'संस्कारी होना': परंपरा और प्रगति का सुंदर संगम

 'संस्कारी होना': परंपरा और प्रगति का सुंदर संगम

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'संस्कारी होना' - इस शब्द का अर्थ अक्सर लोग सिर्फ़ सिर झुकाकर हर बात मान लेना समझते हैं। पर असली संस्कार तो वह हैं जो हमें सही और गलत की पहचान करना सिखाते हैं, जो हमें दूसरों का सम्मान करने के साथ-साथ अपने आत्म-सम्मान की रक्षा करना भी सिखाते हैं। यह कहानी है ऐसी ही एक माँ की संस्कारी बेटी, आरुषि, की, जिसने अपनी माँ से मिले संस्कारों को अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाया।
यह कहानी है आरुषि की, उसकी माँ, श्रीमती अंजना, की, और उस एक घटना की, जिसने 'संस्कारी' होने की परिभाषा को एक नया अर्थ दिया।
आरुषि, लखनऊ के एक मध्यमवर्गीय परिवार की बेटी थी। उसकी माँ, अंजना, एक स्कूल टीचर थीं। उन्होंने अपनी बेटी को कभी रटी-रटाई परंपराएँ नहीं सिखाईं, बल्कि उन्हें हर परंपरा के पीछे का तर्क और महत्व समझाया।
"संस्कार का मतलब अंधा होकर किसी की बात मानना नहीं है, बेटा," वह अक्सर कहतीं। "संस्कार का मतलब है, विवेक से यह तय करना कि क्या सही है, और फिर पूरी हिम्मत से उस सही के साथ खड़ा होना।"
यह एक माँ की दी हुई आधुनिक और गहरी परवरिश थी।
आरुषि की शादी एक बड़े और अमीर, पर थोड़े पुराने ख्यालों वाले परिवार में हुई। उसके पति, रोहन, एक अच्छे इंसान थे, पर वह अक्सर अपने परिवार, खासकर अपनी माँ, श्रीमती शारदा देवी, के सामने चुप रह जाते थे।
शारदा देवी को अपनी नई बहू से बहुत उम्मीदें थीं। वह चाहती थीं कि आरुषि घर सँभाले, अपनी नौकरी छोड़ दे और एक 'आदर्श बहू' बने।
यह एक आम भारतीय सास-बहू के रिश्ते की शुरुआत थी, जहाँ उम्मीदों और व्यक्तित्व का टकराव होना तय था।
कहानी में मोड़ तब आया, जब परिवार के पुश्तैनी गहनों के बँटवारे की बात चली। शारदा देवी ने अपनी बेटी, नंदिनी, को जो शादी में कम दहेज मिलने के कारण ससुराल में ताने सुन रही थी, चुपके से परिवार के कुछ सबसे कीमती गहने दे दिए।
यह बात उन्होंने अपने बेटे, रोहन, से भी छिपाई।
जब घर में गहने गायब होने की बात पता चली, तो शक की सुई घर की नई सदस्य, यानी आरुषि, पर आ गई।
"जब से यह घर में आई है, तभी से चीज़ें इधर-उधर हो रही हैं," नंदिनी की चालाक चाची-सास ने आग में घी डालने का काम किया।
रोहन परेशान था। वह अपनी पत्नी पर शक तो नहीं करना चाहता था, पर अपनी माँ के खिलाफ़ कुछ बोल भी नहीं पा रहा था।
"आरुषि, तुम कुछ बोलती क्यों नहीं?" उसने अकेले में कहा। "सब तुम पर उंगली उठा रहे हैं।"
"मैं क्या बोलूँ, रोहन?" आरुषि ने शांत, पर दृढ़ आवाज़ में कहा। "सच तो माँजी ही जानती हैं।"
उस रात, आरुषि ने अपनी माँ, अंजना, को फोन किया और रोते हुए सारी बात बताई।
"माँ, मैं क्या करूँ? सब मुझे गलत समझ रहे हैं।"
अंजना ने अपनी बेटी को सांत्वना दी। "बेटा, याद है मैंने तुम्हें क्या सिखाया था? संस्कार का मतलब चुप रहकर अन्याय सहना नहीं है। पर सच को भी सम्मान और विवेक के साथ सामने लाना पड़ता है।"
यह एक माँ की सीख थी, जो उसकी बेटी की सबसे बड़ी हिम्मत बनने वाली थी।
अगले दिन, जब पूरा परिवार एक साथ बैठा था और आरुषि पर दबे-छिपे आरोप लगाए जा रहे थे, तो आरुषि उठी।
उसने किसी पर कोई इल्जाम नहीं लगाया।
वह सीधा अपनी सास, शारदा देवी, के पास गई और उनके पैर छू लिए।
"माँजी," उसने बड़ी नरमी से कहा, "मैं जानती हूँ, आप एक माँ हैं। और एक माँ अपनी बेटी की खुशी के लिए कुछ भी कर सकती है। नंदिनी दीदी की खुशी आपके लिए कितनी ज़रूरी है, यह मैं समझ सकती हूँ।"
एक पल के लिए कमरे में सन्नाटा छा गया।
आरुषि ने आगे कहा, "पर माँजी, क्या एक बेटी का सम्मान दूसरी बेटी के सम्मान से ज़्यादा कीमती है? मैं भी तो आपकी बेटी हूँ। आपने जो किया, अपनी बेटी की मदद करने के लिए किया। पर उसे छिपाकर, आपने अपनी दूसरी बेटी के आत्म-सम्मान पर सवाल उठा दिया।"
उसने अपने हाथ जोड़े। "मैं आपसे गहने वापस नहीं माँग रही। वे दीदी की अमानत हैं। मैं तो बस अपना मान वापस माँग रही हूँ। बस एक बार सबके सामने सच कह दीजिए।"
आरुषि के शब्दों में कोई कड़वाहट नहीं थी, कोई शिकायत नहीं थी। बस एक शांत, पर गहरी पीड़ा और सच की अपील थी।
यह एक संस्कारी बेटी की ताकत थी, जो लड़ नहीं रही थी, पर झुकी भी नहीं थी।
शारदा देवी का चेहरा अपराधबोध से झुक गया। अपनी बहू की आँखों में इतनी समझ और इतनी गरिमा देखकर, उनका दिल पिघल गया। यह एक सास का आत्म-बोध था।
उन्होंने हिम्मत की और सबके सामने अपनी गलती मानी। "मुझसे भूल हो गई," उन्होंने रोते हुए कहा। "मेरी बेटी तो आरुषि है, जिसने आज मेरे परिवार की इज़्ज़त बचा ली।"
यह कहानी हमें सिखाती है कि सच्ची संस्कारी बेटी वह नहीं जो आँख मूँदकर हर बात मान ले, बल्कि वह है जो सही और गलत के बीच का फर्क समझे और सच के लिए सम्मान के साथ खड़ी हो सके।
आरुषि ने अपनी माँ की दी हुई सीख से न सिर्फ अपने ऊपर लगे दाग को धोया, बल्कि उसने अपने ससुराल में रिश्तों को एक नई, सच्ची और सम्मानजनक नींव भी दी। उसने सिखाया कि संस्कार हमें दबाने के लिए नहीं, बल्कि हमें और भी मजबूत और विवेकशील बनाने के लिए होते हैं।

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