स्वयं की यात्रा: एक बेटे की घर वापसी की कहानी

 

स्वयं की यात्रा: एक बेटे की घर वापसी की कहानी
swayam ki yatra

कभी-कभी, ज़िंदगी की सबसे लंबी और सबसे कठिन यात्रा बाहर की दुनिया में नहीं, बल्कि हमारे अपने अंदर होती है। यह कहानी है ऐसी ही एक स्वयं की यात्रा की, और एक ऐसे बेटे, सिद्धार्थ, की, जो दुनिया जीतने की दौड़ में खुद को ही कहीं पीछे छोड़ आया था।

यह कहानी है सिद्धार्थ की, उसके पिता, श्री रमाकांत, की और उस पुराने, पुश्तैनी घर की, जिसकी खामोश दीवारें उसकी वापसी का इंतज़ार कर रही थीं।

सिद्धार्थ, मुंबई का एक सफल कॉर्पोरेट लॉयर था। उसकी दुनिया ऊँची इमारतों, महंगी गाड़ियों और करोड़ों की डील्स में सिमटी हुई थी। उसने अपनी मेहनत से वह सब कुछ हासिल कर लिया था, जिसका उसने कभी सपना देखा था। पर इस सफलता की चकाचौंध में, एक चीज़ थी जो धीरे-धीरे धुंधली पड़ रही थी - उसका अपना 'स्वयं'।

वह अब हँसना भूल गया था। उसे याद नहीं था कि आखिरी बार उसने कब सुकून की साँस ली थी। वह हमेशा एक अजीब सी बेचैनी और खालीपन से घिरा रहता था।

उसके पिता, रमाकांत जी, एक छोटे से पहाड़ी कस्बे, रानीखेत, में रहते थे। वह एक रिटायर्ड स्कूल टीचर थे, जिनकी ज़िंदगी आज भी उतनी ही सरल और शांत थी, जितनी सालों पहले थी।

"बेटा, कुछ दिनों के लिए घर आ जा," वह अक्सर फोन पर कहते। "यहाँ की हवा में शांति है। तुझे अच्छा लगेगा।"

"पापा, आप नहीं समझेंगे," सिद्धार्थ हमेशा टाल देता। "मेरे पास बिल्कुल समय नहीं है। यहाँ करोड़ों का सवाल है।"

यह दो पीढ़ियों के बीच की एक आम गलतफहमी थी। पिता को लगता था कि बेटा पैसे के पीछे अंधा हो गया है, और बेटे को लगता था कि पिता उसकी महत्वाकांक्षाओं को नहीं समझते।

इस कहानी की एक और महत्वपूर्ण पात्र है, सिद्धार्थ की पत्नी, अनन्या। अनन्या एक समझदार महिला थी, जो अपने पति की इस अंदरूनी लड़ाई को देख रही थी। वह जानती थी कि उसका पति बाहर से जितना सफल दिखता है, अंदर से उतना ही अकेला और टूटा हुआ है।

कहानी में मोड़ तब आया, जब एक बहुत बड़ी डील हारने के बाद, सिद्धार्थ पहली बार अपनी ज़िंदगी में असफल हुआ। यह हार उसके अहंकार पर एक गहरा घाव थी। वह डिप्रेशन में चला गया। उसने खुद को दुनिया से काट लिया।

उस मुश्किल समय में, अनन्या ने एक बड़ा फैसला किया। यह एक पत्नी का अपने पति के लिए निःस्वार्थ प्रेम और त्याग था।

उसने बिना सिद्धार्थ को बताए, उसका सारा सामान पैक किया और उसे लेकर रानीखेत के लिए निकल पड़ी।

"यह तुम क्या कर रही हो, अनन्या?" सिद्धार्थ रास्ते में चिल्लाया। "मैं उस पिछड़े हुए गाँव में जाकर क्या करूँगा?"

"आप कुछ नहीं करेंगे," अनन्या ने शांति से कहा। "आप बस खुद से मिलेंगे।"

जब वे अपने पुराने, पुश्तैनी घर पहुँचे, तो दरवाज़े पर रमाकांत जी खड़े थे। उन्होंने अपने बेटे की झुकी हुई आँखों और मुरझाए हुए चेहरे को देखा, तो उनका दिल बैठ गया। उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस आगे बढ़कर उसे गले से लगा लिया।

अगले कुछ दिन, सिद्धार्थ के लिए एक सजा की तरह थे। वहाँ न फोन का नेटवर्क था, न इंटरनेट, न कोई काम। बस चारों तरफ पहाड़ों की खामोशी और अपने पिता की चुपचाप उपस्थिति।

वह दिन भर अपने कमरे में बंद रहता।

एक सुबह, रमाकांत जी उसके कमरे में आए। "चल, मेरे साथ।"

वह उसे घर के पीछे, एक छोटी सी पगडंडी पर ले गए, जो एक झरने की ओर जाती थी। यह वही झरना था, जहाँ सिद्धार्थ बचपन में घंटों खेला करता था।

बाप-बेटे चुपचाप झरने के पास एक पत्थर पर बैठ गए।

"जानते हो, सिद्धार्थ," रमाकांत जी ने एक लंबी खामोशी के बाद कहा, "मैं तुमसे कभी नाराज़ नहीं था। मैं तो बस डरता था। डरता था कि जिस सफलता को पाने के लिए तू भाग रहा है, कहीं वह तुझे तुझसे ही दूर न कर दे।"

उन्होंने कहा, "यह जो झरना देख रहे हो, यह भी तो कितनी ऊँचाई से गिरता है, पत्थरों से टकराता है, पर फिर भी आगे बढ़ता रहता है। जानते हो क्यों? क्योंकि यह अपनी जड़ों से, अपने स्रोत से जुड़ा हुआ है। जिस दिन यह अपने स्रोत से कट जाएगा, यह सूख जाएगा।"

यह एक पिता का अपने बेटे को दिया गया सबसे बड़ा जीवन-दर्शन था।

"बेटा, तुम्हारी जड़ें यहाँ हैं, इस मिट्टी में, इस हवा में, और हमारे प्यार में। तुम सफलता की ऊँचाइयों पर पहुँचो, पर अपनी जड़ों को मत भूलना।"

उस एक पल में, सिद्धार्थ को जैसे अपने सारे सवालों के जवाब मिल गए। उसे एहसास हुआ कि जिस खालीपन को वह मुंबई की पार्टियों में भरने की कोशिश कर रहा था, वह तो यहाँ, अपने घर के आँगन में भरा जा सकता है। यह उसकी अपनी 'स्वयं की यात्रा' की शुरुआत थी।

उसने अपनी आँखें बंद कीं, और सालों बाद, उसने उस झरने की आवाज़ को सच में सुना। उसे अपने अंदर एक अजीब सी शांति महसूस हुई।

उस दिन के बाद, सिद्धार्थ बदल गया। अब वह सुबह अपने पिता के साथ लंबी सैर पर जाता। वह अपनी माँ की पुरानी रेसिपी से अनन्या के लिए खाना बनाता। उसने सालों बाद फिर से अपना पुराना कैमरा निकाला और पहाड़ों की तस्वीरें खींचने लगा।

वह अपनी स्वयं की यात्रा में खुद को फिर से खोज रहा था - वह सिद्धार्थ, जो वकील बनने से पहले एक खुशमिजाज और सपनों से भरा लड़का था।

जब वह कुछ हफ्तों बाद मुंबई लौटा, तो वह एक नया इंसान था। उसकी आँखों में अब सफलता का नशा नहीं, बल्कि एक गहरा सुकून था।

यह कहानी हमें सिखाती है कि ज़िंदगी की असली यात्रा मीलों का सफर तय करने में नहीं, बल्कि खुद के अंदर कुछ कदम चलने में है। कभी-कभी, हमें अपनी भाग-दौड़ भरी ज़िंदगी से रुककर, अपनी जड़ों की ओर लौटना पड़ता है, ताकि हम यह याद कर सकें कि हम कौन हैं और हमारी असली खुशी किस चीज़ में है। यही सच्ची स्वयं की यात्रा है।

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