बड़की बहू: एक परिवार की अनकही नींव

 

बड़की बहू: एक परिवार की अनकही नींव
badki bahu

'बड़की बहू' - यह सिर्फ एक रिश्ता नहीं, बल्कि भारतीय परिवारों में एक ज़िम्मेदारी का पर्याय है। यह वह पद है, जहाँ उम्मीदें अनंत होती हैं और अधिकार सीमित। यह कहानी है ऐसी ही एक बड़की बहू, सावित्री, की। यह कहानी है उसके त्याग की, उसकी चुप्पी की, और उस एक पल की, जब परिवार ने उसकी कीमत को पहचाना।

सावित्री जब बीस साल की उम्र में शादी करके 'चौधरी निवास' में आई, तो वह सिर्फ एक बहू नहीं, बल्कि बड़की बहू बनकर आई थी। उसके ससुर, चौधरी रामप्रताप, एक सख्त और अनुशासित व्यक्ति थे। सास, शारदा जी, बीमार रहती थीं। और पति, राकेश, अपने पिता के व्यवसाय में इतने व्यस्त रहते थे कि उन्हें घर की सुध ही नहीं रहती थी।

उस बड़े से, संयुक्त परिवार की सारी ज़िम्मेदारी सावित्री के नाजुक कंधों पर आ गई। देवर-ननद की पढ़ाई, सास-ससुर की दवाइयाँ, और घर की रसोई... वह सुबह सबसे पहले उठती और रात में सबसे आखिर में सोती।

यह एक आम भारतीय बहू का संघर्ष था, जिसकी अपनी ख्वाहिशें परिवार की ज़रूरतों के नीचे कहीं दबकर रह गई थीं।

सावित्री को पढ़ना बहुत पसंद था। वह एक लेखिका बनना चाहती थी। पर शादी के बाद, उसकी डायरी और कलम कहीं धूल खाने लगे।

समय बीता। देवर-ननद पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़े हो गए, उनकी शादियाँ हो गईं। पर सावित्री की भूमिका नहीं बदली। वह आज भी उस घर की बड़की बहू ही थी, जिसकी सलाह तो हर कोई लेता था, पर जिसके मन की कोई नहीं पूछता था।

इस कहानी में एक और महत्वपूर्ण किरदार है, सावित्री की छोटी ननद, प्रिया। प्रिया अपनी भाभी से बहुत प्यार करती थी और उनके इस निःस्वार्थ त्याग को देखती और समझती थी।

कहानी में मोड़ तब आया, जब परिवार में ज़मीन के बँटवारे की बात चली। चौधरी रामप्रताप ने अपनी वसीयत में जायदाद का ज़्यादातर हिस्सा अपने बेटे, राकेश, के नाम कर दिया था।

यह बात जब छोटे देवर को पता चली, तो घर में भूचाल आ गया।

"यह अन्याय है, पिताजी!" देवर ने कहा। "भैया ने क्या किया है? असली मेहनत तो मैंने की है। भाभी तो बस घर में रहती हैं।"

यह एक गहरी गलतफहमी थी। सबने सावित्री के काम को 'घर का काम' मानकर उसकी कोई कीमत ही नहीं आँकी थी। किसी ने यह नहीं देखा कि अगर सावित्री ने घर को एक किले की तरह न सँभाला होता, तो बाहर कोई भी जंग नहीं जीती जा सकती थी।

उस दिन, घर में पहली बार दीवारें खिंच गईं। राकेश अपने पिता और भाई के बीच पिस रहा था।

उस रात, जब सावित्री अपने कमरे में अकेली थी, तो उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे। आज उसे पहली बार एहसास हुआ कि इस घर में उसका अपना क्या है। उसने अपनी पूरी ज़िंदगी इस परिवार के लिए लगा दी, और आज उसी के अस्तित्व पर सवाल उठाया जा रहा था।

तभी, उसकी ननद, प्रिया, उसके पास आई।

"भाभी," उसने धीरे से कहा, "आप क्यों चुप हैं? आप क्यों नहीं बतातीं कि इस घर के लिए आपने क्या-क्या कुर्बान किया है?"

"छोड़, प्रिया," सावित्री ने एक थकी हुई मुस्कान के साथ कहा। "बड़की बहू का काम ही यही होता है... परिवार को जोड़े रखना, चाहे इसके लिए खुद को ही क्यों न तोड़ना पड़े।"

यह एक बड़की बहू का चरम त्याग था।

अगली सुबह, जब परिवार के बँटवारे की आखिरी बात होने वाली थी, तो सावित्री ने एक ऐसा कदम उठाया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।

वह सबके सामने आई और अपने ससुर, चौधरी रामप्रताप, के हाथ जोड़कर बोली, "बाबूजी, मेरी एक विनती है। आप यह सारी जायदाद दोनों बेटों में बराबर बाँट दीजिए।"

सब हैरान रह गए। राकेश ने उसे रोकने की कोशिश की, "सावित्री, तुम यह क्या कह रही हो?"

"मैं सही कह रही हूँ," उसने बड़ी शांति और दृढ़ता से कहा। "इस घर की असली जायदाद यह ज़मीन या पैसा नहीं, बल्कि हमारा एक साथ रहना है। मैं नहीं चाहती कि मेरी वजह से यह परिवार टूटे।"

उसने अपने देवर की ओर देखा। "तुम सही हो। मैंने कोई बिजनेस नहीं किया। पर मैंने इस घर को एक परिवार बनाए रखने की पूरी कोशिश की है। और एक बड़की बहू के नाते, मैं आज भी वही करूँगी।"

उस एक पल में, सावित्री का कद उस घर में सबसे ऊँचा हो गया था।

उसके देवर की आँखें शर्म से झुक गईं। उसे अपनी गलती का एहसास हुआ। यह एक रिश्ते की सुलझन थी।

उसने आगे बढ़कर अपनी भाभी के पैर छू लिए। "मुझे माफ कर दो, भाभी। मैं अंधा हो गया था। मैं देख ही नहीं पाया कि इस घर की असली नींव तो आप हैं।"

यह कहानी हमें सिखाती है कि बड़की बहू सिर्फ एक रिश्ता नहीं, बल्कि एक संस्था है। वह एक परिवार की वह खामोश ताकत होती है, जो बिना किसी श्रेय की उम्मीद किए, सबको एक साथ बाँधे रखती है।

उस दिन, चौधरी रामप्रताप ने अपनी वसीयत फाड़ दी और एक नई वसीयत बनाई, जिसमें उन्होंने जायदाद का एक हिस्सा अपनी बड़की बहू, सावित्री, के नाम भी किया।

उन्होंने कहा, "यह हिस्सा इसलिए नहीं कि तुम एक बहू हो, बल्कि इसलिए कि तुम इस घर की बेटी और इस परिवार की आत्मा हो।"

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