एक सपना साकार: पिता और पुत्र के बीच की एक अनकही कहानी

 

एक सपना साकार: पिता और पुत्र के बीच की एक अनकही कहानी
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सपने देखना शायद आसान होता है, पर उन्हें हकीकत में बदलना एक तपस्या की तरह है। और यह तपस्या तब और भी कठिन हो जाती है, जब आपके अपने ही आपके सपनों पर यकीन न करें। यह कहानी है ऐसे ही एक सपने की, और उस एक बेटे की, जिसने अपने पिता की निराशा को अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाकर अपना एक सपना साकार किया।

यह कहानी है राघव और उसके पिता, श्री हरि शंकर जी, की।

वाराणसी के एक पुराने मोहल्ले में, जहाँ सुबह की शुरुआत मंदिरों की घंटियों और गंगा की आरती से होती थी, वहाँ हरि शंकर जी की एक छोटी सी, पीढ़ियों पुरानी लकड़ी की नक्काशी की दुकान थी। उनके हाथ में जादू था। वह लकड़ी के बेजान टुकड़ों में जान फूँक देते थे। पर मशीनों के इस दौर में, हाथ के इस हुनर की कद्र करने वाले कम ही बचे थे।

हरि शंकर जी एक थके हुए, निराश कारीगर थे। उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी इस कला को दी, पर बदले में उन्हें सिर्फ गुज़ारे लायक आमदनी और एक अनकही पहचान ही मिली।

उनका बेटा, राघव, अपने पिता से बिल्कुल अलग था। वह महत्वाकांक्षी था, और उसकी आँखों में बड़े सपने थे। उसने अपने पिता के हुनर को बचपन से देखा था और वह जानता था कि यह कला अनमोल है। उसका सपना था - अपने पिता की इस कला को एक बड़ा, अंतरराष्ट्रीय ब्रांड बनाना।

"पापा," वह अक्सर कहता, "हम आपकी इस कला को ऑनलाइन पूरी दुनिया में बेच सकते हैं। हम एक ब्रांड बना सकते हैं - 'काशी क्राफ्ट्स'।"

हरि शंकर जी एक फीकी, कड़वी हँसी हँसते। "बेटा, यह सब कहने में अच्छा लगता है। मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी इस काम में खपा दी। इस मिट्टी की गलियों से बाहर इस कला की कोई कीमत नहीं है। तू पढ़-लिखकर कोई अच्छी सी नौकरी कर ले। इस लकड़ी में अपना भविष्य मत बर्बाद कर।"

यह एक पिता और पुत्र के बीच की गहरी गलतफहमी थी। पिता को लगता था कि बेटा हवा में महल बना रहा है, और बेटे को लगता था कि पिता ने हार मान ली है।

इस कहानी की एक और महत्वपूर्ण पात्र है, राघव की माँ, शारदा जी। वह अपने पति की निराशा को भी समझती थीं और अपने बेटे के जुनून को भी।

राघव ने अपने पिता की इच्छा के विरुद्ध, कॉलेज की पढ़ाई के साथ-साथ, अपने सपने पर काम करना शुरू कर दिया। उसने एक छोटा सा कैमरा उधार लिया और अपने पिता के काम की सुंदर-सुंदर तस्वीरें और वीडियो बनाने लगा। उसने "काशी क्राफ्ट्स" के नाम से एक सोशल मीडिया पेज बनाया।

यह एक बेटे का अपने पिता के लिए किया गया त्याग था - अपनी नींद का, अपने आराम का। वह रात-रात भर जागकर अपनी वेबसाइट पर काम करता और दिन में कॉलेज जाता।

शुरू-शुरू में, कुछ नहीं हुआ। हरि शंकर जी उसे ताना मारते, "कहा था न, यह सब बेकार है। देख, कोई नहीं पूछता तेरे इस ऑनलाइन तमाशे को।"

राघव चुपचाप सब सुन लेता, पर उसने हिम्मत नहीं हारी।

कहानी में मोड़ तब आया, जब एक विदेशी कला प्रेमी, जो वाराणसी घूमने आया था, ने इंटरनेट पर राघव का पेज देखा। वह उस कला से इतना प्रभावित हुआ कि वह सीधा उनकी छोटी सी दुकान पर पहुँच गया।

उसने न सिर्फ कई कलाकृतियाँ खरीदीं, बल्कि उसने राघव के काम की कहानी अपने ब्लॉग पर भी लिखी। वह ब्लॉग वायरल हो गया।

अब, "काशी क्राफ्ट्स" को दुनिया भर से ऑर्डर मिलने लगे। वह छोटी सी, धूल भरी दुकान अब एक अंतरराष्ट्रीय ब्रांड का वर्कशॉप बन चुकी थी।

हरि शंकर जी हैरान थे। उन्हें अपनी आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था। जिस कला को वह मरता हुआ समझ रहे थे, आज उसी की माँग सात समंदर पार से आ रही थी।

एक सपना साकार हो रहा था, पर यह सिर्फ राघव का सपना नहीं था। यह हरि शंकर जी का भी वह सपना था, जिसे वह सालों पहले कहीं दफ्न कर चुके थे।

कहानी का चरम बिंदु तब आया, जब दिल्ली की नेशनल आर्ट गैलरी से उन्हें अपनी कला का प्रदर्शन करने का निमंत्रण मिला।

"पापा, यह... यह हमारे लिए है," राघव ने कांपती आवाज़ में वह चिट्ठी अपने पिता को दी।

हरि शंकर जी की आँखों से आँसू बहने लगे।

प्रदर्शनी के दिन, जब हरि शंकर जी अपनी धोती-कुर्ते में, उस विशाल, भव्य आर्ट गैलरी में खड़े थे, और लोग उनके काम की तारीफ कर रहे थे, तो उन्होंने अपने बेटे, राघव, का हाथ पकड़ लिया।

"बेटा," उन्होंने एक nghẹn ngat गले से कहा, "मुझे माफ कर दे। मैं ही गलत था। मैं तो सोचता था कि मेरी कला की कोई कीमत नहीं, पर तूने तो उसे कोहिनूर बना दिया।"

राघव ने अपने पिता को गले से लगा लिया। "यह आपकी कला का ही जादू है, पापा। मैंने तो बस उसे दुनिया को दिखाने का एक छोटा सा रास्ता बनाया है।"

यह कहानी हमें सिखाती है कि हमारी पुरानी पीढ़ियों के पास अनुभव और हुनर का एक अनमोल खजाना है, और नई पीढ़ी के पास उस खजाने को दुनिया तक पहुँचाने की तकनीक और जुनून है। जब यह दोनों मिल जाते हैं, तो कोई भी सपना साकार हो सकता है।

असली सफलता सिर्फ पैसा कमाना नहीं, बल्कि अपने माता-पिता की आँखों में अपने लिए वह गर्व देखना है, जो किसी भी दौलत से बढ़कर है।

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