ने मुझे दी थी।"

मीरा ने बेमन से वह साड़ी पहन तो ली, पर उसे लगा जैसे वह किसी और का किरदार निभा रही है। उसे घुटन महसूस हो रही थी।

कहानी में मोड़ तब आया, जब मीरा को अपने काम के सिलसिले में एक बड़े प्रोजेक्ट पर काम करने का मौका मिला। उसे एक विदेशी कंपनी के लिए 'भारतीय संस्कृति' पर आधारित एक डिजिटल कैंपेन डिज़ाइन करना था।

मीरा ने बहुत रिसर्च की, पर उसे अपने डिज़ाइन में वह 'आत्मा', वह 'गहराई' नहीं मिल रही थी, जिसकी उसे तलाश थी। वह हताश और निराश होने लगी।

एक रात, जब वह अपने कमरे में परेशान बैठी थी, तो उसकी नज़र अपनी सास, शारदा देवी, पर पड़ी। वह अपनी उसी पुरानी श्रृंगार पेटी के सामने बैठी थीं, और बड़े ही स्नेह से एक पुराने, टूटे हुए झुमके को देख रही थीं। उनकी आँखों में आँसू थे।

मीरा धीरे से उनके पास गई। "क्या हुआ, माँजी?"

शारदा देवी ने आँसू पोंछते हुए कहा, "कुछ नहीं बेटी। बस पुराने दिन याद आ गए। यह झुमका तुम्हारे ससुर जी मेरे लिए पहली बार लाए थे, अपनी पहली तनख्वाह से। इसका एक मोती निकल गया है, पर मैंने इसे आज तक सँभालकर रखा है। इसे देखकर लगता है, जैसे वह आज भी मेरे पास ही हैं।"

उस एक पल में, मीरा को सब कुछ समझ आ गया।

उसे एहसास हुआ कि उसकी सास का श्रृंगार सिर्फ़ सिंदूर, बिंदी और चूड़ियाँ नहीं हैं। यह उनकी यादों का, उनके प्यार का, उनके पूरे जीवन के सफर का एक प्रतीक है। हर गहने के पीछे एक कहानी है, एक भावना है।

यह एक बहू का आत्म-बोध था। उसे अपने प्रोजेक्ट की प्रेरणा मिल गई थी।

अगले दिन, वह अपनी सास के पास गई। "माँजी, क्या आप मुझे अपनी इस श्रृंगार की पेटी के बारे में और बताएँगी?"

उस दिन, शारदा देवी ने अपनी बहू के सामने अपनी पूरी ज़िंदगी खोलकर रख दी। उन्होंने बताया कि सिंदूर सिर्फ़ एक रंग नहीं, बल्कि एक वचन का प्रतीक है। बिंदी सिर्फ़ एक टीका नहीं, बल्कि एकाग्रता और ऊर्जा का केंद्र है। और चूड़ियों की खनक घर में सौभाग्य और खुशी लाती है।

मीरा सब कुछ सुनती रही, और अपने लैपटॉप पर नोट्स बनाती रही।

कुछ हफ्तों बाद, मीरा ने अपना कैंपेन प्रेजेंट किया।

उसने कोई विदेशी मॉडल या चमकदार तस्वीरें नहीं दिखाईं। उसने अपनी सास की तस्वीरें दिखाईं - श्रृंगार करते हुए, पूजा करते हुए, और मुस्कुराते हुए। हर तस्वीर के साथ, उसने उस श्रृंगार के पीछे छिपे गहरे, सांस्कृतिक और भावनात्मक अर्थ को समझाया।

उसका कैंपेन सिर्फ एक विज्ञापन नहीं, बल्कि भारतीय नारी के श्रृंगार में छिपे संस्कृति के सार की एक खूबसूरत कहानी थी।

वह प्रोजेक्ट एक बहुत बड़ी सफलता बना।

उस शाम, जब मीरा अपना अवार्ड लेकर घर लौटी, तो उसने सबसे पहले उसे अपनी सास के कदमों में रख दिया।

"यह आपका है, माँजी," उसने कहा। "आपने मुझे सिखाया कि असली सुंदरता बाहरी चमक में नहीं, बल्कि अपनी जड़ों और अपनी संस्कृति की गहरी समझ में होती है।"

शारदा देवी ने उसे उठाकर गले से लगा लिया। "नहीं, बेटी। आज तो तूने मुझे सिखाया है कि परंपरा को सहेजने का मतलब उसे संदूक में बंद करके रखना नहीं, बल्कि उसे एक नया, खूबसूरत रूप देकर दुनिया के सामने लाना है।"

यह कहानी हमें सिखाती है कि परंपरा और आधुनिकता दो अलग-अलग रास्ते नहीं हैं। जब एक पीढ़ी अपने अनुभव का ज्ञान साझा करती है, और दूसरी पीढ़ी उसे अपनी नई सोच और सम्मान के साथ अपनाती है, तो संस्कृति का एक ऐसा अद्भुत संगम बनता है, जो हर दिल को छू लेता है।

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