सनातन यात्रा: एक परिवार की आत्म-खोज

 

सनातन यात्रा: एक परिवार की आत्म-खोज
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'यात्रा' सिर्फ़ एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाना नहीं है; यह एक खोज है - बाहरी दुनिया की भी और अपने अंदर की भी। और जब यह यात्रा आस्था से जुड़ जाती है, तो वह एक सनातन यात्रा बन जाती है, जो हमें हमारे अस्तित्व के मूल से मिलाती है। यह कहानी है ऐसी ही एक यात्रा की, और उस एक परिवार की, जिसने इस सफर में सिर्फ तीर्थ नहीं, बल्कि एक-दूसरे को भी फिर से पाया।

यह कहानी है सेवानिवृत्त प्रोफेसर, श्री जगदीश नारायण, उनके बेटे, आदित्य, और उनकी बहू, मीरा, की।

जगदीश जी ने अपनी पूरी ज़िंदगी शास्त्रों और पुराणों का अध्ययन करते हुए बिताई थी। उनकी आखिरी इच्छा थी - केदारनाथ की पैदल यात्रा करना। यह उनके लिए सिर्फ एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि जीवन भर की साधना का अंतिम पड़ाव था।

पर उनका बेटा, आदित्य, जो मुंबई में एक सफल कॉर्पोरेट वकील था, इन सब बातों को नहीं मानता था। वह नास्तिक नहीं था, पर व्यावहारिक था। उसे लगता था कि भगवान मंदिरों में नहीं, अच्छे कर्मों में बसते हैं।

"पापा," उसने फोन पर कहा, "आपकी उम्र और सेहत इस कठिन यात्रा की इजाजत नहीं देती। भगवान तो घर पर भी हैं। आप क्यों ज़िद कर रहे हैं?"

"बेटा, तुम नहीं समझोगे," जगदीश जी ने एक शांत, पर दृढ़ आवाज़ में कहा। "यह मेरे लिए सिर्फ एक मंदिर जाना नहीं है। यह मेरी आत्मा की पुकार है। यह मेरी सनातन यात्रा है।"

यह दो पीढ़ियों के बीच की आस्था और तर्क की लड़ाई थी।

मीरा, आदित्य की पत्नी, अपने ससुर की भावनाओं का सम्मान करती थी। उसने अपने पति को समझाया, "आदित्य, हम पापाजी को अकेले नहीं जाने दे सकते। क्यों न हम भी उनके साथ चलें? छुट्टी भी हो जाएगी और पापाजी की इच्छा भी पूरी हो जाएगी।"

बहुत ना-नुकुर के बाद, आदित्य मान गया, पर सिर्फ अपने पिता की सुरक्षा के लिए।

यात्रा शुरू हुई। हिमालय की गोद में, सर्पीली सड़कें, गहरी खाइयाँ और ठंडी हवा। आदित्य, जो फाइव-स्टार होटलों और आरामदायक यात्राओं का आदी था, उसे हर चीज़ में कमी नज़र आ रही थी।

"यहाँ कोई नेटवर्क भी नहीं है!" वह झुंझलाकर बोला।

जगदीश जी बस मुस्कुराते रहे। "कभी-कभी, दुनिया से संपर्क टूटना ही खुद से जुड़ने का पहला कदम होता है, बेटा।"

जैसे-जैसे वे पैदल चढ़ाई करने लगे, यात्रा और भी कठिन होती गई। आदित्य का शहरी शरीर जवाब देने लगा। पर उसने देखा कि उसके बूढ़े पिता, जो ठीक से चल भी नहीं पाते थे, एक अटूट आस्था के सहारे धीरे-धीरे, पर लगातार आगे बढ़ रहे थे। उनके चेहरे पर थकान थी, पर आँखों में एक अलौकिक चमक थी।

एक गलतफहमी तब पैदा हुई, जब एक रात, भारी बारिश के कारण उन्हें एक छोटी सी, भीड़-भरी धर्मशाला में रुकना पड़ा।

"हद है! मैं इस गंदी जगह पर नहीं रुक सकता!" आदित्य गुस्से में बोला। "मैंने आपसे कहा था, यह सब पागलपन है।"

यह सुनकर जगदीश जी का दिल टूट गया। "बेटा, अगर तुम्हें इतनी ही तकलीफ है, तो तुम वापस जा सकते हो। मैं अपनी यात्रा पूरी कर लूँगा।"

उस रात, बाप-बेटे में बात बंद हो गई।

मीरा, जो यह सब देख रही थी, ने एक बड़ा कदम उठाया। यह एक बहू का त्याग और प्रेम था।

अगली सुबह, उसने आदित्य से कहा, "आदित्य, तुम यहीं रुको और आराम करो। मैं पापाजी के साथ आगे जाऊँगी।"

यह सुनकर आदित्य को एक झटका लगा। उसे पहली बार एहसास हुआ कि उसका व्यवहार कितना स्वार्थी था। उसकी पत्नी, जो इन सब में विश्वास भी नहीं करती, सिर्फ अपने ससुर की खुशी के लिए यह सब कर रही है। और वह, उनका अपना बेटा...

यह एक बेटे का आत्म-बोध था। उसे शर्मिंदगी महसूस हुई।

"नहीं," उसने एक दृढ़ निश्चय से कहा। "हम सब साथ चलेंगे।"

उस दिन के बाद, आदित्य बदल गया। अब वह शिकायत नहीं कर रहा था। वह अपने पिता का सहारा बन गया। वह उनका हाथ पकड़कर उन्हें चढ़ाता, उनके लिए गर्म पानी लाता, और रात में उनके पैर दबाता।

इस प्रक्रिया में, वह सिर्फ एक पहाड़ नहीं चढ़ रहा था, वह अपने पिता के दिल के करीब भी पहुँच रहा था। उसने देखा कि कैसे उसके पिता रास्ते में मिलने वाले हर थके हुए यात्री की मदद करते हैं, अपने हिस्से का खाना भी दूसरों को दे देते हैं। उसने सीखा कि सेवा और करुणा ही सनातन धर्म का मूल है।

आखिरकार, वे केदारनाथ पहुँचे। बर्फ से ढकी चोटियों के बीच, उस प्राचीन मंदिर को देखकर, आदित्य, जो हमेशा तर्क की बात करता था, पहली बार निःशब्द हो गया। उसे उस जगह की ऊर्जा में, उस हवा की पवित्रता में, कुछ ऐसा महसूस हुआ जो किताबों और विज्ञान से परे था।

उसने देखा कि उसके पिता मंदिर के सामने साष्टांग लेटे हुए हैं, और उनकी आँखों से आँसू बह रहे हैं, पर उनके चेहरे पर परम शांति का भाव है।

पूजा के बाद, जगदीश जी ने अपने बेटे के कंधे पर हाथ रखा। "बेटा, यह मंदिर पत्थरों का नहीं, विश्वास का बना है। हमारी सनातन यात्रा का अंत किसी मंदिर पर नहीं होता, यह तो अपने अहंकार को गलाकर, अपने परिवार के प्रेम को समझकर ही पूरी होती है।"

उस दिन, आदित्य को समझ आया कि उसके पिता उसे किसी मंदिर में नहीं, बल्कि जीवन के एक बड़े सबक की यात्रा पर लाए थे।

यह कहानी हमें सिखाती है कि आस्था और तर्क दो अलग-अलग रास्ते नहीं हैं। जब हम अपने बड़ों की भावनाओं का सम्मान करते हैं और खुले मन से उनकी दुनिया को समझने की कोशिश करते हैं, तो हमें भी उस परम शांति का अनुभव होता है, जिसकी हम सबको तलाश है। वह सनातन यात्रा बाहर की दुनिया में नहीं, हमारे अपने अंदर, हमारे रिश्तों में ही पूरी होती है।

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