पारिवारिक मूल्यों को फिर से जीना सीखा
पारिवारिक मूल्य वे अदृश्य धागे होते हैं, जो एक परिवार को माला की तरह पिरोकर रखते हैं। यह कहानी है ऐसे ही कुछ मूल्यों की, और उस एक परिवार की, जिसने आज की भाग-दौड़ भरी ज़िंदगी में इन मूल्यों को फिर से जीना सीखा।
यह कहानी है सेवानिवृत्त फौजी, श्री बलवंत चौधरी, उनके बेटे, रोहन, और उनकी बहू, प्रिया, की।
चौधरी निवास, मेरठ के एक पुराने मोहल्ले का एक बड़ा सा घर था, जिसमें एक विशाल आँगन था। उस आँगन में एक बूढ़ा आम का पेड़ था, जिसे बलवंत जी के पिता ने लगाया था। बलवंत जी के लिए, वह आँगन और वह पेड़ उनके पारिवारिक मूल्यों का प्रतीक था - एकता, साझापन और जड़ों से जुड़ाव।
पर उनके बेटे, रोहन, और बहू, प्रिया, जो दोनों दिल्ली में एक बड़ी कंपनी में काम करते थे, के लिए वह बड़ा घर और आँगन बस एक पुरानी संपत्ति थी। वे दोनों आत्मनिर्भर और आधुनिक सोच वाले थे।
"पापा," रोहन अक्सर कहता, "आप और माँ दिल्ली क्यों नहीं आ जाते हमारे साथ? इस बड़े से घर में अकेले रहते हैं। यहाँ क्या रखा है?"
बलवंत जी बस मुस्कुरा देते। "बेटा, हमारी जड़ें यहीं हैं। इस घर ने हमें बनाया है, हम इसे कैसे छोड़ दें?"
यह दो पीढ़ियों के बीच की एक आम गलतफहमी थी। रोहन को लगता था कि उसके पिता ज़िद कर रहे हैं, और बलवंत जी को लगता था कि उनका बेटा अपनी संस्कृति को भूल रहा है।
कहानी में मोड़ तब आया, जब रोहन की कंपनी ने उसे दो साल के लिए अमेरिका भेजने का फैसला किया। यह एक बहुत बड़ा मौका था। रोहन और प्रिया बहुत खुश थे। उन्होंने फैसला किया कि वे जाने से पहले, अपने पुराने घर को बेच देंगे और अपने माता-पिता के लिए दिल्ली में एक छोटा सा फ्लैट खरीद लेंगे।
जब रोहन ने यह बात अपने पिता को बताई, तो घर में एक तूफ़ान आ गया।
"बेच दोगे?" बलवंत जी की आवाज़ में गुस्सा नहीं, एक गहरा दर्द था। "तुम अपने पुरखों की इस निशानी को बेच दोगे? जिस आँगन में तुम्हारा बचपन बीता, उसे पैसों के लिए नीलाम कर दोगे?"
"पापा, प्रैक्टिकल बनिए!" रोहन ने झुंझलाकर कहा। "इस घर का रख-रखाव कितना मुश्किल है। हम वहाँ अमेरिका में होंगे, और आप लोग यहाँ अकेले। यह आपकी भलाई के लिए ही है।"
"हमें नहीं चाहिए ऐसी भलाई," कहकर बलवंत जी चुप हो गए।
उस दिन, बाप-बेटे के बीच की खाई और भी गहरी हो गई।
प्रिया, जो अब तक चुप थी, इस पारिवारिक संघर्ष को महसूस कर रही थी। वह जानती थी कि दोनों अपनी-अपनी जगह सही हैं, पर कोई भी एक-दूसरे को समझने को तैयार नहीं है।
जाने से कुछ दिन पहले, प्रिया ने एक फैसला किया। यह एक बहू का त्याग था, जो अपने परिवार को जोड़े रखने के लिए किया जा रहा था।
उसने अपनी अमेरिका जाने की प्रमोशन वाली नौकरी छोड़ दी, और यह बात उसने किसी को नहीं बताई।
"रोहन," उसने अपने पति से कहा, "तुम अमेरिका जाओ। मैं यहीं माँ और पापाजी के साथ रहूँगी। जब तक मैं यहाँ हूँ, तुम्हें उनकी चिंता करने की ज़रूरत नहीं। और घर भी नहीं बिकेगा।"
रोहन हैरान रह गया। "पर प्रिया, तुम्हारा करियर? तुम्हारा सपना?"
"मेरा सपना मेरे परिवार से बड़ा नहीं है, रोहन," प्रिया ने एक शांत मुस्कान के साथ कहा। "हमारा परिवार ही तो हमारे असली पारिवार-िक मूल्य हैं।"
रोहन भारी मन से अमेरिका चला गया।
इधर, प्रिया अपने सास-ससुर के साथ उस पुराने घर में रहने लगी। शुरू-शुरू में बलवंत जी उससे नाराज़ रहे। उन्हें लगा कि प्रिया ने उनके बेटे को उनसे छीन लिया है।
पर प्रिया ने धैर्य नहीं खोया। उसने उस घर को, उस आँगन को फिर से ज़िंदा करना शुरू कर दिया। उसने अपनी सास के साथ मिलकर आम के पेड़ के नीचे सब्जियाँ उगानी शुरू कीं। उसने आँगन में एक झूला डलवाया। वह रोज़ शाम को अपने ससुर के साथ बैठकर उनकी पुरानी फौजी कहानियाँ सुनती।
धीरे-धीरे, बलवंत जी का पत्थर दिल पिघलने लगा। उन्होंने देखा कि उनकी बहू उस घर को सिर्फ एक इमारत नहीं, बल्कि एक परिवार की तरह सहेज रही है। उन्हें उसमें अपनी जड़ों की एक झलक दिखाई दी।
एक साल बाद, जब रोहन छुट्टियों में घर लौटा, तो वह अपने घर को देखकर हैरान रह गया। वह पुराना, खामोश घर अब हँसी और खुशियों से गूँज रहा था। आँगन में बच्चे खेल रहे थे, और उसके पिता, जो हमेशा गंभीर रहते थे, आज बच्चों के साथ हँस रहे थे।
उस रात, बलवंत जी ने रोहन को अपने पास बुलाया।
"बेटा," उन्होंने कहा, "मैं गलत था। मैं हमेशा तुम्हें कोसता रहा कि तुम अपनी जड़ों को भूल गए हो। पर सच तो यह है कि तुम अपनी जड़ों का सबसे मजबूत हिस्सा अपने साथ ही ले गए थे - तुम्हारी पत्नी, प्रिया।"
उन्होंने कहा, "इस लड़की ने मुझे सिखाया कि पारिवार-िक मूल्य किसी घर या ज़मीन में नहीं बसते। वे तो रिश्तों को सहेजने, एक-दूसरे के लिए त्याग करने और प्यार से साथ रहने में बसते हैं।"
यह एक पिता का आत्म-बोध था।
उस दिन, रोहन ने फैसला किया कि वह अमेरिका वापस नहीं जाएगा। उसने अपनी कंपनी से भारत में ट्रांसफर ले लिया, ताकि वह अपने परिवार के साथ रह सके।
यह कहानी हमें सिखाती है कि हमारी जड़ें हमारी कमजोरी नहीं, बल्कि हमारी सबसे बड़ी ताकत होती हैं। पारिवार-िक मूल्य हमें बांधते नहीं, बल्कि हर तूफान में हमें संभाले रखते हैं। और कभी-कभी, एक बहू या एक बेटी भी पूरे परिवार को इन मूल्यों का सही अर्थ सिखा सकती है।
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