नैरात्म्य गुहेश्वरी माँ: स्वयं को खोकर सब कुछ पाने की कहानी

 

नैरात्म्य गुहेश्वरी माँ: स्वयं को खोकर सब कुछ पाने की कहानी
Vedanta's

कुछ यात्राएँ हमें दुनिया के कोनों तक ले जाती हैं, और कुछ हमारे ही अंदर की उन गहराइयों में, जहाँ सत्य छिपा होता है। यह कहानी है ऐसी ही एक आंतरिक यात्रा की, और उस रहस्यमयी शक्ति की, जिसे भक्त नैरात्म्य गुहेश्वरी माँ कहते हैं - वह गुप्त देवी, जो स्वयं को खो देने पर ही मिलती है।

यह कहानी है वेदांत की, उसकी माँ, श्रीमती आनंदी, की और उसके गुरु, जिन्हें सब 'बाबा' कहते थे।

वेदांत, दिल्ली का एक सफल और महत्वाकांक्षी पत्रकार था। उसकी दुनिया तथ्यों, सबूतों और तर्क पर टिकी थी। उसके लिए आध्यात्मिकता और आस्था, कमजोर मन का एक वहम थी।

उसकी माँ, आनंदी, बिल्कुल उसके विपरीत थीं। वह एक शांत, आध्यात्मिक महिला थीं, जिनकी गुहेश्वरी माँ में अटूट आस्था थी। वह मानती थीं कि जब हम अपने 'मैं' को, अपने अहंकार को त्याग देते हैं, तभी हमें उस परम शक्ति का अनुभव होता है।

यह एक माँ और बेटे के बीच की वैचारिक खाई थी।

"माँ, आप क्यों इन सब में अपना समय बर्बाद करती हैं?" वेदांत अक्सर कहता। "यह 'नैरात्म्य' और 'शून्यता' की बातें सिर्फ कल्पना हैं। हकीकत तो यह है कि जो दिखता है, वही बिकता है।"

आनंदी बस मुस्कुरा देतीं। "बेटा, सबसे बड़ी हकीकत तो वह है, जो आँखों से नहीं, आत्मा से दिखती है।"

कहानी में मोड़ तब आया, जब वेदांत को अपनी पत्रिका के लिए हिमालय की कंदराओं में रहने वाले एक रहस्यमयी संत, 'बाबा', का इंटरव्यू करने का मौका मिला। वेदांत इसे अपने करियर की सबसे बड़ी चुनौती मान रहा था। वह दुनिया को यह दिखाना चाहता था कि यह 'बाबा' भी एक ढोंगी है।

वह अपनी माँ को चिढ़ाते हुए बोला, "चलिए माँ, आज आपकी नैरात्म्य गुहेश्वरी माँ के एक और एजेंट का पर्दाफाश करके आते हैं।"

आनंदी ने उसके सिर पर हाथ फेरा। "जा, बेटा। पर अपनी बुद्धि के साथ-साथ, अपना दिल भी खुला रखना।"

कई दिनों की कठिन चढ़ाई के बाद, वेदांत उस गुफा तक पहुँचा, जहाँ बाबा रहते थे। गुफा के बाहर सिर्फ शांति थी, और अंदर एक दीये की टिमटिमाती लौ में एक वृद्ध संत बैठे थे, जिनकी आँखों में एक अद्भुत गहराई और शांति थी।

वेदांत ने अपने तीखे सवालों की बौछार शुरू कर दी। "बाबा, आप लोगों को 'स्वयं को खो देने' का उपदेश क्यों देते हैं? क्या यह पलायनवाद नहीं है? अपनी पहचान खोकर इंसान क्या पाएगा?"

बाबा मुस्कुराए। "बेटा, तुम सवाल गलत पूछ रहे हो। सवाल यह नहीं है कि 'क्या पाएगा', सवाल यह है कि 'क्या खोएगा'?"

उन्होंने कहा, "इंसान अपनी पहचान नहीं खोता, वह सिर्फ अपने अहंकार, अपने डर, और अपने दुखों को खोता है। जब नदी समंदर में मिलती है, तो वह खत्म नहीं होती, वह समंदर बन जाती है। यही नैरात्म्य का रहस्य है।"

वेदांत को यह सब दार्शनिक बातें लगीं।

तभी, गुफा में एक और व्यक्ति आया। वह बाबा का शिष्य, देव, था। देव ने बताया कि पास के गाँव में भूस्खलन (landslide) हो गया है और कई लोग घायल हैं।

बाबा तुरंत उठे और अपना झोला उठाया, जिसमें कुछ जड़ी-बूटियाँ थीं। वेदांत भी अपना कैमरा लेकर उनके पीछे भागा, उसे एक 'ब्रेकिंग न्यूज़' की उम्मीद थी।

जब वे गाँव पहुँचे, तो मंजर भयानक था। लोग रो रहे थे, चिल्ला रहे थे। बाबा बिना कुछ कहे, घायलों की सेवा में लग गए। वह किसी डॉक्टर की तरह उनके घावों पर मरहम लगा रहे थे। वेदांत यह सब रिकॉर्ड कर रहा था।

तभी, उसने देखा कि एक छोटा सा बच्चा एक टूटे हुए घर के मलबे के नीचे दबा हुआ है और रो रहा है। एक भारी पत्थर का टुकड़ा उस पर गिरने ही वाला था।

वेदांत एक पल के लिए जड़ हो गया। उसका पत्रकार दिमाग उसे 'यह शॉट मिस मत करना' कह रहा था।

पर अगले ही पल, उसे अपनी माँ का चेहरा याद आया। उसे बाबा की बातें याद आईं - "सेवा में 'स्वयं' नहीं होता।"

उसने अपना महंगा कैमरा एक तरफ फेंका और उस बच्चे की ओर भागा। उसने अपनी पूरी ताकत लगाकर उस पत्थर को रोका। पत्थर भारी था, और उसके हाथ छिल गए, खून बहने लगा। पर उसे दर्द का एहसास नहीं हुआ।

उस एक पल में, वह एक पत्रकार नहीं था, वह बस एक इंसान था, जो दूसरे इंसान की जान बचा रहा था। उसने अपने 'स्वयं' को, अपने करियर के अहंकार को, उस बच्चे की जान के लिए अर्पित कर दिया था।

जब उसने बच्चे को सुरक्षित बाहर निकाला, तो बच्चे की माँ ने रोते हुए उसके पैर छू लिए।

उस रात, जब वेदांत गुफा में वापस लौटा, तो उसके हाथ में पट्टी बंधी थी, पर उसके चेहरे पर एक ऐसी शांति थी, जो उसने पहले कभी महसूस नहीं की थी।

बाबा ने उसकी ओर देखा। "तो मिल गई तुम्हें अपनी कहानी?"

वेदांत की आँखों में आँसू थे। "बाबा, मुझे कहानी नहीं, मुझे मैं मिल गया। आज जब मैं उस बच्चे को बचा रहा था, तो मुझे न अपने नाम की परवाह थी, न अपने करियर की। मैं बस 'था'। एक खालीपन, एक शून्यता... पर वह खालीपन इतना भरा हुआ था, इतना शांत था।"

यह वेदांत का आत्म-बोध था।

बाबा मुस्कुराए। "बेटा, आज तुमने नैरात्म्य गुहेश्वरी माँ के पहले दर्शन किए हैं। वह गुप्त देवी कहीं बाहर नहीं, हमारे ही अंदर बसती है। जब हम 'मैं' से ऊपर उठकर, निःस्वार्थ भाव से किसी की सेवा करते हैं, तो वही देवी प्रकट होती है।"

यह कहानी हमें सिखाती है कि आध्यात्मिकता किसी गुफा या मंदिर में नहीं मिलती। वह तो निःस्वार्थ कर्म और सेवा के मार्ग पर ही मिलती है। जब हम अपनी छोटी सी पहचान और अपने छोटे से अहंकार को त्याग देते हैं, तो हम उस परम चेतना का हिस्सा बन जाते हैं, जो हम सबके अंदर मौजूद है। यही 'स्वयं को खोकर' सब कुछ पा लेने का रहस्य है।

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